लेकिन कभी कभी जाने क्यों

असमंजस के धागों से हम यूं तो दूर रहे हैं अक्सर
किंकर्तव्यविमूढ़ हुए हैं लेकिन कभी कभी जाने क्यों

दिन व्यय किया रखा तब हमने निमिष निमिष का जोखा लेखा
हर रिश्ते को हर नाते को नापा और तोल कर देखा
परखा अपनी एक कसौटी पर जो मिला कहीं भी कुछ भी
और सदा अपनी सीमायें तय कर, खींचीं लक्ष्मण रेखा

निर्धारित है रही समय की गति ये हमको ज्ञात रहा है
चाहा कालचक्र रुक जाये, लेकिन कभी कभी जाने क्यों

बातें करते हैं अर्थात लिये हो ताकि नहीं कोई भ्रम
धारा से परिचय से पहले जान लिया है उसका उद्गम
डगमग पग हों नहीं इसलिये चले संतुलित कर कदमों को
मानचित्र पर राह बनाई, हो न सके कोई भी दिग्भ्रम

परिभाषा की व्याख्याओं में गहरे खूब लगाये गोते
शब्द अपैरिचित हो जाते हैं लेकिन कभी कभी जाने क्यों

दुविधा, संशय, संदेहों से परिचय कभी नहीं हम जोड़े
आशंका के धागे कत लें, इससे पहले ही सब तोड़े
अगवानी के लिये द्वार पर निश्चय की प्रतिमा रख दी थी
ऊहापोह भरे पल जितने भी थे वे सब पीछे छोड़े

हम हर बार चुनौती देकर बाधाओं को पास बुलाते
परछाई से डर जाते हैं लेकिन कभी कभी जाने क्यों

4 comments:

Unknown said...

saadhu ! saadhu !
waah !
waah !
dhnya kar diya aaj ki subah ko aapne..........
adbhut
anupam
abhinav geet___________________
aapko hardik hardik badhaiyan aur shubhechayen

Udan Tashtari said...

असमंजस के धागों से हम यूं तो दूर रहे हैं अक्सर
किंकर्तव्यविमूढ़ हुए हैं लेकिन कभी कभी जाने क्यों

अह्हा!! वाह!! अनुपम गीत भाई जी.


वापस आ गया हूँ..कल आपको परेशान किया जायेगा फोन पर. :)

रंजीत/ Ranjit said...

man kee guthhiyon ka lajwab abhivyaktee. achha laga
Ranjit

Shar said...

:)

फिर मैं गीत नया बुनता हूँ

  भोजपत्र पर लिखी कथाए भावुक मन का मृदु संवेदन दिनकर का उर्वश -पुरू के रूप प्रेम में डूबा लेखन काव्य “ उर्मिला ” मुझे गुप्त की पीड़ा का नि...