लौ सिमट बातियों को रुलाती रही

 
 
सारिणी में समय की कहीं खो गई 
भावना, साध जिसको सजाती रही 
 
दोपहर  की पिघलती हुई धूप आ
याद के रंग मन पर नये ,मल गई
जीर्ण परदे से बादल के छनती हुई
कोई परछाईं आकर ह्रदय छल गई
अत्र कुशलम, तो हो अस्तु भी तत्र ही
रह गये सोचते जितने सम्बन्ध  थे
और हम फिर उलझ उस नियम में गये
जिसके कारण हुये मन के अनुबन्ध थे
 
सूर्य की हर किरण वक्र हो व्योम से
सिर्फ़ परछाईयाँ ही बनाती रही
 
सारे सन्देश उत्तर बिना खो गये
दृष्टि  लेकर गई जो कबूतर बनी
शब्द के,पृष्ठ के मध्य में यूँ लगा
और गहरी  हुई, जो हुई अनबनी
था अपरिचय घटा सावनी बन घिरा
और बरसा गया फ़िर से एकाकियत
ज़िन्दगी मौन ही मुस्कुराती रही
हम रहे पूछते क्या है उसकी नियत
 
प्रश्न बन जो ह्रदय से चली भावना
श्याम विवरों में जाकर समाती रही
 
आईने में खड़े अजनबी का पता
खोजते खोजते थक गई ये नजर
वृत्त जो अर्ध था प्रश्न के चिह्न का
बस उसीमें अटक रह गया हर सफ़र
बिन्दु लगने कहां थे-ये निश्चित हुआ
लग गये पर कहाँ, कुछ नियंत्रण नहीं
इसलिये नीड़ था जोकि कल सांझ का
आज गंतव्य बन कर रहा वो वहीं
 
तार टूटे हुए साज के में, सिमट
सरगमी भावना छटपटाती रही
 
मंच पर ज़िन्दगी के घटित हो रहा
क्या ,है क्या आयेगा ये पता है नहीं
कौन बन कर निदेशक इशारे करे
जान पाये न कल, न सकेंगे कभी
जो हुआ सो हुआ, और होना है जो
हो रहे, पत्थरों की लकीरें बना
और हम शेष साहस जुटाते रहें
ताके सम्भावितों का करें सामना 
 
मंदिरों में जले दीप सब बुझ गये
लौ सिमट बातियों को रुलाती रही

Comments

Rajendra Kumar said…
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,आभार.
प्रतीकों के माध्यम से मन भावों का अद्भुत चित्रण
Udan Tashtari said…
अद्भुत....वाह!!

प्रश्न बन जो ह्रदय से चली भावना
श्याम विवरों में जाकर समाती रही

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