Monday, January 26, 2009

कहो पढ़ा क्या प्रियतम तुमने

गिरिश्रंगों के श्वेत पत्र पर सूरज की किरणों ने आकर
जो सन्देश उभारा उसको कहो पढ़ा क्या प्रियतम तुमने

सागर की गहराई में से निकले मोती अक्षर बन कर
और चले अंगड़ाई लेकर मेघदूत के रथ पर चढ़ कर
पवन डाकिये की झोली में बैठे हुए शिखर तक आये
फिर झोली से बाहर निकले और वादियों में छितराये

जो अनुराग होंठ पर आया नहीं और न आंखों में ही
अकस्मात हो गया समाहित वह शब्दों में आज सुनयने

शिखरों से वादी के पथ पर खड़े हुए तरु देवदार के
रखते हुए शाख के गुलदानों में कुछ अनुभव निखार के
श्वेत शुभ्र हिम की फ़ुहियों में बंधे प्रीत के कुछ सन्देसे
पत्तों के प्याले में कण कण एक एक कर रख सहेजे

ढांपे हुए पांव के चिन्हों को सौगंधों वाली चादर
याद दिला पाई क्या तुमको बीते कल की चन्दन बदने

चंचल बादल का इक टुकड़ा अठखेली करता वितान में
गुपचुप पास क्षितज के जाकर, हौले से कुछ कहे कान में
नये अर्थ देता सा मन के सम्बन्धों की परिभाषा को
बांहों में भरता धरती को छू लेने की अभिलाषा को

जो प्रतीक वह बिना शब्द के समझाने में लगा हुआ है
क्या तुम उसको समझ सको हो, यह बतलाओ कला निमग्ने

वादी की इक शांत झील में खिले कमल की पंखुड़ियों पर
शबनम ने जो पाठ पढ़ाये मधुपों को, गिन उंगलियों पर
ढाई अक्षर में सिमटीं वे शत शत कोटि कोटि गाथायें
जिनको मधुर स्वरों में गातीं नभ के झूले चढ़ीं हवायें

उन गाथाओं का तुमने क्या कोई अक्षर जीकर देखा
या फिर किसी कथानक का तुम पात्र बने हो ! देखे सपने ?

Thursday, January 22, 2009

असलियत बस अँगूठा दिखाती रही

घुँघरुओं से बिछुड़ पैंजनी रह गई
मौन की रागिनी झनझनाती रही
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अव्यवस्थित सपन की सुई हाथ ले
करते तुरपाई हम थे रहे रात भर
चीथड़ों में फ़टे वस्त्र सा पर दिवस
हमको देता अंधेरा रहा कात कर
ज़िन्दगी थी सिरा तकलियों का रही
पूनियां दूर होती गईं वक्त की
सेमली फ़ाहे ओढ़े हुए थे निमिष
असलियत पत्थरों सी मगर सख्त थी

और पग की तली से विमुख राह हो
मोड़ पर ही नजर को चुराती रही

ग्रीष्म की एक ढलती हुई दोपहर
तोड़ती अपनी अंगड़ाईयाँ रह गई
जो बनीं ताल पर चन्द परछाईयां
ज़िन्दगी है वही, ये हवा कह गई
आस का रिक्त गुलदान ले हाथ में
कामना बाग में थी भटकती फ़िरी
ताकती रह गई चातकी प्यास नभ
बूंद झर कर नहीं स्वाति की इक गिरी

कंठ की गठरियाँ राह में लुट गईं
शब्द की आत्मा छटपटाती रही

दॄष्टि की उंगलियाँ खटखटाती रहीं
द्वार चेहरों के खुल न सके अजनबी
कोई आगे बढ़ा ही नहीं थामने
डोरियां नाम की थीं पतंगें कटी
एक पहचान संचित नहीं पास में
आईना हाथ फ़ैलाये कहता रहा
कल्पना का किला था गगन तक बना
बालुओं का महल होके ढहता रहा

और असमंजसों को लपेटे खड़ी
असलियत बस अँगूठा दिखाती रही

Wednesday, January 14, 2009

कल जब सजे गीत की महफ़िल,

कल जब सजे गीत की महफ़िल, पता नहीं हम हौं या न हौं
यही सोच कर आज यहां पर रचना एक सुना जाते हैं

जितना तय हो गया सफ़र यह गीतों का अद्भुत ही तो है
प्रतिध्वनियाँ हमने तलाश कर कितनी चुनी क्षितिज के पीछे
कितने आयामों में लेने दिया कल्पना को परवाजें
कितने सपने खुली आंख से देखे, कितने आँखें मीचे

पता नहीं निस्सीम गिनतियां कब अंकों में सिमट कैद हों
यही सोच कर आज यहाँ यह गिनती एक गिना जाते हैं

जीवन की पुस्तक के पन्ने जितने पढ़े, सभी थे कोरे
दीप वर्तिका के बिन जैसे, हर अध्याय अधूरी ही था
चले पंथ में दिशाहीन हो लक्ष्य हीन हो रहे भटकते
भक्ति गीत का अर्थ बताने न मीरा न सूरा ही था

क्या मालूम कहीं कल होकर मौन न इकतारा रह जाये
यही सोच कर आज यहाँ पर धुन बस एक बजा जाते हैं

पुष्प गंध में शह्द घोलकर, रँगे प्रीत के गीत अकल्पित
आँसू बनकर बही वेदना को चुनकर शिल्पों में ढाला
बहती हुई हवा की टहनी पर आशा की जड़ी उमंगें
और भरा मावस की सूनी रातों में रंगीन उजाला

कल जब टँगे फ़्रेम ईजिल पर, रंग पास में हौं या न हौं
यही सोच कर आज चित्र में सारे रंग भरे जाते हैं

