Thursday, April 23, 2009

आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा

बढ़ गई सहसा हवा के नूपुरों की झनझनाहट
और गहरी हो गई कुछ पत्तियों की सरसराहट
दूब के कालीन के बूटे जरा कुछ और निखरे
और कलियों में हुई अनजान सी कुछ सुगबुगाहट

बात यह मुंडेर पर आ एक पंछी ने कहा है
आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा

गंध भेजी है गुलाबों ने बिछे जाये डगर पर
इन्द्रधनुषी हो रहीं देहलीज पर आ अल्पनायें
केसरी परिधान वन्दनवार बन कर सज गये हैं
आरती का थाल ले द्वारे खड़ी हैं कल्पनायें

फ़ुनगियों ने रख हथेली छाँह को, पथ को निहारा
आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा

ले रहीं अँगड़ाइयां अनजान सी मन में उमंगें
आस में डूबी फ़ड़कने लग गईं दोनों भुजायें
दॄष्टि आतुर, अर्घ्य ले जैसे खड़ी कोई सुहागन
बाट जोहे चौथ चन्दा की उभर आयें विभायें

दिन ढले से पूर्व ही आया उतर पहला सितारा
आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा

लग गई जैसे अजन्ता कक्ष में आकर संवरने
खिड़कियों बुनने लगी हैं धूप के रंगीन धागे
सज रहीं अंगनाई में कचनार की कलियां सुकोमल
जो निमिष भर को गये थे सो, सभी वे भाव जागे

धार ने मंदाकिनी की, पंथ को आकर पखारा
आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा

7 comments:

श्यामल सुमन said...

शब्द का संयोग ऐसा भाव को मिलता सहारा।
हो छटा राकेश की तो गीत बन जाये सितारा।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Shar said...

:)

सतपाल said...

कासिद के आते-आते ख़त इक और लिख रखूँ
मै जानता हूँ वो क्या लिखेंगे जवाब में.
बहुत उम्दा रचना..गा़लिब का ये शेर बरबस याद आ गया.

Shardula said...

सोचती हूँ कौन भाग्यवान है अधिक, आप जो ऐसे गीत लिखते हैं, कि हम जो ऐसे गीत सुनते हैं , या वह डाकिया जिसे ये सब देखने और भोगने को मिलेगा, या वह मोहतर्मा जिनका सन्देश आया है :) :)
गुरुजी! इतना सुन्दर गीत ! गलत बात है :)
अब बेचारे हम दो दिन तक कलम उठाते हुए शर्मायेंगे :)

Udan Tashtari said...

ले रहीं अँगड़ाइयां अनजान सी मन में उमंगें
आस में डूबी फ़ड़कने लग गईं दोनों भुजायें
दॄष्टि आतुर, अर्घ्य ले जैसे खड़ी कोई सुहागन
बाट जोहे चौथ चन्दा की उभर आयें विभायें

दिन ढले से पूर्व ही आया उतर पहला सितारा
आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा



--गजब किया है भाई जी...बस !!! कुछ कहने को नहीं.

Shar said...

"दॄष्टि आतुर, अर्घ्य ले जैसे खड़ी कोई सुहागन
बाट जोहे चौथ चन्दा की उभर आयें विभायें "
====
अगली बार ऎसी पंक्तियाँ लिखें तो पहले ज़रा चौथ का व्रत कीजियेगा (निर्जला) फिर चाँद की बाट जोहियेगा "उनका" ध्यान कर के :) :) . और फिर भी बचे रहे तो कलम उठईयेगा और जो मन आये लिखियेगा :)
=====
इतना सुन्दर गीत ! मन नहीं अघाता पढ़ते !

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

भाई सतपाल जी से सहमति.