तीन सौवीं प्रस्तुति---सांझ का दिया जला नहीं

सूरज आज भी अपने समय पर ही निकला है और प्राची से ही निकला है, मौसम में भी कोई परिवर्तन नहीं. सब कुछ वैसे का वैसा ही है केवल एक बात अलग है. आज गीत कलश पर यह तीन सौवीं प्रस्तुति है.आपके स्नेह ने प्रेरणा बन कर इस यात्रा में निरन्तर गतिमय रहने का प्रोत्साहन दिया है और वही स्नेह मेरा मार्गदर्शक रहा है. आप सभी को आभार देते हुए प्रस्तुत है

साँझ का दिया जला नहीं


भोर जब हुई तो पंछियों ने गीत गाये थे
रश्मियों के तार छू हवा ने गुनगुनाये थे
पर छली थी दोपहर, सो एक घात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई

नीड़ ने बना रखी थी द्वार एक अल्पना
और हाथ में उंड़ेल रंग भर रही हिना
लौट कर कदम दिवस के जब इधर को आयेंगे
पल थके तिवारियों में आ के पसर जायेंगे
सिगड़ियों में आग जागने से मना कर गई
गुड़गुड़ी उठी न जाने किस घड़ी किधर गई
अलगनी पे जो अटक के रह गये थे तौलिये
एक पल में जाने कैसे पाग बन को सो लिये

पांव जो पखारती
आ थकन उतारती
गागरी बिखर के रिक्त इक परात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं, कि रात हो गई

ज़िन्दगी बनी रही अधूरा इक समीकरण
एक संधि पे अटक गई समूची व्याकरण
प्रश्न पत्र में मिले जो प्रश्न थे सभी सरल
पर न जाने क्यों जटिल हुआ सभी का अंत हल
उत्तरों की माल हो गई किताब से पॄथा
लग रहा प्रयत्न जो थे वो सभी हुए वॄथा
देह बांसुरी बनी, न सांस रास कर सकी
और रिक्त झोलियों में आ न आस भर सकी

होंठ खुल सके नहीं
शब्द मिल सके नहीं
जो कही गई, वही अधूरी बात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई

याद की किताब के पलटते पॄष्ठ रह गये
जो जले थे दीप साथ, धार में वे बह गये
रोशनी के पक्षपात यूँ हमारे सँग हुए
तीलियाँ उगल गईं जलीं तो पंथ में धुंये
दॄष्टि के वितान पर कुहासे घिर्ते आ रहे
मौन कंठ पाखियों के शून्य गुनगुना गये
उमड़ रही घटाओं में सिमट गया सभी गगन
शांत हो गई उठी अगन भरी हुई लगन

भाग्य रेख चुक गई
ज्योति हो विमुख गई
शह लगी न एक बार और मात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई

प्यार था बढ़ा गगन में डोर बिन पतंग सा
सावनी मल्हार में घुली हुई उमंग सा
झालरी बसन्त की बहार की जहाँ उड़ी
आस रह गई ठिठक के मोड़ पे वहीं खड़ी
गंध् उड़ गई हवा में फूल के पराग सी
दोपहर में जेठ के उमगते हुए फ़ाग सी
पतझड़ी हवायें नॄत्य कर गईं घड़ी घड़ी
शाख से गिरी नहीं गगन से बूंद जो झरी

वक्त बीतता रहा
कोष रीतता रहा
ज़िन्दगी बिना दुल्हन की इक बरात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई

23 comments:

Shar said...

:)

नितिन व्यास said...

तीन सौंवी प्रस्तुति पर बधाई

Shardula said...

आज के शुभ दिन यह गीत ? ये तो गलत बात है गुरुजी.
हमें आज आपके जन्म दिन पे ऐसा कोई भी गीत स्वीकार नहीं जिसमें इतना अवसाद हो :(
माना गीत बहुत सुन्दर है, दार्शनिक है, पर बाबा ये कोई तरीका हुआ अपने जीवन के नए साल का स्वागत करने का!
चलिए, अमरीका में तो अभी दिन नहीं हुआ है, सो सुबह उठ के एक और गीत पोस्ट कीजिए. देखिये बेचारा नवागंतुक, नन्हा साल, छोटे बच्चे जैसा आपकी इस दार्शनिक, चाणक्यमयी फटकार से कैसा डर के कोने में खडा है :(
बहुत बहुत नमन हमारी तरफ से, आपके जन्म दिन पे !
सादर प्रणाम !
शार्दुला
P.S: इस 300th गीत पे सही टिप्पणी बाद में करेंगे :)

मीनाक्षी said...

आपकी 300वीं पोस्ट ,,,,और आपका जन्मदिन.... ढेरों बधाइयाँ और शुभकामनाएँ

Parul said...

janamdin ki badhaayi RAKESH ji...

Udan Tashtari said...

वाह वाह!! तीन सौंवी प्रस्तुति पर बधाई-ऐसे ऐसे कई सौ और आने है, जिनका बेसब्री से इन्तजार है. अनेक शुभकामनाऐं.

Udan Tashtari said...

ओह, तो आज आपका जन्म दिन भी है-इस बात पर तीन सौंवी पोस्ट पर तीन सौ बार बधाई..कल फोन पर केक खायेंगे आपसे. :)

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया गीत .. और कुछ तो कह सकती नहीं .. तीन सौंवी पोस्‍ट और जन्‍मदिन पर ढेरो बधाइयां और शुभकामनाएं।

Anil Pusadkar said...

डबल बधाई!जन्म दिवस की और तीन सौवी पोस्ट की!

नीरज गोस्वामी said...

