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Showing posts from May, 2011

आवाज़ कोई द्वार आकर

हो गया विचलित अचानक सांझ में यह वावला मनदे रहा है यूँ लगे,आवाज़ कोई द्वार आकरदेखता हूँ द्वार पर दहलीज पर है शून्य केवलदूब को सहलायें ऐसे भी नहीं थिरकें हवायेंओढ़ कर सूना अकेलापन बिछी पगडंडियाँ हैंलौट आती हैं क्षितिज से रिक्त ही भटकी निगाहेंशान्त इस निस्तब्धता में किन्तु जाने क्यों निरन्तरलग रहा सरगम सुनाती नाम कोई गुनगुनाकर.शाख पर से झर बिखर कर रह गया है पर्ण अंतिमशोषिता सिकता हुई है मौन अब होकर समर्पितझाड़ियां तटबन्ध पर जैसे लिये बैठीं समाधीछुप गईं जाकर क्षितिज के पार हर बदरी अचम्भितरुद्ध तारों पर हुए हैं साज के गूँजे हुए स्वरकिन्तु लगता छुप रहा कोई मुझे रह रह बुलाकर
एक पल जो खींचता है डोरियां सुधि की सहज ही
शुष्क मरुथल में अचानक प्राण आकर सींचता है
हैं ललकती सिन्धु की उच्छल तरंगे बाँह भर लें
जो अचानक पीठ पीछे आ पलक को मींचता है
चाहता हूँ देख पाऊँ मैं उसे अपने नयन से
किन्तु रहता है घटा की ओट में छुप वह प्रभाकर

कोई भी आवाज़ न गूँजी

पायल तो आतुर थी थिरके
बजी नहीं वंशी पर ही धुनसूना रहा तीर यमुना काकोई भी आवाज़ न गूँजीफूल, कदम के तले बिछायेरहे गलीचा पंखुरियों कासिकता अभ्रक के चूरे सीकोमल हुई और चमकीलीलहरों ने थी उमड़ उमड़ करदीं तट को अनगिन आवाज़ेंहुई सांवरी डूब प्रतीक्षा मेंअम्बर की चादर नीलीपलक बिछाये बाट जोहता था बाँहे फ़ैलाये मधुवनलालायित था चूम पगतलीसहज लुटा दे संचित पूँजीगोकुल से बरसाने तक थानजरें फ़ैलाये वॄन्दावनदधि की मटकी बिछी डगर परकहीं एक भी बार न टूटीछछिया में भर छाछ खड़ी थीछोहरियां अहीर की पथ में नाच नचाती जिसको जानेकहाँ गई कामरिया रूठीभटक गया असमंजस में फ़ँसमन का जैसे हर इक निश्चय एक पंथ पर रहा प्रतीक्षितदूजी कोई राह न सूझीघुँघरू ने भेजे वंशी कोरह रह कर अभिनव आमंत्रणसंबंधों की सौगंधों कीफिर से फिर से याद दिलाईप्रथम दॄष्टि ने जिसे लिख दिया थामन के कोरे कागज़ परलिपटी हुई प्रीत की धुन मेंवह इक कविता फिर फिर गाईलेकिन रहे अधूरे सारे, जितनेकिये निरन्तर उपक्रमगुंथी हुई अनबूझ पहेलीएक बार भी गई न बूझी

