मन का आवारा वनपाखी अब गीत नहीं गा पाता है
कुछ रंग नहीं भर पाता है कोरे खाकों में चित्रकार
तूलिका कोशिशें करती है पर विवरण न पाती उभार
खूँटियां पकड़ ढीली करतीं रह रह सलवएं पड़ा करतीं
यूँ कैनवास यह जीवन का फिर से अपूर्ण रह जाता है
बन पाते बिम्ब अधूरे ही धुंधला धुन्धला मन का दत्पण
चिलमन की ओट छुपा लेती मनमोहक हर बांकी चितवन
पन्ने पलटे दिन रात मगर, अक्षर पुस्तक के फढ़े नहीं
यूँ ढाई आखर का लेखा, अनपढ़ा पुन: रह जाता है
नित ॠचा उचारा करी मगर मंत्रों से भाग्य नहीं जागे
सांसों की एक भिखारिन हर इक गली मोड़ रुकरुक मांगे
खाली झोली, पाथेय नहीं राहों का कुछ भी पता नहीं
यूँ उठ पाने से पहले ही हर बार कदम रुक जाता है
साधक सी लगन जगी लेकिन मिल पाया कोई साध्य नहीं
निर्जन हो गये सभी मंदिर है कोई भी आराध्य नहीं
पूजा की थाली सजी मगर हैं क्रूर थपेड़े आँधी के
यूँ ज्योतित होने से पहले हर बार दिया बुझ जाता है
सुधियों की डोर थामता है अक्सर मन का एकाकीपन
भूली भटकी स्मॄतियों की कुछ और अधिक बढ़ती तड़पन
पथ में हैं मोड़ बने इतने,दो कदम साथ न संव्हव हैं
यों परिचय होने से पहले हर कोई बिछड़ता जाता है
बस्ती के इकलौते पनघट पर गूँज नहीं पाती पायल
नर्तन करते हैं मोर किन्तु इक बून्द न बरसाता बादल
झूले पेड़ों पर पड़े नही कनकौए नभ में उड़े नहीं
यूँ सावन भादों से पहले हर बरस अगहन आ जाता है
हर रोज बिखेरी थाली भर भर धूप दुपहरी ने आकर
हर लहर लुटाती रही कोष जो संजो रखे था रत्नाकर
मधुवन ने सोंपे फूल और सरगम की तान कोयलों ने
पर मेरी खुली आंजुरि में कुछ भी न सिमटने पाता है
सूरज के रथ के घोड़ों को कोई उद्देश्य नहीं बाकी
टूटे टुकड़े ले मधुघट के बैठी है सुधियों की साकी
खाली आँजुरि क्या सूर्य नमन ? क्या कर पाये संध्या-वंदन
यूँ उग पाने से पहले ही हर रोज दिवस ढल जाता है
मन का आवारा वनपाखी अब गीत नहीं गा पाता है.