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Showing posts from August, 2011

ज़िन्दगी है रेशमी साड़ी

ज़िन्दगी है रेशमी साड़ी जड़ी इक चौखटे ,में
बुनकरों का ध्यान जिससे एक दम ही हट गया है
पीर के अनुभव सभी हैं बस अधूरी बूटियों से
रूठ कर जिनसे कशीदे का सिरा हर कट गया है

है महाजन सांस का लेकर बही द्वारे पुकारे
और मन ये सोचता है किस तरह नजरें छुपाये
आँख का आँसू निरन्तर चाहता है हो प्रकाशित
शब्द की ये चाहना है गीत कोई नव सजाये
गीत मन के सिन्धु से जो रोज उमड़े हैं लहर बन
आज ऊपत आ नहीं पाते कहीं पर रुक गये हैं
भावनाओं के हठीले देवदारों के सघन वन
दण्डवत भूशायी हो कर यों पड़े ज्यों चुक गये हैं

दर्द के इक कुंड में जलता हुआ हर स्वप्न   चाहे
कोई आकर सामने स्वाहा स्वधा के मंत्र गाये
पर न जाने यज्ञ के इस कुंड से जो उठ रहा था
हो हविष नभ, को शुंआ वो लग रहा है छंट गया है

धड़कनें बन कर रकम, लिक्खी हुईं सारी , बकाया
रह गईं जो शेष उनको नाम से जोड़ा गया है
एक जो अवसाद में उलास के टांके लगाता
रेशमी धागा, निरन्तर सूत कर तोड़ा गया है
नीलकंठी कामनायें विल्वपत्रों की प्रतीक्षित
पर सजाया है उन्हें आकर धतूरे आक ने ही
राजगद्दी ने जिन्हें वनवास खुद ही दे दिया हो
हो सके अभिषेक उनके, बस उमड़ती खाक से ही

कोस बिख्री सांस के अक…

गीत वे ही आज रचना चाहता हूँ

गीत जो साहित्य की दहलीज पर जा झिलमिलायेंगीत जो टीका समय के भाल पर जाकर लगायेंगीत जिनको गुनगुनाने के लिये हों होंठ आतुरगीत जो हर इक किरन के साथ मिल कर जगमगायेंगीत! हाँ मैं गीत वे ही आज रचना चाहता हूँस्वप्न वे जो आस बुनती है रही भीगे नयन मेंस्वप्न वे जिनकी हुई तय परिणति बस इक अयन मेंस्वप्न जिनको सुरमई करती प्रतीची आरुणी होस्वप्न जिनसे भोर का तारा सजा रहता शयन मेंस्वप्न ! हाँ मैं स्वप्न बन वे, नयन अँजना चाहता हूँशब्द जिनको कह नहीं पाये अधर वे थरथरातेशब्द जिनका अर्थ पाने के लिये स्वर छटपटातेशब्द जिन के कोष में हो ज्ञान शत मन्वन्तरों काशब्द जिनके स्पर्श को सुर सरगमों के झनझनातेशब्द ! हाँ मैं शब्द बन वे कंठ बसना चाहता हूँभाव जिनके सिन्धु में लेतीं हिलोरें लहर प्रतिपलभाव नव अनुभूतियों का जो बने हर बार सम्बलभाव जो अभिव्यक्त होकर भी सदा हैं पास रहतेभाव जो निस्पन्द होकर भी रहे स्वच्छंद चंचलभाव ! हाँ मैं भाव वे बन उर संवरना चाहता हूँ

