प्राण दीप मेरा जलता है

हन निशा में तम की चाहे जितनी घनी घटाएं उमड़े
पथ को आलोकित करने को  प्राण दीप मेरा जलता है
पावस के अंधियारों ने कब अपनी हार कहो तो मानी
हर युग ने दुहराई ये ही घिसी पिटी सी एक कहानी
क्षणिक विजय के उन्मादों ने भ्रमित कर दिया है मानस को
पलक झुकाकर तनिक उठाने पर दिखती फिर से वीरानी
लेकिन अब ज्योतिर्मय नूतन परिवर्तन की अगन जगाने
निष्ठा मे विश्वास लिए यह प्राण दीप मेरा जलता है
खो्टे सिक्के सा लौटा है जितनी बार गया दुत्कारा
ओढ़े हुए दुशाला मोटी बेशर्मी की ,यह अँधियारा
इसीलिए अब छोड़ बौद्धता अपनानी चाणक्य नीतियां
उपक्रम कर समूल ही अबके जाए तम का शिविर उखाड़ा
छुपी पंथ से दूरशरण कुछ देती हुई कंदराएँ जो
उनमें  ज्योतिकलश छलकाने  प्राण दीप मे​रा जलता है
दीप पर्व इस बार नया इक ​संदेसा लेकर है आया
सीखा नहीं तनिक भी तुमने तम को जितना पाठ पढ़ाया
अब इस विषधर की फ़ुंकारों का मर्दन अनिवार्य हो गया
दीपक ने अंगड़ाई लेकर उजियारे का बिगुल बजाया

फ़ैली हुई हथेली अपनी में  सूरज की किरणें भर कर
तिमिरांचल की आहुति देने प्राण दीप मेरा जलता है

उजाले के दरीचे खुल रहे--दीपावली

शरद ऋतु रख रही​ पग षोडसी में
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

उतारा ताक से स्वेटर हवा ने
लगे खुलने रजाई के पुलंदे
सजी  छत आंगनों में अल्पनाएं
जहां  कल बैठते थे आ परिंदे
किया दीवार ने श्रृंगार अपने
नए से हो गए हैं द्वार, परदे
नए परिधान में सब आसमय है
श्री आ कोई वांछित आज वर दे

दिए सजने लगे बन कर कतारें
उजाले के दरीचे खुल रहे है

लगी सजने मिठाई थालियों में
बनी गुझिया पकौड़ी पापड़ी भी
प्लेटों में है चमचम, खीरमोहन
इमरती और संग में मनभरी भी
इकठ्र आज रिश्तेदार होकर
मनाने दीप का उत्सव मिले है
हुआ हर्षित मयूरा नाचता मन
अगिनती फूल आँगन में खिले है

श्री के साथ गणपति सामने है
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

पटाखे फुलझड़ी चलने लगे हैं
गगन में खींचती रेखा हवाई
गली घर द्वार आँगन बाखरें सब
दिए की ज्योति से हैं जगमगाई
मधुर शुभकामना सबके अधर पर
ग़ज़ल में ढल रही है गुनगुनाकर
प्रखरता सौंपता रवि आज अपनी
दिये की वर्तिका को मुस्कुराकर

धरा झूमी हुई मंगल मनाती
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

सिमट कर रातरानी की गली से
तुहिन पाथेय अपना है सजाता
अचानक याद आया गीत, बिसरा
मदिर स्वर एक झरना गुनगुनाता
बनाने लग गई प्राची  दिशा में
नई कुछ  बूटियां राँगोलियों की
हुई आतुर गगन को नापने को
सजी है पंक्तपाखी टोलियों की

क्षितिज करवट बदलने लग गया है
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

चली हैं पनघटों की और कलसी
बिखरते पैंजनी के स्वर हवा में
मचलती हैं तरंगे अब करेंगी
धनक के रंग से कुछ मीठी बातें
लगी श्रृंगार करने मेघपरियां
सुनहरी, ओढनी की कर किनारे
सजाने लग गई है पालकी को
लिवाय साथ रवि को जा कहारी 

नदी तट गूंजती है शंख की ध्वनि
उजाले ले दरीचे खुल रहे हैं 

हुआ है अवतरण सुबहो बनारस
महाकालेश्वरं में आरती का
जगी अंगड़ाइयाँ ले वर्तिकाये
मधुर स्वर मन्त्र के उच्चारती आ
सजी तन मन पखारे आंजुरि में
पिरोई पाँखुरी में आस्थाएं अर्चनाये
जगाने प्राण प्रतिमा में प्रतिष्ठित
चली गंगाजली अभिषेक करने

