Posts

Showing posts from June, 2007

बस घटा रो गई

ताल पर धड़कनों की नहीं बज सकीं
सांस की सरगमें लग रहा सो गईं

शब्द ने कल भी चूमा नहीं था इन्हें
अधलिखे रह गये पॄष्ठ सब आज भी
कोई परछाईं तक भी नहीं दिख सकी
वीथियों में भटकते हुए याद की
मन के दर्पण में छाई हुई धुंध में
सारे आकार घुलते हुए खो गये
उनके अंकुर न फूटे बदल ॠतु गईं
बीज जो थे ह्रदय में कभी बो गये

शून्य बन कर दिवाकर क्षितिज पर उगा
रोशनी अपनी पहचान तक खो गई

स्वप्न की कूचियां, चित्र कल के बनें
कोशिशों में उलझ्ती हुई रह गईं
फूल सूखे किताबों में मिल न सके
आंधियों में सभी पांखुरी उड़ गईं
गंध को पी गई, वक्त की इक हवा
छाप होठों की रूमाल से धुल गई
विस्मॄति के अंधेरे घने साये में
आकॄति मन में जितनी बसीं घुल गईं

और सावन की राहों से बिछुड़ी हुई
चार आंसू, घटा एक आ रो गई

फिर घिरे संशयों के कुहासे घने
धुन्ध में डूब कर पंथ सब रह गये
आज निष्ठा हुई बुझ चुके दीप सी
शेष संकल्प थे जो सभी बह गये
मौसमों ने चुरा रंग वनफूल के
घाटियों पर घनी पोत दीं स्याहियां
तूलिका रंग सिन्दूर के ढूँढ़ते
है भटकती फिरी आठ अँगनाईया

बिम्ब अँगड़ाई लेकर लगे पूछने
प्रीत की अस्मिता अब किधर को गई

इसीलिये मैं मौन रह गया

एक तुम्हारा प्रश्न अधूरा, दूजे उत्तर जटिल बहुत था
तीजे रुंधी कंठ की वाणी, इसीलिये मैं मौन रह गया

बचपन की पहली सीढ़ी से यौवन की अंतिम पादानें
मंदिर की आरति से लेकर मस्जिद से उठती आजानें
गिरजे की घंटी के सुर में घुलती हुई शंख की गूँजें
थीं हमको आवाज़ लगातीं हम आकर उनको पहचानें

लेकिन पिया घुटी में जो था, उसका कुछ प्रभाव ऐसा था
परछाईं में रहे उलझते, और सत्य हो गौण रह गया

लालायित हम रहे हमेशा, आशीषों के चन्द्रहार के
और अपेक्षित रहे बाग के दिन सारे ही हों बहार के
स्वर्ण-पत्र पर भाग्य लिखेगा सदा, हमारा भाग्य नियंता
और कामनायें ढूंढ़ेंगी, रह रह कर हमको पुकार के

जब ललाट पर लगीं उंगलियां, हमने सोचा राजतिलक है
देखा दर्पण में तो पाया, केवल लगा डिठौन रह गया

सदा शीर्ष के इर्द गिर्द ही रहीं भटकतीं अभिलाषायें
और खोजतीं केवल वे स्वर, जो श्रवनामॄत मंत्र सुनायें
पक्षधार हो द्रोण, कर सके, एकलव्य हर एक नियंत्रित
और दिशायें विजयश्री की धवल पताकायें फ़हरायें

जीवन के इस बीजगणित के लेकिन समीकरण सब उलझे
जो चाहा था पूरा हो ले, वो ही आधा-पौन रह गया

जहां लिया विश्राम काल की गति ने एक निमिष को रुककर
थमे हुए हैं जीवन के पल, अब तक उसी एक बि…

संभव है इस बार

संभव है इस बार सदी के बँधे हुए बन्धन खुल जायें
संभव है इस बार आंसुओं से सारे क्रन्दन धुल जायें
संभव है इस बार नदी के तट की उजड़ी हुई वाटिका
में लहरों से सिंचित होकर महकों के चंदन घुल जायें


जगा रहाहूँ आज नये स्वर, एक यही मैं बात सोचकर
ओ सहभागी कंठ जोड़ लो अपना तुम भी आगे बढ़ कर

