चाहता हूँ मैं लिखूँ कुछ प्रीत के नूतन तराने
भाव में डूबे हुए कुछ बिम्ब ले लेकर सुहाने
किन्तु वर्णन न्यायसंगत हो नहीं पाता तनिक भी
शब्द जितने पास मेरे, हो चुके हैं सब पुराने
इसलिये अब शब्द बिन भाषा नयन की लिख रहा हूँ
आईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख रहा
खींचता हूँ आज रेखाचित्र मैं नीले गगन पर
टाँकत हूँ भावना की कूचियाँ लेटे पवन पर
गंध की उमड़ी हुई जो लहर में सिमटे हुए हैं
रंग भरता हूँ वही मैं एक कलिका के बदन पर
उड़ रही इक कल्पना का थाम कर आभास झीना
मैं क्षितिज पर बिन किसी आधार के ही टिक रहा हूँ
ढाल; देता हूँ कलम को अब भवों की भंगिमा में
शब्द्कोशों को समाहित कर नयन की नीलिमा में
धड़कनों में बुन रहा हूँ मैं अधर की थरथराहट
घोलता अभिव्यक्ति चेहरे पर उभरती अरुणिमा में
भाव यूँ तो गूढ़ हूँ मैं, किन्तु परिभाषित रहा हूँ
आईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख रहा हूँ
Wednesday, January 06, 2010
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8 comments:
मुग्ध, मौन !
आभार ।
ye bhi laazwaab..bahut sundar geet..dhanywaad rakesh ji is behtareen prstuti ke liye..
:)
ढाल; देता हूँ कलम को अब भवों की भंगिमा में
शब्द्कोशों को समाहित कर नयन की नीलिमा में
धड़कनों में बुन रहा हूँ मैं अधर की थरथराहट
घोलता अभिव्यक्ति चेहरे पर उभरती अरुणिमा में
Rakesh ji kamaal ke geet kahte hain aap
बहुत सुन्दर रचना
बहुत बहुत आभार
आईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख रहा हूँ
शुभकामनायें, भाईजी !!
बहुत ही सुन्दर और प्रवाहमान गीत!
"आईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख रहा "
...एक तरह से जीवन का फ़लसफ़ा ही है यह ... यह अलग बात है कि आपने इसे एक प्रणय गीत में intertwine कर के लिख दिया है.
"उड़ रही इक कल्पना का थाम कर आभास झीना
मैं क्षितिज पर बिन किसी आधार के ही टिक रहा हूँ"
ये बिना आधार के टिकना, वह भी अनुपम शब्दों के जादू को सालों-साल जीवित रखते हुए ... यह भी आप ही कर सकते हैं गुरुदेव!
"भाव यूँ तो गूढ़ हूँ मैं, किन्तु परिभाषित रहा हूँ "... ये बहुत ही सुन्दर और थोड़ा eyebrow raising, "is it" type का :)
बार-बार पढ़ा जा सकने वाला गीत !
31Jan10
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