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Showing posts from June, 2014

मिली ही नहीं व्याकरण की गली

हम भटकते रहे काव्य के गांव में पर मिली ही नहीं व्याकरण की गली आंजुरी में भरी शब्द की पंखुरी सँग उड़ा ले गई इक हवा मनचली चाह थी कुंडली का पता कुछ चले डोर परिचय की बांधें नई छन्द से मुक्तकों के महकते हुए बाग में साँस भर जाये रसगीत की गंध से सोरठे अंकुरित हो जहाँ पर रहे मिल सकें अक्षरों को वही क्यारियाँ ड्यौढ़ियों से  सवैय्यों की मिलती हुई हौं जहाँ पर कवित्तों की फुलवारियाँ भोर उगती रही है जहाँ पद्य की गद्य की सांझ जा मोड़ जिसके ढल्ली ढूँढ़ता हूँ वही व्याकरण की गली गुनगुनाती रही एक कामायनी जिस जगह फूल साकेत के थे खिले सूर का सिन्धु उमड़ा निरन्तर बहा बोल मीरा की थे भावना को मिले मंत्र के बीज बोकर गई थी जहाँ वाहिनी हंस की,बीन झंकार कर मानसी गंग तुलसी प्रवाहित किये राम का नाम बस एक उच्चार कर मृग सी तृष्णा लिये मन भटकता रहा होंठ पर प्यास उगती रही बस जली पर मिली ही नहीं व्याकरण की गली कोई नवगीत हो न सका पल्लवित शब्द  अनुशासनों में नहीं बँध सके भाव बैसाखियों पर टिके रह गये एक पग छन्द की ओर न चल सके रागिनी,राग के प्रश्नपूरित नयन भोर से सांझ तक ताकते रह गये शब्द जो एक पल होंठ पर आ रुके वे सभी मौन की धार में बह गये और फिर पूर्णता के ब…

सन्ध्या की पुस्तक के पन्न खोले, गूँजा नाम तुम्हारा

सन्ध्या की पुस्तक के पन्न खोले, गूँजा नाम तुम्हारा सुधियों के गलियारों में जब डोले, गूँजा नाम तुम्हारा जीवन की हर इक गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की जब परिभाषायें जब भी ढूँढ़ी हैं बिम्बों की गहरी हल्की गति में चलते हुए, मोड़ पर ठिठके, नजर उठा कर देखा थी वितान के वातायन में केवल एक तुम्हारी झलकी मार्ग चिह्न के हर पत्थर पर देखा था बस नाम तुम्हारा सरिता के जल में प्रतिबिम्बित पाया केवल नाम तुम्हारा छूती है मेरी उंगली जब किसी वर्तनी के अक्षर को नाम तुम्हारे वाले, होतीं हाथों में गहरी रेखायें जुड़ जाती है किस्मत वाली स्वत: उन्ही से अकस्मात ही जुड़ती हैं पूरनमासी से ज्यों चन्दा की शुभ्र विभायें हो जाता हर इक गाथा में तब संचारित नाम तुम्हारा श्रुति में,स्मृति में, और शब्द में मिले समाहित नाम तुम्हारा उड़े धुँये के बादल छाये जब भी आकर दृष्टि क्षितिज पर लगता गुंथे हुए हैं उनमें कुछ जाने पहचाने चेहरे यादों के प्रत्याशी बनने हेतु सभी का नामांकन था पर जितने भी शब्द अधर की गलियों से आकर मुस्काये एक एक कर सबने ही दोहराया केवल नाम तुम्हारा स्वर ने निकल कंठ से बाहर गाया केवल नाम तुम्हारा