माना कल भी घिर आये थे ऐसे ही आशा के बादल
माना इसीलिये खोली थी कलियों ने सुधियों की सांकल
माना कल भी पनघट पर था रीते कलशों का सम्मेलन
माना कल भी गाता था मन मेरा ये आवारा पागल

किन्तु मेरे सहयोगी ! क्षण में सब कुछ सहज बदल जाता है
लिखा हुआ बदलाव समय की उठती गिरती हर करवट पर

साक्षी है इतिहास कि स्थितियां सब परिवर्तनशील रही हैं
गंगायें शिव के केशों से बिना रुके हर बार बही हैं
सब कुछ सम्भव, सब क्षणभंगुर, कहते रामायण, सुखसागर
विश्वासों में ढले दीप को कभी ज्योति की कमी नहीं है

तुम भी मेरे संकल्पों में आओ अपना निश्चय घोलो
तब ही बरसेगी अभिलाषा की अमॄतमय घटा उमड़ कर

एक किरण बन गई चुनौती गहन निशा के अंधियारे को
एक वर्तिका है आमंत्रण, दिन के उज्ज्वल उजियारे को
एक पत्र की अंगड़ाई से उपवन में बहार आ जाती
एक कदम आश्वासन देता है राहों का बंजारे को

एक गीत क…

नजर हो चुकी है सन्यासी

ॠष्यमूक पर बैठे बैठे हमने सारी उमर गँवा दी
किन्तु न आया राह भटक भी, इस पथ पर कोई वनवासी

अपनी परछाईं से भी हम
रहे प्रताड़ित थे हतभागे
आतुर थे इक दिवस समय ये
करवट कोई लेकर जागे
तने शीश पर के वितान के
अँधियारे को पी ले कोई
और दिशा की देहरी चूमें
आकर कभी रश्मियाँ खोई

दस्तक से छिल चुकी हथेली में रेखाओं को तलाशते
अब तो कुशा कमंडल लेकर, नजर हो चुकी है सन्यासी

बारह खानों में घर अपना
बना बैठ रह गये सितारे
था अभिमान बड़ा गुरुओं को
करते सभी समन्वय हारे
जो मध्यम में रहे पिसे वह
दशा न बदली पल भर को भी
उठे हाथ थक गये, थामने
बढ़ा न कोई हो सहयोगी

उलझे समीकरण प्रश्नों को और जटिल करते जाते हैं
कोई हल संभावित होगा, आशा भी न बची जरा सी

नयनों की फुलवारी में बस
पौधे उगे नागफ़नियों के
रिश्ते जितने जुड़े बहारों से
सारे हैं दुश्मनियों के
चन्दन हुइ न देह, लिपटते
रहे किन्तु आ आकर विषधर
नीलबदन हो गये, मिला जो
जीवन का वह रस पी पीकर

आशाओं का लुटा चन्द्रमा, अभिलाषा की सूखी नदिया
अँगनाई में पांव पसारे, बैठी बस घनघोर उदासी

तुम्हारे कुन्तलों को छेड़ने की चाह

तुम्हारे कुन्तलों को छेड़ने की चाहतें लेकर
हवाओं ने घटाओं से पता पूछा तुम्हारा है

गगन की वीथियों में थीं भटकती भोर से संध्या
लगीं थीं ऊबने कोई न साथी साथ में पाकर
अषाढ़ी एक बदली को गली के मोड़ पर देखा
गईं फिर दौड़ पकड़ी बाँह उसकी पास में जाकर

कहा अब है सुनिश्चित कुछ चिकुर लहरायेंगें नभ में
तुम्हारा आगमन इस बात का करता इशारा है

कई दिन हो गये बेचारगी से हाथ को मलते
नहीं कुछ खेलने को साथ में कोई सहेली है
जरा भी बैठती इक पल नहीं है एक मूढ़े पर
यही है बात शायद इसलिये घूमे अकेली है

तुम्हारा चित्र देखा एक दिन पुरबाई के घर में
तभी से हर गली हर मोड़ पर तुमको पुकारा है

बुलाया चाँदनी को नाम ले लेकर तुम्हारा ही
सुरभि से पूछती हर बार उद्गम है कहाँ बोलो
मचल कर सरगमों की रागिनी से ज़िद किये जाती
कहाँ से तान पाई है जरा ये भेद तो खोलो

सुरभि की, चाँदनी की, रागिनी की स्रोत तुम ही हो
तभी बन याचिका इनको उमंगों से निहारा है