छलछला रह गया है जो, पानी लिखें

ज़िन्दगी के सफ़र में सपन बन गई पर अधूरी रही जो, कहानी लिखें
नैन के बाँध को तोड़ उमड़ा नहीं
छलछला रह गया है जो, पानी लिखें



पांव गतिमान थे साथ गति के सद
कोई मंज़िल नहीं, राह निस्सीम थ
एक पल को भी विश्राम दे न सकी
चाहना की उफ़नती रही थी नदी
उंगलियाँ तो बढ़ीं थीं क्षितिज थाम लें
किन्तु क्षमतायें बौनी हुई रह गईं
दी न स्वीकॄति कभी एक उस बात की
आईने की छवि जो कभी कह गई

जो छलावा बनी, बस लुभाती रही
पास आई नहीं, रुत सुहानी लिखें

आस के बीज बोये हुए, चुग गया
बन पखेरू समय, उम्र के मोड़ पर
कामना बन्धनों में बँधी रह गई
बढ़ नहीं पाई सीमाओं को तोड़कर
भाव मन के सभी थरथरा रह गये
शब्द में ढाल कर होठ कह न सके
आँधियाँ आ उड़ा ले गईं पास का
पल विफ़ल प्राप्ति के सिर्फ़ बह न सके

मान जिसको रखा अपनी परछाईं था
दुश्मनी उसने सीखी निभानी लिखें

पतझड़ी पत्र बन कर दिवस उड़ गये
नींद थी रात से वैर ठाने हुए
धूप के जितने टुकड़े गिरे गोद में
सावनी मेघ के थे वे छाने हुए
पंथ ने पी लिये थे दिशा बोध के
चिन्ह जो भी लगाये गये राह में
पथ खज़ूरों तले ही झुलसते रहे
छाँह का पल न आया तनिक बाँह में


पूरे दिन सुरमई रंग ओढ़े रहा
नभ हुआ ही नहीं आसमानी लिखें

Comments

M VERMA said…
पूरे दिन सुरमई रंग ओढ़े रहा
नभ हुआ ही नहीं आसमानी लिखें
बहुत सुन्दर गीत -- बेहतरीन भाव
आसमान को तो आसमानी होना ही होगा
Udan Tashtari said…
नैन के बाँध को तोड़ उमड़ा नहीं
छलछला रह गया है जो, पानी लिखें


-गज़ब!! अद्भुत सोच...

आपकी कल्पनाशीलता की कोई सानी नहीं...
और आपकी लेखनी की कोई निशानी नहीं....


-समीर लाल 'समीर'
समीर लाल जी से सहमत ! शुभकामनाएं !
Nirmla Kapila said…
आस के बीज बोये हुए, चुग गया
बन पखेरू समय, उम्र के मोड़ पर
कामना बन्धनों में बँधी रह गई
बढ़ नहीं पाई सीमाओं को तोड़कर
भाव मन के सभी थरथरा रह गये
शब्द में ढाल कर होठ कह न सके
आँधियाँ आ उड़ा ले गईं पास का
पल विफ़ल प्राप्ति के सिर्फ़ बह न सके
कल्पनाओं का सागर है आपके पास। बधाई
Nirmla Kapila said…
आस के बीज बोये हुए, चुग गया
बन पखेरू समय, उम्र के मोड़ पर
कामना बन्धनों में बँधी रह गई
बढ़ नहीं पाई सीमाओं को तोड़कर
भाव मन के सभी थरथरा रह गये
शब्द में ढाल कर होठ कह न सके
आँधियाँ आ उड़ा ले गईं पास का
पल विफ़ल प्राप्ति के सिर्फ़ बह न सके
कल्पनाओं का सागर है आपके पास। बधाई
Shardula said…
आप से सब सीखना अच्छा लगता है गुरुजी, पर ये पर्व के शुभ दिनों में ऎसी कवितायें आप जो लिखते हैं ना तो आप पे कितना गुस्सा आता है क्या बताऊँ :(
कितनी गलत बात है! कितनी चिंता होती है !
कविता पे कोई भी टिप्पणी अब पर्वों के बाद ही करूँगी.
सादर प्रणाम !
आशीष दें !
Rama said…
प्रतीकों और बिंबों से परिपूर्ण अभिव्यक्ति एवं आपकी अनुपम कल्पनाशीलता को बारम्बार नमन।

