मिले मुझे तुम मध्यान्तर में

इक नाटक के मंचन पर जब मिले मुझे तुम मध्यान्तर में
अकस्मात् ही घिर कर आये आँखों में यादों के बादल

वे पल मुख्य पात्र हम तुम थे मंचित जीवन के नाटक में
टिका हुआ था हम पर ही तो घटनाक्रम व् पूर्ण कथानक
निर्देशन भी अनुयायी संवाद संहिता का अपनी था
सूत्रधार भूला करता था हमें देख, निज कथ्य अचानक

बीते हुए पलों में जीना है स्वीकार नहीं मुझको,  पर
कुछ पल बस जाते नयनों में बन कर के सुधियों का काजल

प्रश्न उठे कुछ ले अंगड़ाई उस पल मन की अमराई में
क्या छेड़ा तुमको भी गुंजित इस अतीत की शहनाई ने
क्या हस्ताक्षर जड़े महकती भूली बिसरी यादों ने कुछ
क्या वे पल जीवंत हुए ?  जो बीते संध्या सुरमाई में

यद्यपि है अनुमान मुझे क्या होगा इन प्रश्नों का उत्तर
लेकिन उत्कण्ठा का असमंजस फिर भी करता है पागल।

बदले हुए मंच अब सन्मुख और कथानक भी है बदला
शब्द हुए सारे निर्धारित पृष्ठभूमि अब मुख्य पात्र है
दृश्य श्रव्य की डोर कहाँ से कौन खींचता है रहस्यमय
रंग सभी हो चुके तिरोहित पटाक्षेप ही  शेष मात्र है

खिंचे हुये परदे की हम तुम  लटकी हुई डोर के जैसे 
और कक्ष को आत्मसात करने को है कुहुसाता आँचल

Comments

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " चटगांव विद्रोह की ८६ वीं वर्षगांठ - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
Udan Tashtari said…
बीते हुए पलों में जीना है स्वीकार नहीं मुझको, पर
कुछ पल बस जाते नयनों में बन कर के सुधियों का काजल


-मेरी ही कहानी कह गये आप...अद्भुत राकेश भाई...
Asha Joglekar said…
दृश्य श्रव्य की डोर कहाँ से कौन खींचता है रहस्यमय
रंग सभी हो चुके तिरोहित पटाक्षेप ही शेष मात्र है

खिंचे हुये परदे की हम तुम लटकी हुई डोर के जैसे
और कक्ष को आत्मसात करने को है कुहुसाता आँचल

बहुत सुंदर। टूटन के बाद का मिलन फिर एक उपचार ही रह जाता है।
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