विभासी हो ललित गूंजे हवा में
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

इस दिवाली पे लौटे वही चार पल

दीप दीपावली के जले आज फिर
आज फिर गंध आई दबे पांव चल
मीठी बातों की जो उस हवा में घुली
जिसकी गलियों से हम दूर आये निकल

गेरुओं से छलकती हुई प्यालियाँ
और खड़िया लिए वे कटोरे कई
बूटियों में उमंगें जगात हुए
उंगलियां फर्श पर थी थिरकती हुई
खांड से जो बने वे खिलौने लिए
खील से थी लबालब भरी हठ रियां
दीप की वातियां सूत में कातती
अनवरत नाचती घूमती तकलियां

कितने वर्षों के इतिहास की तह चढ़ी
पर लगे बस अभी बीत गुजरा है कल

पन्नियों से सजी थैलियों में भरे
माहताबो की लड़ियाँ, नई चकारियां
फुलझड़ी और पटाखे कई भाँति क​
नभ को छूती हवाई बनी सुर्रियां
हर गली और दूकान सजती हुई
भीड़ तेरस को उमड़ी सराफा गली
और हलवाइयों की चली और से
छवियां मन में मचाती हुई खलबली

याद की बिजलियाँ कौंधती कह रही
उस गली में बिताए पुनः चार पल

आज इस गाँव में दीप दिखता नहीं
चित्र ही बस टंगे घर की दिवार पर
स्वस्ति के चिह्न भी बंधनों में बंधे
अल्पनाएं भी दिखती नहीं द्वार पर
कोई कंदील लटकी नहीं है कहीं
आता कोई पड़ौसी न मिलने यहां
फेसबुक और वाट्स एप सन्देश है
अर्थहीनता, बना कर खड़े पंक्तियाँ

एक अवलंब केवल सुधी का रहा
भाव में डूब जब भी हुआ मन विह्वल
राकेश खंडेलवाल


मैं प्रयत्न थोड़ा करता हूँ



दूर क्षितिज पर घिरे हुए अंधियारे की परते खुल जाए
युग के जलते हुए प्रश्न की गुत्थी को थोड़ा सुलझाये
सरगम की विस्तृत सीमा से पहले और बाद जो सुर है
बस ये कोशिश है हम उनके भी स्वर को थोड़ा सुन पाएं

इसीलिये मैं रहे अनछुए अब तक। कुछ ऐसे भावों को
अपने मुट्ठी भर शब्दों की करवट से जोड़ा करता हू

कितने है रहस्य जीवन की लंबी बिछी हुई राहों के
जिनको अनदेखा करते हम आगे आगे बढ़ते आये
किन पगचिन्हों के अनुगामी अनायास हम बन जाते है
और देखता कौन पंथ में छोड़ दिए जो हमने साये

इसीलिये मैं आज मोड़ पर जीवन के इस दो पल ठहरा
​अनबूझे ​कुछ प्रश्नों के अवगुंठन को तोड़ा करता हूँ 

मंत्रों के आकार और ध्वनि में उलझे आध्यात्मवाद का​
मापदंड क्या हो किसने यह किया यहाँ पर आ निष्पादित
अलग अलग जांचा करती है क्यों मूल्यों को एक क​सौटी
इस पर उठे प्रश्न ही क्योंकर, रह रह होते हैं प्रतिबाधित

इसीलिये मैं नियम कसौटी के फिर से मूल्यांकित करता
भटकी हुई सोच को देते सही दिशा मोड़ा करता हूँ​

एक शाख पर उगे हुये दो फूलों में क्यों मिले विविधता
एक लक्ष्य को पाती कैसे दो विपरीत दिशा की राहें
एकाकीपन बोया करता है कुछ और अधिक सन्नाटा
और अभीप्सित पाकर भी क्यों जलती रहती तृषित निगाहें

इसीलिये मैं उत्तर पाने की चेष्टा से पूर्व स्वयं को
इन सब के आधार समझने का प्रयत्न थोड़ा करता हूँ

अंधकार के क्षण जल जाते

जहां दीप की चर्चा से ही अंधकार के क्षण जल जाते
मैं अपनी गलियों में बिसरे वे स्वर्णिम पल बुला रहा हूँ