डा.रमा द्विवेदी
मानसी said…
राकेश जी,एक और सुंदर गीत आपका। छंद में भी नयापन है।

और शार्दुला, चिंता न करें। राकेश जी जब लिखते हैं तो बस लिखते हैं, कुछ यूँ सोच कर या दुखी हैं इसलिए नहीं लिखते। और वैसे भी कवि तो होता ही वही है जो निजी भावनाओं को पन्ने पर न उकारे, बल्कि उस वक़्त के मन:स्थिति में जो लिख रहा है, वही बस उसी समय का हो।
Shardula said…
पहले तो पढ़ते ही अमर जी की ग़ज़ल याद आ गयी "राजा लिख और रानी लिख, फिर से वही कहानी लिख".
---
अब आपको पढ़ते ही जा रही हूँ. ये पंक्तियाँ गहरे पैठ गयीं हैं.
"नैन के बाँध को तोड़ उमड़ा नहीं
छलछला रह गया है जो, पानी लिखें"

"जो छलावा बनी, बस लुभाती रही
पास आई नहीं, रुत सुहानी लिखें"

"आस के बीज बोये हुए, चुग गया
बन पखेरू समय, उम्र के मोड़ पर -- वाह! वाह! बहुत effective!
कामना बन्धनों में बँधी रह गई
बढ़ नहीं पाई सीमाओं को तोड़कर" -- ये तो अच्छा ही हुआ ना !

"मान जिसको रखा अपनी परछाईं था
दुश्मनी उसने सीखी निभानी लिखें"--- ये क्या ??

"पतझड़ी पत्र बन कर दिवस उड़ गये
नींद थी रात से वैर ठाने हुए --- इस पे विश्वास नहीं होता :)
धूप के जितने टुकड़े गिरे गोद में --- बहुत ही सुन्दर !
सावनी मेघ के थे वे छाने हुए --- एकदम नया सा !

पथ खज़ूरों तले ही झुलसते रहे
छाँह का पल न आया तनिक बाँह में
--- "खज़ूरों तले " -- बहुत खूब इस्तेमाल एक प्रचलित बिम्ब का. याद है कुछ दिन हुए आपने "समय बदले घूरे की काया" का भी कितना सुन्दर इस्तेमाल किया था ?

पूरे दिन सुरमई रंग ओढ़े रहा
नभ हुआ ही नहीं आसमानी लिखें" -- आपकी आँखों में पानी जो छलछलाता रहा, नभ आसमानी कैसे होता ?
सादर . . .
****
प्रिय मानोशी जी, आपने जो कविता लेखन के विषय में कहा उसके बारे में मैं बस यही कहना चाहूंगी कि क्या आपको याद है कुछ दिन हुए ई-कविता में किसी ने प्रसिद्ध फलस्तीनी कवि महमूद दरवेश जी का ये सूत्रवाक्य उद्धृत किया था कि "एक कविता या एक उपन्यास में तटस्थ होने का स्वांग करना एकमात्र क्षम्य अपराध है" :)
पतझड़ी पत्र बन कर दिवस उड़ गये
नींद थी रात से वैर ठाने हुए
धूप के जितने टुकड़े गिरे गोद में
सावनी मेघ के थे वे छाने हुए
पंथ ने पी लिये थे दिशा बोध के
चिन्ह जो भी लगाये गये राह में
पथ खज़ूरों तले ही झुलसते रहे
छाँह का पल न आया तनिक बाँह में
ये अनोखी और अद्भुत पंक्तियां हैं और इन पंक्तियों को वही लिख सकता है जिसने पीर को जिया होता है । आज के दौर में कोई राकेश खण्‍डेलवाल सरीखा गीतकार ही इस प्रकार के गीत रच सकता है । हर बार आपका कोई गीत पढ़ता हूं और हर बार ये होता है‍ कि अपना स्‍वयं का लिख हुआ काव्‍य बेमानी लगने लगता है । सच कहूं तो ये गीत पिछले कई सारे गीतों से आगे का गीत है । शार्दूला दीदी की बात से सहमत हूं कवि जो सहता है उसी को शब्‍द देता है कवि अपनी ही धनीभूत पीड़ा को निचोड़ कर काव्‍य का सृजन करता है ।
Dr. Amar Jyoti said…
अद्भुत,अनूठा मन को छू जाने वाला गीत।
हार्दिक बधाई।
Shardula said…
आपको रोज़ इतने मनोयोग से पढ़ती हूँ. एक ही निष्कर्ष निकलता है हर बार, जैसे सागर का विस्तार है वैसे ही आपके गीत हैं. हर बार नयी गति, नयी लहर, नए सीप-शंख लाते हैं. चकित सी शिशु की भाँति उन्हें बीनती जाती हूँ, पर पार ना पाती हूँ आपके लेखन का.
आप काव्य के सिन्धु हैं, हम तट पे खड़े उसकी सिकता से खेलते, भीगते पाठक.
बहुत सुन्दर, हमेशा की तरह.

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