केवल मीत तुम्हीं हो कारण

वीणा की झंकृत  सरगम ने
सुना कंठ स्वर मीत तुम्हारा
कहा आठवें सुर की रचना
का बस एक तुम्ही हो कारण

सारंगी ने जो सितार के
तारों को झंकार बजाया
बांसुरिया ने अलगोजे की
देहरी पर जा जिसको गाया
इकतारे में जागी लहरी
रह रह जिसे पुकारा करती
पवन झकोरे ने बिन बोले
जिसको संध्या भोर सुनाया

वह स्वर जाग्रत तुमसे ही तो
हुआ गूँजती प्रतिध्वनियों में
और जिसे दोहराते आये
दरबारों के  गायक, चारण

जागी हुई भोर में किरणें
जो प्राची को रही सुनाती
गौरेय्या के चितकबरे पंखों
पर जिसे धूप लिख जाती
स्तुतियों से हो परे, मंत्र की
ध्वनियों की सीमा से आगे
जिसे व्योम में ढूँढा करती
यज्ञ-धूम्र रेखा लहराती

परे अधर के स्पर्शों के जो
व्यक्त हुआ नयनों के स्वर में
वह सुर जिसका सकल विश्व में
मिलता कोई नहीं उदाहरण

आदि अनादि अक्षरों की धुन
है इक जिस सुर पर आधारित
भंवरों का गुंजन, लहरों का
कम्पन जिससे है अनुशासित
स्वर के आरोहों की सीमा 
से भी जो हो रहा अकल्पित
राग-रागिनी के गतियों के
नियम हुये जिससे प्रतिपादित

करते सदा तपस्या जिसके लिये
अधर कर लें उच्चारण
उस अष्टम सुर की रचना का
केवल मीत तुम्हीं हो कारण

Comments

Udan Tashtari said…
:) शानदार!!

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