काव्य का व्याकरण मैने जाना नहीं
छंद आकर स्वयं ही संवरते गये
अधूरी गाथा
पॄष्ठ रहे सब के सब कोरे, सुध-बुध बिसरा कलम सो गई शब्द भाव के बीच निरंतर, बढ़ती रही बीच की दूरी करते करते यत्न थक गया, पर अंतिम अध्याय न लिखा जीवन के इस रंगमंच की हर गाथा रह गई अधूरी.
1 comment:
kya hua tha?
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