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Showing posts from September, 2011

बस इतना है परिचय मेरा

बस इतना है परिचय मेरा भाषाओं से कटा हुआ मैं हो न सका अभिव्यक्त गणित वह गये नियम प्रतिपादित सब ढह अनचाहे ही समीकरण से जिसके प्रतिपल घटा हुआ मैं जीवन की चौसर पर साँसों के हिस्से कर बँटा हुआ मैं बस इतना है परिचय मेरा इक गंतव्यहीन यायावर अन्त नहीं जिसका कोई, पथ नीड़ नहीं ना छाया को वट ताने क्रुद्ध हुए सूरज की किरणों की इक छतरी सर पर चला तोड़ मन की सीमायें, खंड खंड सुधि का दर्पण कर बस इतना है परिचय मेरा सका नहीं जो हो परिभाषित इक वक्तव्य स्वयं में उलझा अवगुंठन जो कभी न सुलझा हो पाया जो नहीं किसी भी शब्द कोश द्वारा अनुवादित आधा लिखा एक वह अक्षर, जो हर बार हुआ सम्पादित बस इतना है परिचय मेरा

नाम है आपका

भोर में शब्द ने पंछियों के स्वरों में
कहा गूँज कर नाम है आपका शाख ने बात करते हुए डूब से मुस्कुराकर कहा नाम है आपका शांत सोई हुई झील के होंठ पर आके ठहरी हुई फूल की पंखरी यों लगा दर्पणों ने लिखा वक्ष पर बिम्ब बन कर स्वयं नाम है आपका
पेड़ की पत्तियों से छनी धूप ने छाँह पर नाम लिख रख दिया आपका थाल पूजा का चूमा खिली धूप ने, ज्योति बो नाम को कर दिया आपका धूप ने बात करते हुये बूँद से, आपके नाम को इन्द्तधनुषी किया सांझ को धूप ने घर को जाते हुये, रंग गालों पे ले रख लिया आपका.

जब गीतों को गाकर मेरे

कल्पवृक्ष की कलियों ने जब पहली बार नयन खोले थे पुरबाई के झोंके पहली बार नाम कोई बोले थे प्रथम बार उतर कर गिरि से नदिया कोई लहराई थी पहली बार किसी पाखी ने जब उड़ने को पर तोले थे हुलस गए हैं वे सारे पल आकर के मेरी नस नस में दृष्टि तुम्हारी से टकराए मीत नयन जब जाकर मेरे पिघली हुई धूप छिटकी हो आकर जैसे ताजमहल पर क्षीर सिन्धु में प्रतिबिंबित हो कर चमका जैसे पीताम्बर हिम शिखरों पर नाच रही हो पहली किरण भोर की कोई थिरक रही हों सावन की झड़ियाँ जैसे आ कर चन्दन पर लगा ओढ़ कर बासंती परिधान तुषारी कोई प्रतिमा अंगनाई में खडी हो गई अनायास ही आकर मेरे सुधियों में यूँ लगा सुधायें आकर के लग गई बरसने भावो के कंचन को कुन्दन किया किसी अनुभूत छुअन ने सांसों के गलियारे में आ महक उठीं कचनारी कलियाँ पल पल पुलकित होती होती धड़ाकन धड़कन लगी हरषने लगे नाचने सरगम के सातों ही सुर आकर बगिया में तुमने उनको जरा सुनाया जब गीतों को गाकर मेरे मिलीं दिशायें ज्योंकि उपग्रही संसाधन से हो निर्देशित अकस्मात ही अर्थ ज़िन्दगी के कुछ नये हुए अन्वेषित लक्ष्य, साध के ध्येय प्रेम के आये समझ नये फिर मानी जीवन का हर गतिक्रम होने लगा तुम्हीं से प…

गीत गाता रहा

कोई बैठा हुआ सांझ के खेत में ढल रही धूप के तार को छेड़ते चंग टूटा हुआ इक बजाता रहा गीत गाता रहा दूर  चौपाल ने कितनी आवाज़ दीं फूल पगडंडियाँ थीं बिछाती रहीं जेहरों पे रखीं पनघटों की भरी
कलसियां थीं निमंत्रण सजाती रहीं किन्तु अपनी किसी एक धुन में मगन आँख में आँज कर कुछ अदेखे सपन नींद की सेज पर सलवटों को मिटा चान्दनी, चाँदनी की बिछाता रहा गीत गाता रहा स्वर्णमय आस ले झिलमिलाते रहे पास अपने सितारे बुलाते रहे तीर मंदाकिनी के सँवरते हुए रास की भूमिकायें बनाते रहे चाँद का चित्र आकाश में ढूँढ़ता काजरी रात का रंग ले पूरता दूर बिखरे क्षितिज की वो दहलीज पर अल्पनायें नयी कुछ सजाता रहा गीत गाता रहा पास पाथेय सब शेष चुकने लगा नीड़ आ पंथ पर आप झुकने लगा शेष गतियाँ हुईं वृक्ष की छाँह में एक आभास निस्तब्ध उगने लगा संग चरवाहियों के चला वो नहीं भ्रम के भ्रम से कभी भी छला वो नहीं शाख पर कंठ की रागिनी के, बिठा शब्द को वे हिडोले झुलाता रहा गीत गाता रहा