अधूरी गाथा
पॄष्ठ रहे सब के सब कोरे, सुध-बुध बिसरा कलम सो गई
शब्द भाव के बीच निरंतर, बढ़ती रही बीच की दूरी
करते करते यत्न थक गया, पर अंतिम अध्याय न लिखा
जीवन के इस रंगमंच की हर गाथा रह गई अधूरी.
काव्य का व्याकरण मैने जाना नहीं छंद आकर स्वयं ही संवरते गये
पॄष्ठ रहे सब के सब कोरे, सुध-बुध बिसरा कलम सो गई
भोर आती रही, रात जाती रही