इस नये वर्ष में

चाँदनी से बना अल्पना द्वार पर
इस नये वर्ष का आओ स्वागत करें

आस सपने नये आस के रच रही
कोई क्रम फिर न दुहराये गत वर्ष का
वो अनिश्चय, वो संशय की काली घटा
हर निमिष यों लगा युद्ध का पर्व था
अर्थ की नीतियों की जड़ें खोखली
फिर न रह पायें बीते दिनों की तरह
दीप विश्वास के प्रज्ज्वलित कर उगे
इस नये वर्ष की दीप्तिमय हो सुबह

आओ धुंधले पड़े जितने आकार हैं
रंग भर कर उन्हें इन्द्रधनुषी करे


कामना सज रही है ह्रदय में नई
इस नये वर्ष की भोर की रश्मियां
वॄष्टि बन कर सुधा की बरस जायें औ
शांत हों हर तरफ़ जल रही अग्नियाँश
कर रही है विभाजित ह्रदय की गली
चन्द रेखायें दीवार जो खींचकर
भोर उनका तिमिर पी उजेरा करे
स्नह के एक संकल्प से सींचकर

आओ गत वर्ष की याद के पल उठा
विस्मृति के कलश में संजो कर भरें

इस नये वर्ष में फूल जो भी खिले
गंध केवल लुटाता रहे प्रीत की
रागिनी सरगमें छेड़ती बस रहे
फ़ाग की और मल्हार की गीत की
शब्द ओढ़ें नई भूमिका फिर लिखें
इक कथानक नया, एक अध्याय का
पंक्तियों में झलकता रहे आ जहां
भाव अपनत्व के सिर्फ़ पर्याय का.

आओ हर नैन के कैनवस पर यही
चित्र रंगीन हम मिलके चित्रित करें.

7 comments:

परमजीत बाली said...

राकेश जी, बहुत बढ़िया रचना है।बहुत अच्छी लगी ।

आपको व आपके परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

समयचक्र said...

बढ़िया रचना
नववर्ष की बहुत बहुत बधाई और ढेरो शुभकामनाये

Udan Tashtari said...

नये साल का आगाज आपकी बेहतरीन रचना के साथ..आनन्द आ गया.


वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाने का संकल्प लें और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

- यही हिंदी चिट्ठाजगत और हिन्दी की सच्ची सेवा है।-

नववर्ष की बहुत बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ!

समीर लाल
उड़न तश्तरी

संगीता पुरी said...

नववर्ष पर आपसे ऐसी ही रचना की आस थी .. आपके और आपके परिवार के लिए नववर्ष मंगलमय हो !!

विनोद कुमार पांडेय said...

आपके गीत भरे अंदाज में नये साल का स्वागत बहुत बहुत ही अच्छा लगा ..मैं उम्मीद कर रहा था आपकी रचना का नववर्ष को समर्पित और वो आ भी गई..बहुत बढ़िया रचना...आपको, आपके मित्रगणो, और आपके परिवार के सभी सदस्यों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ..

Shardula said...

:)

गौतम राजरिशी said...

नये साल की समस्त शुभकामनायें, राकेश जी!

ये गीत चुराये ले जा रहा हूँ...

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...