अंधियारे के जितने भी थे संबन्धी

दहलीजों ने भेजा जिनको कभी नहीं कोई आमंत्र
अंधियारे के जितने भी थे संबन्धी बन अतिथि आ गये
नभ ने गलियारों के परदे हटा किरण को पास बुलाया
लेकिन क्षितिजों पर से उमड़े बादल गहरे घने छा गये

अभिलाषा की हर कोंपल को बीन बहारें साथ ले गईं
जीवन की फुलवारी केवल बंजर की पहचान हो गई

यौवन की पहली सीढ़ी पर पूजा की अभिशापित लौ ने
झुलसायी आँखों में सँवरे सपनों की हर इक अँगड़ाई
सन्ध्या ने करील के झुरमुट में जितने भी दीपक टाँगे
उनसे दिशा प्राप्त करने में असफ़ल हो रह गई जुन्हाई

रजनी के आँचल में सिमटे अभिलाषा के निशा-पुष्प सब
और एक यह घटना जैसे पतझर को वरदान हो गई

जितनी भी रेखायें खींची, बनी सभी बाधायें पथ की
खड़ी हो गईं आ मोड़ों पर अवरोधों के फन फ़ैलाय
जीवन की गति को विराम दे गई शपथ वह एक अधूरी
जो गंगा के तट हमने ली थी हाथों में नीर उठाये

होठों पर की हँसी दिशायें बदल बदल आँखों तक पहुंची
और बही बन धारायें जो गज़लों का उन्वान हो गईं

11 comments:

Udan Tashtari said...

अभिलाषा की हर कोंपल को बीन बहारें साथ ले गईं
जीवन की फुलवारी केवल बंजर की पहचान हो गई


-टेस्ट पोस्ट के तुरत बाद ऐसी जबरदस्त गहरी बात...आनन्द आ गया...रोज टेस्टिंग किया किजिये..ऐसी ही उम्दा रचना पढ़ने को मिलती रहेंगी...आपकी जय हो!!

वाणी गीत said...

उनसे दिशा प्राप्त करने में असफ़ल हो रह गई जुन्हाई..

जुन्हाई ...मतलब ..??

होठों पर की हँसी दिशायें बदल बदल आँखों तक पहुंची
और बही बन धारायें जो गज़लों का उन्वान हो गईं

गीतों ग़ज़लों की रचना ऐसे ही तो होती है
बहुत बढ़िया ..!!

विनोद कुमार पांडेय said...

राकेश जी, अभी कुछ दिनों से आपके ब्लॉग पर आना शुरू किया हूँ आपकी रचनाओं के बारे में मैं क्या कहूँ एक से बढ़ कर होती है भावनाएँ कूट कूट कर भरी होती है. कभी प्यार का सुंदर एहसास,कभी जीवन की वास्तविकता और अभी आत्मविश्वास से भरपूर कविता हमें तो बहुत भाती है अब शायद ही आप की कोई कविता मुझसे छूट पाए...बहुत बढ़िया लगती है आपकी रचनाएँ..बस ऐसे ही लिखते रहिए भगवान आपकी लेखनी की उम्र हज़ारों साल कर दे...धन्यवाद

ललित शर्मा said...

जितनी भी रेखायें खींची, बनी सभी बाधायें पथ की
खड़ी हो गईं आ मोड़ों पर अवरोधों के फन फ़ैलाय
जीवन की गति को विराम दे गई शपथ वह एक अधूरीजो गंगा के तट हमने ली थी हाथों में नीर उठाये
बहुत सुंदर कविता पढने मिली- बधाई

Nirmla Kapila said...

जितनी भी रेखायें खींची, बनी सभी बाधायें पथ की
खड़ी हो गईं आ मोड़ों पर अवरोधों के फन फ़ैलाय
जीवन की गति को विराम दे गई शपथ वह एक अधूरी
जो गंगा के तट हमने ली थी हाथों में नीर उठाये

होठों पर की हँसी दिशायें बदल बदल आँखों तक पहुंची
और बही बन धारायें जो गज़लों का उन्वान हो गईं
बहुत सुन्दर रचना है । बधाई

Toon India said...

bahut hi badiya
do check out
www.simplypoet.com
World's first multi- lingual poetry portal!!

aapke bahut sarre future fans aapki kavitayein padne ka intezaar kar rahein hai ..do login and post.

IRFAN said...

Bhaut utkrasht kavita!Saadhuvaad.

IRFAN said...

Oh. Yeh test post hai.!?
Udan tashtariji ne aapki post per comment kiya hai to aapke blog ko safalta ke aasman per udne se koi nahin rok sakta.
Shubhkaamnaayein!

रंजना said...

Adwiteey !!! Atisundar !!! Aur kya kahun....

यशवन्त माथुर said...

आज 21/01/2013 को आपकी यह पोस्ट (दीप्ति शर्मा जी की प्रस्तुति मे ) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!

Madan Mohan Saxena said...

very nice.

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...