अब मैं कॊइ गीत सुनाऊँ


भीनी यादों के संचित पल कितनी बार कहो दुहराऊँ
संभव नहीं रहा शतरूपे ! अब मैं कॊइ गीत सुनाऊँ
 
वही गांव,पगडंडी वह ही और कदम वे ही आवारा
वे ही सँकरी गलियाँ,वो ही अँगनाई,वोही चौबारा
वही रंग है और हाथ में हैं वे ही अनगढ़े खिलौने
और वही बीमार दुछत्ती,जिसने था हर सांझ पुकारा
 
कितने दिन औ’ झाड़ पौंछ कर इन्हें रखूँ, कितना संगवाऊँ
संभव नहीं  रहा शतरूपे, अब मैं  कोई गीत सुनाऊँ
 
गुलमोहर वह, जहाँ नजर बादामी चेहरे से फ़िसली थी
वह इक सूखाफूल , भूल कर जिस पर बैठ गई तितली थी
हैं वे ही रूमाल लगी है जिन पर अधर छाप धुँधलाने
और वही इक मोड़ जहाँ से बजती शहनाई निकली थी
 
कितने दिन तक संजो सामने मैं इन पर नित दीप जलाऊँ
संभव नहीं रहा शतरूपे अब मैं कोई गीत सुनाऊँ
 
दुहराऊँ कितना हो जाती बोझिल एकाकी सन्ध्यायें
मटमैली लगने लगती हैं शरद चाँद की शुभ्र विभायें
अम्बर पर उमड़ा करते हैं बादल विरहा की रुत वाले
और नयन की भटकन मेरी एक बिन्दु पर टिक न पायें

कितनी बार इन्हीं रंगों को नए चित्र में गढ़ता जाऊं 
 संभव नहीं  रहा शतरूपे, अब मैं  कोई गीत सुनाऊँ

Comments

Udan Tashtari said…
अति सुन्दर!!

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