इंद्रधनुष की वंदंवारों पर उड़ती इठलाती गंधे
दादी नानी की गाथा में बचपन में आ सज जाती थी
और तिलिस्मी किसी कंदरा में छुप बैठी सोनपरी इक
अनायास ही परस दीप का पाकर सन्मुख आ जाती थी

आज समय के इस गमले में वे ही स्वर छूमंतर वाले
अंधियारे को दीप बना दें यही सोच कर उगा रहा हूँ 

पगडण्डी से चली टेसुओं की चौपाल तलक बारातें
और प्रतीक्षा के दीपक ले बैठी हुई सांझ से सांझी
दृष्टी मिलन होते दोनों का,अंधकार के क्षण जल जाते
बिखराती आलोक चहुंदिश द्युति
​ ​​हो​कर मधुर विभा सी


जीवन की पुस्तक के बिसरे इन प्रारंभिक अध्यायों को
कई दिनों से मैं रह रह कर दुहराने में लगा हुआ हू

आज झपटते है हर दिशि से तिमिर ओढ़ बदरंग कुहासे
राहों के मोड़ो पर आकर खड़ी अमावस देती पहरा
कोलतार के रंगों वाली उमड़ रही हैं उच्छल लहरें
और विरूपित ही दिखता है प्राची में किरणों का चेहरा

अंधकार के क्षण जल जाते,  हाथों में तीली आते ही
संशय में डूबे हर मन में, मैं निष्ठाएं जगा रहा हूँ 

हम बढ़ रहे सुनहरे कल की और


हम बढ़ रहे सुनहरे कल की और तुम्हारा है ये कहना
किंतू तुम्हारे मानचित्र में पंथ सभी  है बीते कल के

अरसा बीता भ्रामकता के रंग बिरंगे सपनो में खो
आश्वासन की डोरी के अनुगामी हो होकर के जीते ​
संध्या का कहना लायेगी रजनी स्वप्न सितारों वाले

आकर देती रही भोर पर, उगते दिन के पन्ने रीते

फ़ैली आंजुरि में रखती है लाकर हवा नही बादल को
एक आस अम्बर के आँगन से कोई तो गगरी छलके

प्राचीरों पर लगी फहरतीं हुई ध्वजा की परछाई में
रहे बदलते खंडित होती प्रतिमाओं के रह रह चेहरे
उड़ी पतंगे आश्वासन की तोड़ बंधी हाथों से डोरी
बही हवा की पगडंडी पर रही छोड़ती धब्बे गहरे

इन्द्रधनुष के जो धुन्धुआते चित्र दिखाते तुम रह रह कर
उनमे कोई नया नहीं है, बस लाये हो फ्रेम बदल के  

ग्रंथों में वर्णित स्वर्णिमता बतलाते तुम परे मोड़ के
भेजा तुमने उसे निमंत्रण , कल परसों में आ जायेगी
जिस सुबह के इन्तजार म उम्र गुजारा करी पीढियां
आज रात के ढलते ढलते यहां लौट कर आ जायेगी

साक्षी है इतिहास सदा ही, शायद तुम ही भूल गए हो
कोई लौट नहीं पाया जो गया कभी इस पथ पे चल के

होकर के अज्ञात रह गये

घटनाओं से संदर्भो का
हम करते अनुपात रह गए
असमंजस की बही हवा में
बनकर सूखे पात बाह गए

कारण ढूँढा किये अकारण
उगे दिवस में ढली निशा में
पल मेंे कितने पल  है बीते
शेष शेष क्या भाग गुणा में
अर्धव्यास के एक बिंदु पर
थे तलाशते किसी वृत्त को
रहे देखते रात उतैरती
चुपके से आकर संध्या में

उलझन भरे अधूरेपन के
होकर हम निष्णात रह गए

लिपट धुंध की परछाई में
चले अनावश्यक के पीछे
दृष्टि टिकाये कंगूरों पर
देखि नहीं घाटिया नीचे
बिम्ब देख कर ही प्रपात का
उल्टी कर दी कर की छागल
बिना फ्रेम के कैनवास पर
चित्र बनाये आँखे मीचे

स्वप्नदृगी हम, वर्तमान से
होकर के अज्ञात रह गये

रही मानसिकताएं बंदी
अपनी, अनजाने बंधन में
रह न सके स्वच्छन्द कभी भी
भावों तक के संप्रेषण में
कठपुतली हम, हमें नचाते
अनदेखे हाथों के धागे
बिम्बविहीना रहे आजतक
अपने जीवन के दर्पण में

बिछी बिसातों पर मोहरे से
बिना चले, खा मात रह गए

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...