किसके चित्र बनाती

जाने किसके चन्द्रबदन की खुशबू से महकी हैं राहें
जाने किसकी यादे पीकर यह पुरबा मदमस्त हुई है

किसके पग की छाप धरा पर रचती जाती है रांगोली
किसके हाथों की मेंहदी की बनने लगी भोर हमजोली
किसके गालों की सुरखी से लगा दहकने है पलाशवन
किसकी बांकी चितवन ने है सुरा आज उपवन में घोली

जाने किसके चित्र बनाती आज तूलिका व्यस्त हुई है
जाने किसकी यादें पीकर यह पुरबा मदमस्त हुई है

किसके अधरों की है ये स्मित, जंगल में बहार ले आइ
किसके स्वर की मिश्री लेकर कोयल गीत कोई गा पाई
किसकी अँगड़ाई से सोने लगे सितारे नभ आते ही
पूर्ण स्रष्टि पर पड़ी हुई है जाने यह किसकी परछाई

आशा किसके मंदहास की स्वीकॄति पा विश्वस्त हुई है
जाने किसकी यादें पीकर यह पुरबा मदमस्त हुई है

जाने किसके कुन्तल ने की हैं नभ की आँखें कजरारी
लहराती चूनर से किसकी, मलयज ने वादियां बुहारीं
क्या तुम हो वह कलासाधिके, ओ शतरूपे, मधुर कल्पना
जिसने हर सौन्दर्य कला की, परिभाषायें और सँवारी

बेचैनी धड़कन की, जिसका सम्बल पा आश्वस्त हुई है
तुम ही हो वह छूकर जिसको यह पुरबा मदमस्त हुई है

3 comments:

Udan Tashtari said...

वाह राकेश भाई, बिना कुछ कहे बहुत बधाई.
--समीर लाल

Pratyaksha said...

बहुत सुंदर !

Anonymous said...

http://chitthacharcha.blogspot.com/2006/08/blog-post_25.html

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...