किसलिये फिर उत्तरों की कुछ अपेक्षायें करूँ मैं

रह गये हैं प्रश्न सारे कंठ में ही जब अटक कर
किसलिये फिर उत्तरों की कुछ अपेक्षायें करूँ मैं

जो विसंगतियाँ बिखेरीं ज़िन्दगी ने पंथ में आ
मैं उन्हें अरुणाई कर के भोर की जीता रहा हूँ
दोपहर ने जो पिघल कर सांझ के प्याले भरे हैं
पीर के वे पल निरंतर ओक भर पीता रहा हूँ
रात के बिखरे चिकुर में गंध ले निशिगंध वाली
गूँथता मंदाकिनी की लहर के मोती उठाकर
स्वप्न की दहलीज पर जो आ उतर जाते अचानक
याद के पैबन्द अपने मौन से सीता रहा हूँ

उंगलियाँ का काम ही जब हो गया पैबन्द करना
किसलिये फिर एक धागा भी पिरोने से डरूँ मैं

डूब कर जो दंभ में खोई हुइ है मानसिकता
कोशिशें सारी विफ़ल हैं एक पल उसको उबारूँ
चाहना जिस बिम्ब की है आईने में देख पाना
वो मुझे दिखता नहीं है चाहे जितना भी निहारूँ
ढीठ हैं सपने दिवस के, पॄष्ठ पलकों के न छोड़ें
लिख रहे हैं दॄष्टि भ्रम की एक नव फिर से कहानी
चेतना के तर्क को घेरे खड़े हैं आवरण कुछ
कोई भी उत्तर नहीं है चाहे जितना भी पुकारूँ

रोष पतझड़ का खड़ा है राह में बाहें पसारे
सोचता हूँ क्यों नहीं फिर पात बन क ही झरूँ मैं

राह पर चलते हुए विपरीत जो पग हो गये तो
कह दिया है दोष पथ का, पांव का माना नहीं है
अर्धव्यासों की डगर पर रह गया केवल उलझ कर
जो दिशाओं ने कहा वह सत्य ही माना नहीं है
हठ अहम का बन गया बाधा समन्वय की डगर की
जो कसौटी थे समय की, कह दिया परछाई केवल
मुट्ठियों में भर लिया जो सामने था, ये न सोचा
साधना का अर्थ होता मात्र बस पाना नहीं है

नीर कब संचित शिवालय के कलश में हो सका है
किसलिये फिर छिद्र वाली एक गागर को भरूँ मैं

6 comments:

Shardula said...

गुरुदेव,
"नीर कब संचित शिवालय के कलश में हो सका है
किसलिये फिर छिद्र वाली एक गागर को भरूँ मैं"
"रह गये हैं प्रश्न सारे कंठ में ही जब अटक कर
किसलिये फिर उत्तरों की कुछ अपेक्षायें करूँ मैं"

वैसे भी आपने ही तो कहा है !

"साधना का अर्थ होता मात्र बस पाना नहीं है"

-----
आज ये व्यथा क्यों गुरुदेव ? कुछ लिखा है आपका मार्मिक गीत पढ के जल्दी-जल्दी । श्री-चरणो में अर्पित है:

"भाल पर जिसके माँ गौरी
रोली-चंदन घिस लगाती
केश उसके छूने की आज्ञा
छिद्र-युत-घट धार पाती ।

नीर का संचय नहीं बस
लक्ष्य जीवन का हमारे
जो कलुष धोता जगत के
जग 'देव' कह उसको पुकारे ।

मानव करे यदि प्रश्न ना तो
उत्तरों को कौन ढूँढे
पुष्प तो खिल कर रहेंगे
या पग चढें या केश गूंथे !"

सादर, शार्दुला

अशोक मधुप said...

उंगलियाँ का काम ही जब हो गया पैबन्द करना
किसलिये फिर एक धागा भी पिरोने से डरूँ मैं
बहुत अच्छी कविता। बधाई

युग-विमर्श said...

'दोपहर ने जो पिघलकर सांझ के प्याले भरे हैं' और 'याद के पैबंद अपने मौन से सीता रहा हूँ' जैसे प्रयोग अच्छे लगे.

नीरज गोस्वामी said...

चाहना जिस बिम्ब की है आईने में देख पाना
वो मुझे दिखता नहीं है चाहे जितना भी निहारूँ
ढीठ हैं सपने दिवस के, पॄष्ठ पलकों के न छोड़ें
लिख रहे हैं दॄष्टि भ्रन की एक नव फिर से कहानी
अद्भुत लेखन राकेश जी अद्भुत....क्या कहूँ???? वाह...वा....
नीरज

Shar said...

"गूँथता मंदाकिनी की लहर के मोटी उठाकर"
Kya Sir ji!!
'मोटी' को क्यों उठाते हैं, थक जाते होंगे :)
कितनी बार कहा है, मोती ढूँढिये , मोटी नहीं :)
====
अब जरा मुस्कुराइये :)

परमजीत बाली said...

बहुत ही सुन्दर रचना है।

राह पर चलते हुए विपरीत जो पग हो गये तो
कह दिया है दोष पथ का, पांव का माना नहीं है
अर्धव्यासों की डगर पर रह गया केवल उलझ कर
जो दिशाओं ने कहा वह सत्य ही माना नहीं है

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...