यों उधारी की हमको मिली ज़िंदगी

यों उधारी की हमको मिली ज़िंदगी

दिल्ली मेट्रो में दफ्तर को जाते हुएधक्का मुक्की के नियमित हुए खेल सीआफ सीजन में क्लीरेंस के वास्ते हेवी डिस्काउंट पर लग रही सेल सीबीस दिन बर्फ के बोझ से दब रहीलान की सूख कर मर गई घास सीएक कोने में टेबुल के नीचे पडीगड्डियों से जुदा हो गए ताश सी ठण्ड में वस्त्र खोकर ठिठुरते हुएएक गुमसुम अकेले खड़े पेड़ सी हर किसी की छुंअन से अपरिचित रहेटूट नीचे गिरे एक झरबेर सी
ज्यों फटी जेब हो अनासिली ,ज़िंदगी थी उधारी की हमको मिली ज़िंदगी
शब्द के अर्थ की उँगलियों से विलगपृष्ठ पर एक आधे लिखे गीत सीपश्चिमी सभ्यता की चमक ओढ करभूली बिसरी पुरानी किसी रीत सीदाग पहने हुए टोकरी से किसीदूर फेंके हुए लाल इक सेव सीरेडियो से बदल एक फ्रीक्वेंसी हो प्रसारित नहीं जो सकी, वेव सी बंद हो रह गई इक घड़ी से बजाही नहीं भोर के एक एलार्म सी देखता ही नहीं कोई भी आ जिसेबंद कमरे में बिखरे हुए चार्म सी ठूंठ जैसी रही अनखिली ज़िंदगीयों उधारी की हमको मिली ज़िंदगी सीढि़याँ ले विरासत की चलता रहाब्याज दर ब्याज इक अनचुके कर्ज़ सीदर्पणों को दिखाते हुए प्रश्न बनसामने आ खड़े अननिभे फ़र्ज़ सीइक स्वयंव…
शब्द कोशों ने पूरा समर्पण कियाऔर भाषायें सब मौन होकर रहींतेरा उपमान बन आ सके सामनेपूर्ण ब्रह्मांड में कोई ऐसा नहींसॄष्टि की पूर्ण निधि से बड़ा है कहींतेरे आशीष का इक परस शीश परचिह्न तेरे चरण के जहां पर पड़ेस्वर्ग है देव-दुर्लभ वहीं पर कहीं

शब्द जितने रहे पास सब चुक गये, वन्दना के लिये कुछ नहीं कह सके
तूने जिनको रचा वे हो करबद्ध बस प्रर्थना में खड़े मौन हो रह गयेतूने पूरा दिया पर अधूरा रहा ज्ञान मेरा,रहीं झोलियां रिक्त हीकंठ के स्वर मेरे आज फिर से तेरा पायें आशीष शत बार हैं कह गये

जितनी संचित हुईं मेरी अनुभूतियां,भावनायें रहीं या कि अभिव्यक्तियाँहोंठ पर आके जितनी सजीं हैं सभी तेरा अनुदान बन ज़िन्दगी को मिलींसिद्धियाँ रिद्धिया जितनीं पाईं ,चढ़े जितने गिरि्श्रग मैने प्रगति पंथ परउनकी राहें सुगम कर रहीं रात दिन कलियां आशीष की क्यारियों में खिली----------------------------------------------------------------------------------कामधेनु की क्षमतायें कर सहसगुनीकल्पवृक्ष की निधियों को कर कोटि गुणितजितना होता संभव, उसका अंश नहींजो तेरे आँचल में रहता है संचित

युगों युगों तक करते हुए तपस्यायेंजितना ऋषि-मुन…

कौन जिससे फूल ने सीखा महकना

कौन है जो चाहता है गीत में मेरे संवरनाभावना की उंगलियों को थाम छन्दों में विचरनाकौन है जो सुर मिलाये गुनगुनाहट से मधुप कीकौन तितली के परों पर आप अपना चित्र खींचेकौन अलसाई दुपहरी की तरह अंगड़ाई लेतास्वप्न बन आये नयन में,सांझ जब भी आँख मीचेसोचत्ता हूँ, कौन जिससे फूल ने सीखा महकनाकौन है जो चाहता है गीत में मेरे सँवरनाकौन है जो शब्द को देता निरन्तर अर्थ नूतनकौन जो गलबाँह डाले चेतना सँग मुस्कुराताकौन भरता प्राण में माधुर्य सुधियों के परस काकौन मेरी धमनियों में शिंजिनी सा झनझनाताढूँढ़ता हूँ कौन,जिससे सीखती कलियाँ चटखनाकौन है जो चहता है गीत में मेरे संवरनाकौन है मन में जगाये ताजमहली प्रेरणायेंकौन बन कर तूलिकायें,रंग खाकों में उकेरेयामिनी की सेज सज्जित कौन करता आ निशा मेंकौन बन कर दीप अभिनन्दित करे उगते सवेरेकौन अंधियारे ह्रदय में सूर्य सा चाहे चमकनाकौन है जो चाहता है गीत में मेरे संवरनाहो रहीं सुधियाँ विलोड़ित कौन जिसकी एक स्मृति सेकौन है परछाईयों में भर रहा आभा सिँदूरीकौन होकर के समाहित कालगति में चल रहा हैकौन जिसके नाम बिन हर साँस रह जाती अधूरीकौन जिसका बिम्ब चाहे नैन में रह रह उतरनाकौन है…