सिन्धु में लहरें उमड़तीं, भाव यों उमड़े ह्रदय में
किन्तु तट पर शब्द के वह रह गये सारे बिखर कर
छू लिया था जब नयन की चाँदनी ने मन सरोवर
उस घड़ी आलोड़ना होने लगी थी तीव्र मन में
और इंगित एक वह अदॄश्य सा अनुभूत होकर
भर गया दावाग्नियां अनगिन अचानक स्वास वन में
दॄष्टि के आकाश पर बादल उमड़ते कल्पना के
यष्टि में लेकिन तुम्हारी एक न आता सँवर कर
देह को छूकर तुम्हारी मलयजी होती हवा ने
भर लिया है बाँह में आकर मुझे संध्या सकारे
और पहली रश्मि ने चलकर उषा की देहरी स
पॄष्ठ पर नभ के तुम्हारे चित्र ही केवल उभारे
किन्तु चाहा जब कभी मैं आँज लू इनको नयन मे
रंग आये सामने सहसा हजारों ही उमड़ कर
चेतना की दुन्दुभी अवचेतना का मौन गहरा
है तुम्हारी छाप सब पर हैं तुम्ही से सब प्रभावित
ज़िन्दगी में दोपहर हो याकि संध्या हो, निशा हो
हर घड़ी हर प्रहर, पल में एक तुम ही हो समाहित
किन्तु सुधि के आँगनों में हैं प्रतीक्षायें अधूरी
सामने आओ निकलकर कल्पना से, देह धर कर
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नव वर्ष २०२४
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7 comments:
उत्कृष्ट कल्पना मन के कोमल भावों की, गढ़ती है, स्वतः बढ़ती है।
गीत की तो क्या कहूँ...
कुछ टंकण त्रुटियाँ रह गयीं है...कृपया सुधार लें...
Hi,
dil ko chu le wali baat kahi aap ne..
news
बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ हैं.....उम्दा प्रस्तुति
बधाई....
राकेश जी...सुंदर गीत...भावपूर्ण गीत के लिए हार्दिक बधाई...
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