सिन्दूरी संध्या, अरुणाई भोर और कजरारी रातें
अमराई, पनघट चौपालें, पगडंडी, सारंगी के स्वर
मौसम, रिश्ते, पूजा, वन्दन, मांझी गीत, शीश का टीका
घिर आते घनश्याम, और इठला बतियाता कोई निर्झर

निश्चित नहीं दिखाये कल भी दर्पण चित्र आंख को ये सब
यही सोचकर ढाल शब्द में आज चित्र दिखला जाते हैं

Thursday, January 08, 2009

तो करते अनुसरण तुम्हारा

गीत खड़े रहते स्तुतियों में शब्द शीश पर तिलक लगाते
जितनी सुन्दर भाषा होता वैसा यदि व्याकरण तुम्हारा

उंगली थामे हुए उमर की साथ नहीं चल पाता है मन
सम्बन्धों की बन जाती है हर इक बार नई परिभाषा
अपने खींचे हुए दायरे बन जाते हैं चक्रव्यूह जब
सुधियों के पनघट पर रहता प्राणों का हर इक पल प्यासा

जितना ज्ञान लुटाते उसके अंशों से मन दीपित करते
तो युग का इतिहास सुनिश्चित कर लेता अनुकरण तुम्हारा

आवश्यक ये कहाँ एक ही भाव बिकें माणिक व पत्थर
ये तो निर्भर है जौहरी की कितनी रहीं पारखी नजरें
दोष नहीं होता दर्पण का, वह तो वही दिखाता है बस
जैसे चित्र देखने वाले के नयनों में आकर सँवरें

जो पूनम की अँगनाई में शुभ्र वस्त्र जैसे बिखराई
मिलती शांति, उसी के जैसा होता अन्त:करण तुम्हारा

तस्वीरों के जितना सम्मुख, होता उससे अधिक पार्श्व में
जो यह समझ सका उसने ही सत्य छुपा हर इक पहचाना
और अर्थ के अर्थों मे भी अनगिन अर्थ छुपे होते हैं
जिसको ज्ञात हुआ उसने ही अर्थ ज़िन्दगी का है जाना

मन के न्यायिक भावों ने यदि प्रश्न उठाये होते साथी
स्वयं प्रश्न उत्तर बन जाते , आकर करते वरण तुम्हारा

Monday, January 05, 2009

जितने मिले धूप के टुकड़े

समय आ गया एक बार फिर स्वप्न संवारूँ वे, पलकों पर
बीते हुए बरस की, शामिल जो अब भी हैं, परछाईं में

जिधर निगाहें उठें उधर ही दिखें उमड़ते हुए अँधेरे
दोपहरी वाले वितान पर लगे हुए हैं तम के डेरे
सूरज चन्दा और सितारे, लगा हुआ है ग्रहण सभी पर
राहू केतु से गठबन्धन में निगले है दिशा सवेरे

इस अँधियारे की मनमानी गये बरस के साथ खतम हो
भरता हूँ मैं गुलमोहर के रंग भोर की अरुणाई में

जो पथ चूमें कदम वहां पर घिरें न आकर कभी कुहासे
पथ की धूल स्वयं ही आकर करती रहे राह उजियारी
कांटों का विस्तार सिमट कर हो जाये पांखुर गुलाब की
चन्दन की महकों से संवरे खिलती हुई ह्रदय की क्यारी

जितने मिले धूप के टुकड़े, सब को ले आया बटोर कर
ताकि ज्योति के दीप बो सकूँ, नये वर्ष की अँगनाई में

देता हूँ आवाज़ बहारों को मैं नगर चौक में आकर
लौट सकें वे प्रतिध्वनियों के सँग में अम्बर से टकरा कर
और जलाये आंधी आकर दीपक फिर से अभिलाषा का
सीपी तट पर लाकर सौंपे एक बार फिर से रत्नाकर

नव पाथेय स्वयं ही देता रहे बुलावा संकल्पों को
और नीड़ का आमंत्रन हो नित ही संध्या घिर आई में

Thursday, January 01, 2009

नव वर्ष का प्रथम काव्य सुमन- माँ के चरणों में

मात शारदे ने जो अपनी वीणा के तारों को छेड़ा
आशीषों की सरगम बिखरी, ढली शब्द में गीत बन गई

शतदल की पाँखुर पाँखुर से, बिखरे हैं सहस्त्र शत अक्षर
और ओसकण के स्पर्शों से सँवर गईं मात्रायें पूरी
महके हैं परागकण, भावों में गंधों को पिरो गये हैं
छन्दों के कौशल ने अपनी दे दी उन्हें सहज मंजूरी

मां के हाथों की पुस्तक का पना एक खुला जिस क्षण से
मस्तक पर की लिखी पंक्तियां, इक स्वर्णिम संगीत बन गई

हंस वाहिनी के इंगित से शब्द संवरते मुक्ता बन कर
और परों की छुअन, भावना उनमें सहज पिरो जाती है
कलम उजागर कर देती है श्वेत श्याम अक्षर का अंतर
और नजर शब्दों को आकर प्राण सुरों का दे जाती है

माला के मनकों से होती प्रतिबिम्बित हर एक किरण को
छूकर फ़ैली हुई अमावस, विस्मॄत एक अतीत बन गई

शांत शुभ्र, श्वेताभ, सत्यमय भाषा की जननी ने अक्षर
को देकर स्वर संजीवित कर पग पग पर आल्हाद बिखेरा
छोर चूम उसके आंचल का गतिमय हुआ ज्ञान का रथ जब
अज्ञानों के अंधकार को छंटते देखा, हुआ सवेरा

एक बार उसकी अनुकम्पा के पारस ने जिसे छू लिया
वही लेखनी सन्दर्भों की इक अनुकरणीय रीत बन गई