दीपक एक नहीं जल पाया

शब्दों के ताने बाने बुन लिख तो लिये गीत अनगिनती
सूखे अधरों पर आकर के एक नहीं लेकिन सज पाया

उगी भोर ने सन्नाटे के सुर में अपना राग सँवारा
दोपहरी ने उठा हुआ हर एक प्रश्न हर बार नकारा
संध्या बीती टूटी हुई आस्थाओं के टुकड़े चुनते
रातें व्यस्त रहीं सपनों के अवशेषों के धागे बुनते

जीवन की इस दौड़ धूप में, उठा पटक में उलझे सब पल
अब अंतिम भी विलय हो रहा,किन्तु न दीप एक जल पाया

जब भी मुड़ कर करना चाहा है परछाईं का अवलोकन
उठी हुई आंधी आकर के गई धूल से भर दो लोचन
हैं सपाट राहें, पांवों का चिह्न एक भी कहीं न दिखता
रही गज़ल हर बार अधूरी, दुविधा ग्रस्त ह्रदय क्या लिखता

संचित थे जो रंग तूलिका करती रही खर्च बिन चाहे
श्वेत-श्याम बस शेष तभी तो इन्द्रधनुष अब बन न पाया

बिछे हुए नयनों के आगे सीमाहीन अँधेरे आकर
लहर लहर उद्वेलित होता, सांसों का उथला रत्नाकर
टूटी हुई कमानी लेकर कितनी देर घड़ी चल पाये
आड़ी चौताली धड़कन पर कैसे कोई सुर सध पाये

सरगम के सातों सुर योंतो चिर परिचित से लगे सदा ही
नित्य बुलाया, कोई लेकिन आकर स्वर के साथ न गाया

Comments

ana said…
shabda savyojan ati sundar.........puri kavita ek chhand par chaltaa hai yahii is kavita kaa vaishishta hai ....
जिन सुरों पर विश्वास रहता है, उन्हीं को बेसुरा होते देखा है।
कमाल है भाई .... आप आप ही हैं ..... बेमिसाल !
Mahfooz Ali said…
बहुत सुंदर कविता...

आभार...
बहुत सुन्दर गीत
Shar said…
:(
आपकी यह प्रस्तुति कल २८-७-२०१० बुधवार को चर्चा मंच पर है....आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा ..


http://charchamanch.blogspot.com/
सुंदर भाव...आप की गीतों में भाव की कुशलता के साथ साथ शब्दों का भी एक विशेष आकर्षण होता है..जो पाठक को खींचती है...सुंदर प्रस्तुति के लिए धन्यवाद ..प्रणाम

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