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Showing posts from February, 2014

कोई श्रृंगार के गीत लिखता रहा

कोई श्रृंगार के गीत लिखता रहाचाँदनी में डुबो कर कलम रात भरशाख ले एक निशिगंध की छेड़ताथा रहा रागिनी इक नई रात भरबन के श्रोता रहा चाँद था सामनेतालियाँ खूब तारे बजाते रहेचंद बादल मगन हो गए यों लगाजो इधर से उधर डगमगाते रहेएक नीहारिका बन गई अंतरासामने आ संवरते हुए गीत काराशियों ने सहज मुस्कुराते हुएनाम अंकित किया गीत पर प्रीत काओस झरती हुई, गंध पीती हुईस्याहिया  बन के ढलती रही रात भरकल्पना के पखेरू खड़े आ हुयेपार खिड़की के थे विस्मयों में भरेकुछ सपन नभ की मंदाकिनी से उतरबूँद बन पृष्ठ पर सामने आ गिरेबिम्ब में से छलक एक सौगंध नेएक पर्याय सम्बन्ध का लिख दियाऔर अनुबंध की उँगलियों में रचाएक बूटा हिना का तुरत रख दियाभोर की राह को भूल बैठा रहाभोर का इक सितारा यहीं रात भरसुनते प्राची हुई तन्मयी इस तरहद्वार खोले नहीं थे उषा के लियेसारे पाखी बने एक प्रतिमा रहेहोके अभिमंत्रिता,सरगमों को पियेमौन हो आरती के सुरों ने रखींगीत सुनते हुये होंठ पर उंगलियाँसूर्य को अपने भुजपाश में बाँध करआँख मूँदे रहीं व्योम की खिड़कियाँदूर फ़ैला क्षितिज कंठ देती रहीशब्द में बिजलियों को भरे रात भर

रोशनी के बदलते रहे अर्थ भी

नित्य हम एक सूने पड़े पृष्ठ परदृष्टि अपनी निरन्तर गड़ाते रहेकेन्द्र पर चक्र के रह गये हम खड़ेदिन परिधि थाम हमको चिढ़ाते रहेरश्मियां छटपटाती धुरी पर रहींपूर्व आने के पल दूर जाते रहेगीत के गांव में द्वार खुलते नहींखटखटाते हुए उंगलियाँ थक गईंलेखनी का समन्दर लगा चुक गयाभावनायें उमड़ती हुई रुक गईंआ प्रतीची भी प्राची में घुलती रहीरोशनी के बदलते रहे अर्थ भीबाँह में एक पल थामने के लियेजितने उपक्रम किये,वे रहे च्यर्थ हीसूर्य के अर्घ्य को जल कलश जो भरेद्वार मावस के उनको चढ़ाते रहेरात के पृष्ठ पर तारकों ने लिखीजो कहानी,समझ वो नहीं आ सकीनीड़ को छोड़ कर, आई फिर लौट करराग गौरेय्याअ कोई नहीं गा सकीचाँद ने डाल घूँघट,छिपा चाँदनी,पालकी रात की रिक्त कर दी विदाकिन्तु वह रुक गई भोर के द्वार परसोचते सब रहे, ये भला क्या हुआअंशुमाली स्वयं बीज बोते हुएज्योत्सना क्यारियों से चुराते रहेबादलों से ढकीं धूप की कोंपलेंआवरण को हटा मुस्कुराई नहींशाख पर पेंजनी ओस की थी टँगीआतुरा तो रही, झनझनाई नहींपंथ ने कोई पाथेय बाँधा नहींनीड़ खोले बिना द्वार सोता रहाऔर तय था घटित जो भी होना हुआहम अपरिचित रहे और होता रहादीप जल बुझ गये थालियो…

प्रश्न हाथ में नहीं आ सका

लिख देती है भोर गगन में उठते सब प्रश्नों के उत्तरकिन्तु ढूँढ़ने में ही उनको सारा दिवस बीत जाता हैमानचित्र तो सौंप चुका है हमें परीक्षक पहले से हीअंकित की हर राह हथेली पर रेखायें खींच खींच करकिन्तु दिशा का ज्ञान दे सके, कुतुबनुमा है परे पहुँच केकोई चिह्न  नहीं दिखता  है आंख खोलकर,पलक मींच करमन उद्देश्यहीन रह जाता,किंकर्त्तव्यविमूढ़ हुआ बसकेवल पागल बंजारे सा होकर खड़ा गीत   गाता हैमान उदीची चले जिसे हम,पूरब कभी कभी थी पश्चिमचलती रहीं दिशायें बदले रूप वृत्त में ही ढल ढल करकब ईशान बनी थी दक्षिण,कब आग्नेय प्रतीची होतीप्राची रही सदा ही उठते हुये पगों से अनबन कर करअभिमंत्रित कर फ़ेंके पासे,अभिलाषा ले विजयश्री कीशातिर समय किन्तु हर बाजी उपक्रम  बिना जीत जाता हैखिंची हुई हैं गंतव्यों तक, सोचे थे जितनी रेखायेंउनकी इति भी उद्गम ही है,नहीं कभी यह समझ आ सकाऔर जिसे गंतव्य समझते रहे, वही प्रारम्भ रहा थाउत्तर तो थे सन्मुख केवल प्रश्न हाथ में नहीं आ सकाउषा नित्य थमाती तो है निष्ठा भर संकल्प कलश मेंलेकिन संध्या के आने के पहले कलश रीत जाता है

केवल नया प्रश्न ही बन कर

वातायन विहीन कमरों में साँसें ले पाना दूभर हैआतुर है मन उड़े गगन में इक उन्मुक्त पखेरू बन करदीवारों पर टिके हुये इक कृत्रिम नभ की परछाईं मेंजहां सरसराहट पत्तों की करने में प्रवेश है असफ़लहवा लौट जाया करती है द्वारे तक आने से पहलेबिखरा जहाँ सदा रहता है निशा नयन से रिसता काजलउस परकोटे की सीमा को आज तोड़ देने की चाहतकरता है मन, जहाँ नहीं आ पाता है अपनापन छन करउगते हुये दिवाकर की किरनें रह गईं अपरिचित जिससेऔर दुपहरी जहाँ सदा ही शब्दकोश में सीमित रहती अस्ताचल के पथ पर जाता सूरज का रथ ओझल होताबर्फ़ें नहीं एकाकीपन की जहां तनिक भी नहीं पिघलतीउन अनदेखी जंजीरों को आज तोड़ देने को व्याकुल यह मन चाहे, तरु की छाया रहे शीश  पर साया बन करघड़ियों के काँटे से बाँधी हुई डोर से बन कठपुतलीकरता हैं अभिनीत नित्य ही किसी और का निर्धारित क्रमसमझे जिनको अपने निर्णय,अपने निश्चय,अपनी राहेंअवचेतन में ज्ञात रहा है, यह सब केवल मन का है भ्रमकितनी बार कोशिशें की हैं इक गुत्थी को सलझाने कीहर इक बार मिला है उत्तर  केवल नया प्रश्न ही बन कर