मुझे आपकी तीन सौवीं पोस्ट की जानकारी से कोई आर्श्चय नहीं हुआ...बल्कि अगर तीन हजारवीं होती तो भी नहीं होता...मुझे आपकी कलम की क्षमता के प्रवाह का अंदाजा है...आप की कलम से काव्य रस धार ऐसे ही बहती है जैसे झरने से पानी...लगातार... अविरल... सुमुधुर... बधाई...
नीरज

Shardula said...

कौन ये है आ रहा! -- अभिनन्दन गीत
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नभ में आ के सूर्य ने, स्वर्ण को तपा दिया
ढीठ सा खड़ा रहा, रजत विधु ना घर गया
और राज़ जान के धरा स्वतः ही हंस पड़ी
आ गई, क्या आ गई है, उसके आने की घड़ी ?
कौन ये है आ रहा ?

मुख में मुद्रिका रखे, मछ्ली देखो आ गई
गौतमी बिना शिला बने ही परस पा गई
नेह रिक्त दीप भी, जल उठें हैं राग सुन
खिल गयीं आमावासें चाँदनी का जाल बुन
कौन गुनगुना रहा ?

किसके आगमन पे आज पेड़ भी हैं नत खड़े
फूल राह में खिलें कि पाँव उसके जा चढें
और शारदे स्वयं कहे कि पथ प्रशस्त हो
ज्योत्सना ये ज्ञान की, आसक्त हो ना अस्त हो!
उसका पुत्र गा रहा !

+++++++++++++++++++++

जन्म दिवस मंगलमय हो!
सादर शार्दुला

रंजना said...

शब्दशः शार्दूला जी के शब्द में मैं अपने शब्द मिला रही हूँ......इसके आगे और कुछ क्या कहा जाय सूझ नहीं रहा....

सदा स्वस्थ, सुखी एवं प्रसन्न रहें...जन्म दिन मंगलमय हो....

माता की कृपा से रचनाओं के इतने अम्बार लगें की उन्हें गिन पाना सरल न रहे....सतत सुन्दर लेखन हेतु अनंत शुभकामनाये...

दिगम्बर नासवा said...

राकेश जी.....Sabse pahle to aap को जन्मदिन की बधाई fir तीन सौंवी पोस्ट badhaai......lajawaab

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आपकी लेखनी यूँ ही चलती रहे और नित नये गीत रचती रहे राकेश भाई
३०० वीँ पोस्ट के लिये मुबारक हो
स स्नेह,
- लावण्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

& Many Happy Returns of the day, belated hi sahi ..

अनूप शुक्ल said...

जन्मदिन और तीन सौंवी पोस्ट के लिये बधाई!

पंकज सुबीर said...

उफ चूक गया जन्‍मदिन की बधाई देने से । एक दिन की देरी से जन्‍म दिन की ढेरों शुभकामनाऐं । आपकी लेखनी इसी प्रकार काव्‍य सिरजती रहे और हम जैसे लोंगों को काव्‍य सिखाती रहे ।

कंचन सिंह चौहान said...

ज़िन्दगी बनी रही अधूरा इक समीकरण
एक संधि पे अटक गई समूची व्याकरण
प्रश्न पत्र में मिले जो प्रश्न थे सभी सरल
पर न जाने क्यों जटिल हुआ सभी का अंत हल
उत्तरों की माल हो गई किताब से पॄथा
लग रहा प्रयत्न जो थे वो सभी हुए वॄथा
देह बांसुरी बनी, न सांस रास कर सकी
और रिक्त झोलियों में आ न आस भर सकी

होंठ खुल सके नहीं
शब्द मिल सके नहीं
जो कही गई, वही अधूरी बात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई

इन पंक्तियों के लेखक को बधाई..! कवि के जन्म दिन की बधाई..! और ३०० वीं पोस्ट की बधाई

बी एस पाबला said...

देर से ही सही, जनमदिन की बधाई

इस जानकारी को यहाँ जोड़ दिया गया है

Shar said...

इस ३००वीं कविता के लिए केवल तीन शब्द :
कारवाँ गुज़र गया . . .

राकेश खंडेलवाल said...

जो मिलीं कामनायें इतनी आभारी हूँ आभारी हूँ
मन के उद्गार यही नुकले मैं जुड़ा रहूँगा तुमसे ही
शब्दों की डोरी हमको है आपस में बांधे मित्र मेरे
लिखना,पढ़ना, हँसना गाना, सब कुछ तो सीखा तुमसे ही

और आपके शब्द सदा ही मुझे प्रेरणा देते आये
वरना कहाँ हुआ यह संभव एकाकीमन कुछ गा पाये
मैने तो केवल छन्दों के बाने में उनको बुन डाला
जीवन की क्यारी में दिन ने शब्दों के जो फूल उगाये

सादर साभार

राकेश

शोभना चौरे said...

bhut bdhya.
badhai ho

गौतम राजरिशी said...

विलंब से आने के लिये क्षमाप्राथी हूँ राकेश जी,
इधर कई दिनों से आ नहीं पाया था..
आज पता चला कि तीन सौवीं पोस्ट थी ये।
उफ़्फ़्फ़्फ़!
आपके लिये तो बस श्रद्धा और आदर के भाव उपजते हैं, जब भी सोचता हूँ।
हार्दिक बधाई कबूल करें मुझ अदने की ओर से भी।
और जन्म-दिन की भी विलंब से शुभकामनायें...
एक दिन हम यूं ही इस तीन सौवीं पोस्ट को तीन हजार तक भी पहुँचते देखेंगे, इन्हीं कमनाओं के साथ-गौतम

सूर्य फिर करने लगा है

रंग अरुणाई हुआ है सुरमये प्राची क्षितिज का रोशनी की दस्तकें सुन रात के डूबे सितारे राह ने भेजा निमंत्रण इक नई मंज़िल बनाकर नीड तत्प...