मन पागल कुछ आज न बोले

मन मेरा कुछ आज न बोले

आशाओं के गुलदस्ते में सपनो की सतरंगी कलियां
अभिलाषा से सुरभित होती हैं अलसाई देहरी गलियाँ
वॄन्दावन से उमड़ी धुन के साथ ताल मिलती धड़कन की
बाहों में अँगड़ाई लेती सी महकें हैं चन्दन तन की
नूपुर की आवाज़ सरसती रह रह कानों में रस घोले

मन प्रमुदित कुछ आज न बोले

पलकों की कोरों पर आकर संवर रहे नैना कजरारे
पाटल पर बन चित्र खिल रहे, रसमय अधर रंगे रतनारे
करती है आरक्त कपोलों को गुलाब सा, लज्जा आकर
और छेड़ता एक पपीहा पीहू पीहू की धुन गाकर
चित्र एक ही स्वप्न जाग में नयनों के आगे आ डोले

मन पागल कुछ आज न बोले

उंगली छुड़ा कल्पना उड़ती फिर अतीत के गलियारों में
फिर आकंठ डूबती सुधियां प्रथम वाक्य की रसधारों में
पहली दॄष्टि-साधना का वह एक निमिष हीरे सा दमके
स्मॄतियों के विस्तारित नभ में ,बन सूरज पल पल चमके
नये नये आयामों की मंजूषा को अनुभूति खोले

मन हो मगन न कुछ भी बोले

5 comments:

Anil Pusadkar said...

sunder

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मन हो मगन न कुछ भी बोले
आपकी रचना पढ़ कर भी कुछ मन ऐसे ही मगन हो जाता है .बहुत खुबसूरत लिखा है आपने

मीत said...

उंगली छुड़ा कल्पना उड़ती फिर अतीत के गलियारों में
फिर आकंठ डूबती सुधियां प्रथम वाक्य की रसधारों में
पहली दॄष्टि-साधना का वह एक निमिष हीरे सा दमके
स्मॄतियों के विस्तारित नभ में ,बन सूरज पल पल चमके
नये नये आयामों की मंजूषा को अनुभूति खोले

क्या बात है ..... बहुत सुंदर .....

Udan Tashtari said...

पलकों की कोरों पर आकर संवर रहे नैना कजरारे
पाटल पर बन चित्र खिल रहे, रसमय अधर रंगे रतनारे
करती है आरक्त कपोलों को गुलाब सा, लज्जा आकर
और छेड़ता एक पपीहा पीहू पीहू की धुन गाकर
चित्र एक ही स्वप्न जाग में नयनों के आगे आ डोले


---बहुत खुबसूरत-बहुत सुंदर!!

Shar said...

Dekhiye,In buddhijeeviyon ka kamaal, phir is rachna pe chaar hi comment!
Bahut sunder rachna hei!
jaise rone-dhone ki acting karne se adhik difficult hota hei comedy karna, weise hi dukh-takleef ki kavita se jyada mushkil hei shringar pe rachna.
Bahu khoobsoorat. Bahut shaaleen!
Guruji badhayee sweekarien!

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तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...