तुझ पर ही सब कुछ आधारित


पिघले हुए स्वाति-चन्दा से
टपक गि्रीं सीपी मे बूंदें
जो, उन सबने आज सुनयने
तेरे अधरों को चूमा है

अलकापुर की सुरसरिता में
सद्य:स्नाता एक अप्सरा
उसके ही लंबे केशों से
मौक्त मणि का अंश जो झरा
पारिजात ने पांखुर के
प्याले में उसको रखा सहेजा
और एक आभूषण में फिर
ॠतुशिल्पी ने जिसे है जड़ा

रति के हस्ताक्षर से सज्जित
है जो यही अलौकिक माला
उसकी ही बस इक थिरकन पर
मन सम्मोहित हो झूमा है

अभिव्यक्ति के क्षीर-सिन्धु में
गोते खाने की अभिलाषा
पर शब्दों से कॄपण, कोष को
रिक्त देख मन रहता प्यासा
अक्षर अक्षर जोड़ जोड़ कर
बुने हुए पल और निमिष में
अनुभूति के एक अर्थ को
समझ, जानने की जिज्ञासा

प्रणय निवेदन के भावों से
भरे हुए इक भावालय को
साथ लिये मन का यायावर
तेरे चहुं ओर घूमा है

सगर वंशजों की आराधित
उमाकान्त की केशवासिनी
की पायल की झंकारों से
जागी है जो मधुर रागिनी
वह जमना की सिकता में जो
घुले हुए वंशी के स्वर हैं
को लेकर आकांक्षित है
बन सके कंठ की अंकशायिनी

उसी एक आतुर आशा की
आंखों का सतरंगी सपना
बार बार कहता है आकर
तेरी आंखों को छूना है

अधरों की थिरकन से फिसले
हुए शब्द की जर्जर काया
द्रुत सरगम पर ख्याल बिलम्बित
जीवन के साजों ने गाया
किन्तु तार के सप्तक तुझ पर
शुरू, तुझी पर अंत हुए हैं
तू जीने के लिये प्रेरणा
स्वीकारा, पर जान न पाया

ॠद्धि-सिद्धि, उपलब्धि-प्राप्ति के
सारे मंत्र तुझी से जागे
तेरा नाम न गूंजे जिसमें
अर्थहीन वह स्वर सूना है

Comments

काकेश said…
सुबह सुबह सुन्दर बगिया में
प्यारा सा इक फूल खिला है

वह फूल है आपके गीत. अनूठे अहसासों के साथ.

आनंद आया.
Udan Tashtari said…
ॠद्धि-सिद्धि, उपलब्धि-प्राप्ति के
सारे मंत्र तुझी से जागे
तेरा नाम न गूंजे जिसमें
अर्थहीन वह स्वर सूना है

--बहुत खूब राकेश भाई. अद्भुत. मजा आया पढ़कर.
sunita (shanoo) said…
आप इतनी खूबसूरती और सादगी से हर बात कैसे लिख जाते है...काश मै आपकी कलम होती...

सुनीता(शानू)
राकेश जी,
सुन्दर पुष्पों से सजी संवरी माला है यह रचना..

सत्यता यही है कि मनुष्य जिस भी स्थिती में है उसका कारण मन ही है...

Happyness and Sadness is nothing but state of mind

तभी तो जिन सुन्दर केशों की कवि इतनी प्रशन्सा करते हैं खाते समय खाने में नजर आ जायें तो बस.....

Lighter side of the life.

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