देहरी शीश टीके लगाती रही

अपने अस्तित्व की पूर्णता के लिये
प्राण की ज्योत्स्ना छटपटाती रही

ओस की बून्द सी दो पहर धूप में
मन के आंगन में उगती हुई प्यास थी
रोज दीपित हुई भोर के साथ में
अर्थ के बिन भटकती हुई रात थी
चाह की चाह थी जान पाये कभी
चाहना है उसे एक किस चाह की
पांव ठिठके रहे बढ़ न पाये तनिक
गुत्थियों में उलझ रह गई राह थी

एक खाका मिले, रंग जिसमें भरे
तूलिका हाथ में कसमसाती रही

चिन्ह संकल्प के धुंध में मिल गये
सारे निर्णय हवायें उड़ा ले गईं
वक्त बाजीगरी का पिटारा बना
दॄष्टियां आईनों में उलझ रह गईं
दिन का पाखी उड़ा तो मुड़ा ही नहीं
रात बैठी रही आकलन के लिये
पॄष्ठ सारे बिना ही लिखे रह गये
शब्द से सिर्फ़ रंगते रहे हाशिये

ज़िन्दगी बनके पुस्तक बिना ज़िल्द की
भूमिका पर अटक फ़ड़फ़ड़ाती रही

देहरी शीश टीके लगाती रही

और अंगनाई की रज बिछौना बनी
स्वस्ति के मंत्र का जाप करती रहीं
हाथ की उंगलियां रोलियों में सनी
पत्थरों से विनय, फूल की पांखुरी
करके अस्तित्व को होम, करती रही
आँख की झील से पर फ़िसलती हुई
आस पिघली हुई रोज झरती रही

आस्था कंठ को चूम वाणी बनी
आई अधरों पे, आ कँपकँपती रही

Comments

रोज दीपित हुई भोर के साथ में
अर्थ के बिन भटकती हुई रात थी
चाह की चाह थी जान पाये कभी
चाहना है उसे एक किस चाह की
पांव ठिठके रहे बढ़ न पाये तनिक
गुत्थियों में उलझ रह गई राह थी

जीवन का एक अटूट सच लगा मुझे इन पक्तियों में ..आप बहुत ही भाव पूर्ण लिखते हैं जो दिल से जुड़ जाता है .लिखते रहे
Parul said…
आँख की झील से पर फ़िसलती हुई
आस पिघली हुई रोज झरती रही

vaah..bahut sundar
राकेश जी
ज़िन्दगी बनके पुस्तक बिना ज़िल्द की
भूमिका पर अटक फ़ड़फ़ड़ाती रही
एक से बढ़ कर एक विलक्षण बिम्बों से सजी ये रचना अद्भुत है. आप को और आप की लेखनी को बारम्बार प्रणाम. इसको जितनी बार पढता हूँ नए नए अर्थ सामने निकल कर आते हैं. क्या कहूँ शब्द हीन हूँ नतमस्तक हो कर.
नीरज
चिन्ह संकल्प के धुंध में मिल गये
सारे निर्णय हवायें उड़ा ले गईं
वक्त बाजीगरी का पिटारा बना
दॄष्टियां आईनों में उलझ रह गईं
दिन का पाखी उड़ा तो मुड़ा ही नहीं
रात बैठी रही आकलन के लिये
पॄष्ठ सारे बिना ही लिखे रह गये
शब्द से सिर्फ़ रंगते रहे हाशिये

ज़िन्दगी बनके पुस्तक बिना ज़िल्द की
भूमिका पर अटक फ़ड़फ़ड़ाती रही

हमेशा की तरह लाजवाब
Udan Tashtari said…
ज़िन्दगी बनके पुस्तक बिना ज़िल्द की
भूमिका पर अटक फ़ड़फ़ड़ाती रही


--वाह, वाह! बहुत जबरदस्त. आनन्द आ जाता है आपके प्रतिकात्मक बिम्ब चयन को पढ़कर. बहुत बधाई.
ज़िन्दगी बनके पुस्तक बिना ज़िल्द की
भूमिका पर अटक फ़ड़फ़ड़ाती रही
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एक कविता अर्ज करता हूँ-
तुम कविता की कद्र करो,
स्मरण करो, संग्रग करो तो,
एक कविता और लिखूगाँ।
अगर कद्र न कर सको तो,
बन्द लिफाफे में बेरंग लौटा देना।
पता न हो तो उसे
यूं ही डाल देना,
कम से कम
लावारीश डाक समझ,
अमानत के तौर पर
सुरक्षित तो रखी पायेगी - शम्भु चौधरी
आदरणीय श्री खंडेलवाल जी,
आपकी कविता बहुत अच्छी है। बधाई।
- शम्भु चौधरी, कोलकाता
http://ehindisahitya.blogspot.com/
http://samajvikas.blogspot.com/
http://samajvikas.in
अभिनव said…
राकेशजी, एक और अद्भुत गीत के लिए मेरी शुभकामनाएं स्वीकारें. आपके गीत पढने के बाद यही लगता है कि किस तरह प्रशंसा करुँ. क्या कहूं..

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