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Showing posts from November, 2013

आज तुम्हारी विरुदावलियाँ मैं गाता

आज तुम्हारे लिये शान में मैं पढ़ता हूँ चार कशीदेकल जब मेरी बारी आये, मेरी पीठ थपथपाना तुमआज लिखी जो कविता तुमने, कितनी ऊँचाई छू ली हैजितने शब्द लिखे हैं उनमें नही एक भी मामूली हैवाह वाह ! क्या लिखा, लग रहा जैसे रख दी कलम तोड़ करनीरज दिनकर बच्चन सबको, आये पीछे कहीम छोड़ करआज तुम्हारे लिक्खे हुये को मैं पंचम सुर में गाता हूँकल मैं जो कुछ लिखूँ उसे सरगम में पिरो गुनगुनाना तुमसमिति प्रशंसा की अपनी यह, हमें विदित है,है पारस्परचलो करें इसलिये प्रशंसा एक दूसरे की बढ़ चढ़ करकविता लेख कहानी में क्या कथ्य ? नहीं कुछ लेना देनाहर इक कविता "रश्मिरथी" है, हर किस्सा है "तोता मैना"आज तुम्हारी विरुदावलियाँ मैं गाता हूँ बिन विराम केकल मेरी जब करो प्रशंसा, आंधी बने सनसनाना तुमउपमा अलंकार सब के सब सर को पीट लिया करते हैंछन्द तुम्हारी कविताओं के आगे आ पानी भरते हैंमहाकाव्य औ’ खंडकाव्य सब रहते खड़े आन कर द्वारेपड़े तुम्हारी दृष्टि और वे अपना सोया भाग्य संवारेआज तुम्हारा भौंपा बन कर मैं जैसे गुणगान कर रहाकल जब मेरी बात चले तो घुँघरू बने झनझनाना तुम

एक किरन प्रतिबिम्बित होकर मन वातायन सजा रही है

लगने लगें अजनबी तुमको जब घर की दीवारें अपनेसांझ भोर में दोपहरी में आंखों में तिरते हों सपनेअनायास ही वर्तमान जब चित्र सरीखा हो रह जायेएक शब्द पर अटक अटक कर अधर लगें रह रह कर कँपनेतो शतरूपे ! विदित रहे यह मधुर प्रीत की इक कोयलियामन की शाखाओं पर आकर नई रागिनी सुना रही हैसांझ अकेली करती हो जब खिड़की के पल्लों से बातेंतारों को कर बिन्दु,खींचने लगती हो रेखायें रातेंछिटकी हुई धूप पत्तों से, सन्देसा लेकर आती होऔर हवा के झोंके लेकर आयें गंधों की बारातेंतो रति प्रतिलिपि ! यह संकुल हैपुष्प शरों के तरकस में सेएक किरन प्रतिबिम्बित होकर मन वातायन सजा रही हैदर्पण अपनी सुध बुध खोकर रूप निरखता ही रह जायेपगतलियों को छूते पथ की धूल लगे चन्दन हो जायेपत्तों की सरसर से उमड़े सारंगी की तान मनोहरअपनी परछाईं भी लगता अपने से जैसे शरमायेतो संदलिके! यह प्रमाण है उम्रसंधि की यह कस्तूरी  इस पड़ाव को अपनी मोहक गंध लुटा कर सजा रही है

पीर की नई कहानियाँ

लिख रही है रोज ज़िन्दगीपीर की नई कहानियाँ
कैनवस पे रह गये टँगेरंगहीन एक चित्र कीअजनबी बना हुआ मिलाबालपन के एक मित्र कीरेत की तरह फ़िसल गईहाथ में खिंची लकीर कीबँध के एक द्वार से रहाभ्रम में खो गये फ़कीर की
चुन रही है रोज ही नईसिन्धु तट पड़ी निशानियाँ
लिख रही है गीत से विलगअन्तरे की अनकही व्यथारहजनी से गंध की ग्रसितपुष्प की अव्यक्त इक कथाहोंठ की कगार से फ़िसलबार बार शब्द जो गिरालिख रही है धूँढ़ते हुयेगुत्थियों में खो गया सिरा
कह गई लिखा अपूर्ण हैसांझ करती मेहरबानियाँ
मोड  पर जो राजमार्ग केपांव रह गये रुके,डरेरह गये पलक की कोर परअश्रु जो कभी नहीं झरेरह गया सिमट जो मौन कीपुस्तकों में, एक गीत कीछार छार होके उड़ रहीदादा दादियों की रीत की
लिख रही हिसाब, लाभ बिनबढ़ रही हैं रोज हानियाँ

नये अर्थ के प्रतिपादन में

समय शिला से टकरा टकराबिखर गये अन्तरे गीत केशब्द हुये आवारा, बँधते नहींतनिक भी अनुशासन मेंअक्षर अक्षर विद्रोही हैले मशाल जलती हाथों मेंदूर अधर की पगडंडी सेउलझा अर्थहीन बातों मेंपंक्तिहीन उच्छंखल कोईबायें जाता कोई दाय़ेंसुनी अनसुनी कर देते हैंकोई कितना भी समझायेकर बैठे दुश्मनी मात्राओं सेअपने मद में फूलेरहे पिरोते निष्ठायें परगीतों वाले सिंहासन मेंअलंकार की बैसाखी परचलें लड़खड़ा कर उपमायेंजुड़ती नहीं तार से आकरतथाकथित ये नई विधायेंसमुचित विस्तारों में अक्षमवाक्य रहे हैं टूट टूट करऔर भावना विधवाओं सीरहे बिलखती फ़ूट फ़ूट करसतही समझ पूज लेती हैकेवल उन लहरों की हलचलजिनका गठबन्धन करता हैबस निवेश इक विज्ञापन मेंगीत और व्याख्यानों में अबअन्तर नहीं कसौटी करतीलगीं अस्मिता तलक दांव परशायद इसीलिये ही डरतीसत्य अधर की देहरी को भीछूने से अब कतराता हैचाटुकारिता का कोहरा हीअपनी सीमा फ़ैलाता हैमिले धरोहर में जितने भीनियम उठा कर फ़ेंक दिये हैंव्यस्त सभी हैं निज मतलब केनये अर्थ के प्रतिपादन में