आज उन्ही शब्दों को मेरी कलम गीत कर के लाई है

शब्दकोश के जिन शब्दों ने अधर तुम्हारे चूम लिये थे
आज उन्ही शब्दों को मेरी कलम गीत कर के लाई है

रंग तुम्हारे मन का बिखरा उपवन के सारे फूलों पर
जलतरंग बन चाल तुम्हारी अंकित सरिता के कूलों पर
उंगली के इंगित से जागीं सावन की मदमस्त मल्हारें
हर मौसम में पैगें लेतीं चढ़ी हवाओं के झूलों पर

शब्द शब्द की अनुभूति में व्याप्त तुम्हीं हो मधुर कल्पने
ढाई अक्षर पढ़ा तुम्हीं ने ज्योति ज्ञान की बिखराई है

तुमसे पा उनवान, गज़ल की महफ़िल में कोयलिया चहकी
तप्त कपोलों की अरुणाई से पलाश की बगिया दहकी
नयनसुधा की कुछ बूँदों का जो पाया है स्पर्श सुकोमल
बिसरा कर अपने गतिक्रम को सांस सांस है बहकी\ बहकी

जब बहार ने उपवन में आ अपना घूँघट जरा हटाया
पता चला उसका चेहरा भी सिर्फ़ तुम्हारी परछाई है

स्वर का कंपन छू नदिया की धारा लेती है अँगड़ाई
पग चुम्बन के लिये आतुरा हो, दुल्हन बनती अँगनाई
चितवन से विचलित होते हैं विधि के नियम कई प्रतिपादित
चिकुरों से ले रात कालिमा, दॄष्टि दिवस को दे तरुणाई

महकी हुई हवानों ने जब अपना अस्तर आकर खोला
तब मालूम हुआ है खुश्बू तुमसे ले उधार आई हैं

मीनाक्षी से एलोरा तक चित्र शिल्प जितने, तुमसे ही
मौसम की गतिविधियों का जो कारण रहा, रहा तुमसे ही
तुमही तो कविता, कविता में गज़लें नज़्म सभी हैं तुमसे
जितने छलके गीतकलश से, गीत रहे वे सब तुमसे ही

संध्या ने दिन की पुस्तक के पन्ने पढ़ते हुए बताया
जितनी भी गाथायें संचित, सब तुम ही ने लिखवाईं हैं

Comments

Udan Tashtari said…
शब्दकोश के जिन शब्दों ने अधर तुम्हारे चूम लिये थे
आज उन्ही शब्दों को मेरी कलम गीत कर के लाई है


--यह आज नहीं, हमेशा से होता आया है..हर बार...बारंबार...हद है!!! गजब क्रियेटिविटी...मान गये प्रभु...क्या कहें तारीफ मे..बेवकूफी ही कहलायेगी हमारी. :)
जब बहार ने उपवन में आ अपना घूँघट जरा हटाया
पता चला उसका चेहरा भी सिर्फ़ तुम्हारी परछाई है
क्या कहूँ राकेश जी.....शब्दहीन हूँ....इश्वर की महती अनुकम्पा है मुझ पर तभी तो आप को पढने का मौका बार बार पा रहा हूँ.
नीरज
शब्द शब्द की अनुभूति में व्याप्त तुम्हीं हो मधुर कल्पने
ढाई अक्षर पढ़ा तुम्हीं ने ज्योति ज्ञान की बिखराई है

मूक कर देती है आपके द्वारा रचे शब्दों की यह रचना बहुत सुंदर कहाँ से प्रेरणा पाते हैं आप इतना सुंदर लिखने की
vipinkizindagi said…
सुंदर
Anonymous said…
" सब तुम ही ने लिखवाईं हैं "
कौन जाने आपका मनमीत बन लिखवा रहा
कभी हवा, कभी बादलों का गीत बन कर गा रहा ।

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