देहरी पर दीपक जलते तो हैं पर सभी उधार के

कितनी बार आस के पंछी उड़े व्योम में वपिस लौटे

भरने को उड़ान लम्बी सी, पंख रहे हैं उनके छोटे
मुट्ठी में हो कैद रह गये स्वप्न सभी विस्तार के
मुरझा गये फूटने से पहले ही अंकुर प्यार के


जीवन की नौटंकी में था सूत्रधार अलसाया कोहरा
टँगा हुआ था मावस्या का अंधियारा होकर के दोहरा
नेपथ्यों में विलय हो गई कथा पटकथायें निर्देशन
मुख्य भूमिका चुरा ले गया पिटा वक्त से जो था मोहरा


दॄश्य दीर्घा में बैठे आ आलोचक व्यवहार के
मुरझा गये फूटने से पहले ही अंकुर प्यार के


टीका लगा तिमिर को कितनी बार विदा कर कर के भेजा
रंग वही लेकिन भर पाया पागल इस मन का रंगरेजा
शीशे के टुकड़ों से बिम्बित हुई न आकर किरणें, भटकीं
गंध बिखर उड़ गई हवा में कितना उसको रखा सहेजा


खिले नही अँगनाई में बोये पौधे कचनार के
मुरझा गये फूटने से पहले ही अंकुर प्यार के


आयातित होते प्रकाश पर रहा नहीं अधिकार हमारा
हुआ नहीं अपना पहले से ले आखिर तक कोई सितारा
फूटे हुए कुमकुमों में था शेष नहीं अवशेष ज्योति का
संचय की झोली में आकर रह नहीं पल भी उजियारा


देहरी पर दीपक जलते तो हैं पर सभी उधार के
मुरझा गये फूटने से पहले ही अंकुर प्यार के

Comments

Udan Tashtari said…
गज़ब भाई जी गज़ब!!

नायाब अद्भुत रचना..आनन्द आ गया!!
mehek said…
behtarin abhuvyakti
रंजना said…
वाह वाह वाह ...... अद्वितीय.....पीडा आपके शब्दों में सज जीवंत हो गयी...वाह .....

अतिसुन्दर मर्मस्पर्शी रचना...
Shardula said…
जीवन की नौटंकी में था सूत्रधार अलसाया कोहरा
टँगा हुआ था मावस्या का अंधियारा होकर के दोहरा
नेपथ्यों में विलय हो गई कथा पटकथायें निर्देशन
मुख्य भूमिका चुरा ले गया पिटा वक्त से जो था मोहरा
दॄश्य दीर्घा में बैठे आ आलोचक व्यवहार के
मुरझा गये फूटने से पहले ही अंकुर प्यार के
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टीका लगा तिमिर को कितनी बार विदा कर कर के भेजा
रंग वही लेकिन भर पाया पागल इस मन का रंगरेजा
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फूटे हुए कुमकुमों में था शेष नहीं अवशेष ज्योति का
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जाने कैसे आपको गुरु कहा !! आपने भी शालीनतावश कभी मना नहीं किया :) कभी लगता है जितने पुन्य किये थे जीवन में वह अगर इसी प्रतिफल में निकल गए तो बाबा रे डेली बेसिस पे पुन्य करना पड़ेगा, जीवन की खुशहाली के लिए! आप बहुत मेहनत करवाते हैं !!
:)

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