कितना खोया है कितना पाया है

शाख कलम की फूल अक्षरों के जब नहीं खिला पायेगीछन्दों में जब ढल न सकेंगी,उमड़ भावनायें अंत:स कीवाणी नहीं गीत गायेगी,डुबो रागिनी में स्वर लहरीऔर दृष्टि से कुछ कहने की कला न रह पायेगी बस कीओ सम्बन्धित ! क्या तब भी तुम मुझ से यह संबंध रखोगेजो हर बार गीत को मेरे नया याम देता आया हैकल क्या होगा भान न इसका मुझको है, न है तुमको हीहो सकता है कलम उठाने में हो जायें उंगलियाँ अक्षमहो सकता है मसि ही चुक ले लिखते हुए दिवस की गाथाया हो सकता चुटकी भर में जो यथार्थ लगता,होले भ्रमकल परछाईं जब अपनी ही साथ छोड़ जाये कदमों काक्या तुम तब भी दे पाओगे वह सावन,जो बरासाया हैकल मरुथल की उष्मा बढ़कर सोखे यदि भावों का सागरनुचे परों वाले पाखी सी नहीं कल्पनायें उड़ पायेंमन हो बंजर और धरातल पर न फूटे कोई अंकुरक्षितिज पार के ज्ञान वृत्त जब सहसा मुट्ठी में बँध जायेंकल जब अधर न बोलें कुछ भी महज थरथरा कर रह जायेंक्या तुम वह सब दुहराओगे,जो मैने अब तक गाया हैशब्दों को स्वर देने वाला, उनका रचनाकार अगर कलमुझे बना कर नहीं रख सके, अपनी रचनाओं का माध्यमतो क्या संभव चीन्ह सकोगे मुझको कहीं भूल से चाहेइस अनंत में जहां ,रहा अस्तित्व सू…

मंगल दीप जलाया क्यों था

तुमको अगर चले जाना थाराहों में अंधियारा भर केसंझवाती का तो फिर तुमनेमंगल दीप जलाया क्यों थामुट्ठी भरे गगन पर अपनेस्वीकृत मुझको रही घटायेंचाहा नहीं भटक कर राहेंही आ जायें चन्द्र विभायेंमैं व्यक्तित्वहीन सिकता काअणु इक चिपका कालचक्र सेअपने तक ही सीमित मैनेरखीं सदा निज व्यथा कथायेंतुमने नहीं ढालना था यदिअपने सुर की मृदु सरगम मेंमेरे बिखरे शब्दों को फिरतुमने गीत बनाया क्यों थाबदलीं तुमने परिभाषायेंएक बात यह समझाने कोचुनता है आराध्य,तपस्वीअपनी पूजा करवाने कोराहें ही देहरी तक आतींपा जातीं जब नेह निमंत्रणबादल भी आतुर होता हैनीर धरा पर बरसाने कोजो तपभंग नहीं करना थामेरे विश्वामित्री मन कातो फिर कहो मेनका बनकरतुमने मुझे रिझाया क्यों थानियति यही थी सदा रिक्त हीरही मेरी कांधे की झोलीएक बार भी सोनचिरैय्याआकर न आँगन में बोलीकिस्सों में ही पढ़ी धूप कीफैली हुई सुनहरी चादरधुन्ध कुहासे दिखे लटकतेजब भी कोई खिड़की खोलीतुमको नींद चुरा लेनी थीमेरी इन बोझिल रातों कीतो पलकोंपर सपने का भ्रमलाकर कहो सजाया क्यों था

विमुख सभी सम्बन्ध हो गये

एक द्वार था केवल जिससे अटकी हुई अपेक्षायें थींजीवन के उलझे गतिक्रम ने उसके भी पट बन्द हो गये कथा एक ही दुहराई है हर इक दिन ने उगते उगतेआक्षेपों के हर इक शर का लक्ष्य हमीं को गया बनायाजितने भी अनकिये कार्य थे वे भी लिखे नाम पर अपनेबीजगणित का सूत्र अबूझा रहा,तनिक भी समझ न आयाकभी किसी से स्पष्टिकरण की चर्चायें जैसे ही छेड़ींअनायास ही अधर हमारे पर अनगिन प्रतिबंध हो गयेनयनों के दर्पण तो दिखलाते ही रहे बिम्ब जो सच थेपता नहीं कैसे भ्रम ने आ उन पर भी अधिकार कर लियाशेष नहीं था मार्ग इसलिये नीलकंठ के अनुगामी होजो कुछ मिला भाग में अपने, हमने अंगीकार कर लियाकिन्तु न जाने छिन्दर्न्वेषी समयचक्र की क्या इच्छा थीनिर्णय सभी हवा के पत्रों पर अंकित अनुबन्ध हो गयेबन कर छत्र निगलता आया दिनकर परछाईं भी अपनीलहरें रहीं बहाती पग के नीचे से सिकता को पल पलदिशा बोध के चिह्न उड़ाकर सँग ले गईं दिशायें खुद हीलगा रूठने निमिष निमिष पर धड़कन से सांसों का संबलतुलसी पत्रों गंगाजल की रही तोड़ती दम अभिलाषाविमुख स्वयं ही से अब जितने अपने थे सम्बन्ध हो गये