प्रश्न मन की गुफ़ाओं से

उम्र के गांव को सांस का कारवां चल रहा है बिना एक पल भी रुके खर्च होता हुआ पास का हर निमिष धड़कनें ताक से कोहनियों पर झुके मोड़ पर आ टँगे चित्र में ढूँढ़ती कोई परछाईं पहचान से हो जुड़ी हाथ में लेके धुंधली हुई कुंडली धुल चुके एक कागज़ में हो गुड़मुड़ी कल्पना के बिखरते हुए तार को जोड़ती है हवाओं के संगीत में मुट्ठियों में छनी धूप की चिन्दियाँ रुक न पाती फ़िसलते हुए गिर रहीं और जो स्वप्न आंखों में रुक न सके झील में उनकी परछाईयाँ तिर रहीं शेष  पुरबाईयों की कथायें हुईं पृष्ठ लटके हुए अलगनी पर रहे लौट कर दीप आया नहीं कोई भी उंगलियां जो लहर की पकड़ कर बहे प्रश्न मन की गुफ़ाओं से जितने उठे खो गये अजनबी एक तरतीब में

ढूँढ़ रहा हूँ उत्तर

मीत तुम्हारे नयनों ने जो भेजे थे मुझको सन्देशे अर्थ नये मैं ढूँढ़ रहा हूँ,  कुछ उनकी परिभाषाओं के तय कर ली थी बिना माध्यम मेरे नयनों तक की दूरी बहती हुई तरंगों में घुल,चहल्कदमियाँ कर आये थे असमंजस में पड़ी हवा ने रुक कर इनको देखा बहते गीत इन्होंने बिना रागिनी औ’ सरगम के बिन गाये थे सुलझाने इस एक पहेली को जो पूछी बही हवा ने ढूँढ़ रहा हूँ  उत्तर मिल जायें उनकी जिज्ञासाओं के मैने सब कुछ सुना भले ही मौन रहे थे वे सन्देसे आलोड़न के वक्र गात में लिखे हुए थे सारे अक्षर पलकों की बरौनियां छू ली थी जैसी ही आ हौले से झंकृत हुए उन्हें छूते ही एक एक कर के सारे स्वर वाद्य लहर को कर जो ढाला एक नया संगीत अनूठा ढूढ़ रहा कुछ अर्थ नये पाऊँ उसकी अभिलाषाओं के अर्थ न जाने कितने होते छुपे हुए कुछ सन्देसों में और न जाने रह जाते है कितने बिना हुए संप्रेषित कितने सन्देशों में सब कुछ सहज उभर कर आ जाता है कुछ में लेकिन सन्देशों के अनगिन क्रम होते संकेतित बिना किसी संकेत,अर्थ के जो हो सहज स्वयं संप्रेषित ढूँढ़ रहा हूँ नव सन्देशे, मैं कुछ ऐसी आशाओं के.

अब मैं कॊइ गीत सुनाऊँ

भीनी यादों के संचित पल कितनी बार कहो दुहराऊँ संभव नहीं रहा शतरूपे ! अब मैं कॊइ गीत सुनाऊँ वही गांव,पगडंडी वह ही और कदम वे ही आवारा वे ही सँकरी गलियाँ,वो ही अँगनाई,वोही चौबारा वही रंग है और हाथ में हैं वे ही अनगढ़े खिलौने और वही बीमार दुछत्ती,जिसने था हर सांझ पुकारा कितने दिन औ’ झाड़ पौंछ कर इन्हें रखूँ, कितना संगवाऊँ संभव नहीं  रहा शतरूपे, अब मैं  कोई गीत सुनाऊँ गुलमोहर वह, जहाँ नजर बादामी चेहरे से फ़िसली थी वह इक सूखाफूल , भूल कर जिस पर बैठ गई तितली थी हैं वे ही रूमाल लगी है जिन पर अधर छाप धुँधलाने और वही इक मोड़ जहाँ से बजती शहनाई निकली थी कितने दिन तक संजो सामने मैं इन पर नित दीप जलाऊँ संभव नहीं रहा शतरूपे अब मैं कोई गीत सुनाऊँ दुहराऊँ कितना हो जाती बोझिल एकाकी सन्ध्यायें मटमैली लगने लगती हैं शरद चाँद की शुभ्र विभायें अम्बर पर उमड़ा करते हैं बादल विरहा की रुत वाले और नयन की भटकन मेरी एक बिन्दु पर टिक न पायें
कितनी बार इन्हीं रंगों को नए चित्र में गढ़ता जाऊं   संभव नहीं  रहा शतरूपे, अब मैं  कोई गीत सुनाऊँ