पृष्ठ उनके खोलते हैं

जानते हो मीत ! सुधियों की घनी अमराईयों में
याद के पाखी निरन्तर डाल पर आ बोलते हैं
रख दिया था ताक पर मन ने उठा जिन पुस्तकों को
फ़ड़फ़ड़ाकर पंख अपने, पृष्ठ उनके खोलते हैं
 
संधियो पर उम्र की, जो चित्र खींचे थे कमल पर
राह में जो चिह्न छोड़े  लड़खड़ाने से संभल कर
दृष्टि के गुलमोहरों ने रात दिन जो सूत काते
अनकहे अनुबन्ध की कुछ पूनियों को आप वट कर
 
पृष्ठ से रंगीन बीती सांझ की अंगड़ाईयों के
रंग लेकर फ़िर हवा की लहरियों में घोलते हैं
 
वे सुनहरे पल कि जब संकल्प था आकाश छू लें
कर सकें चरितार्थ गाथायें,बढ़ा पग नाप भू लें
कल्पना की दूरियों को मुट्ठियों में भर समेटें
इन्द्रधनुषों के हिंडोले पर हवा के साथ झूलें
 
मन उमंगों की कटी पाँखें निहारे मौन गुमसुम
खोज लेने को गगन जब वे परों को तोलते हैं
 
करवटें लेकर समय ने दृश्य कितनी बार बदले
चाहना थी आगतों का अनलिखा हर पृष्ठ पढ़ ले
मोड़ ले अनुकूल कर धाराओं का निर्बाध बहना
हर दिवस को फूल की पांखुर, निशा को ओस कर ले
 
कामनायें पत्र कदली के बने लहरायें जब जब
वे नियति के चक्र बन कर बेर के सम डोलते हैं

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

मन ने हमको बहुत सताया,
हम भी साथ रहे पर उसके।

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...