इस पनघट पर तो छलकी


इस पनघट पर तो छलकी हैं सुबह शाम रस भरी गगरैया
लेकिन प्राणों के आँगन में तृषा रही बाकी की बाकी

अधरों पर उग रही प्यास ने कितने ही झरने पी डाले
नदिया के तट से भी लौटा मन हर बार अतृप्ता रह कर
उगा अगत्स्यों वाला आतुर एक मरुस्थल तप्त ह्रदय में
कितनी ही सलिलायें आयीं नभ की गंगा से बह बह कर

कितने सागरकितने मीना गिनती जिनको जोड न पाई
रही ताकती शून्य क्षितिज पर लेकिन यह सुधियों की साकी

कल तक था संतृप्त सभी कुछ तन भी मनभो दिशा दिशा भी 
छलकाती थी मधुरस पल   पल भीने  सबंधों की गागर
तट की सिकता पर रांगोली  खींचा  करता साँझ सवेरे
मुक्ता मणि के अलंकरण से पुलकित हो हो कर  रत्नाकर

इस पनघट पर तो बिखरा था दूध दही कल तक कलशों से
पर उनका अब दूर दूर तक चिहं नहीं  है शेष जरा भी

दोष नही कुछ इस पनघट कापनिहारिन पनिहारे बदले
सोख लिया सारे स्रोतों को अभिलाषा की विष बेलों ने
संचय की सुरसा मुख जैसी बढ़ती रही निरन्तर स्पर्धा
और निगलते  रहे  पनपने  से  पहले  ही  अपने   छौने

इस पनघट पर तो पुजती थीं नारी, देव नीर भरते थे
कल तक कथा सुनाया करती , दादी नानी मौसी, काकी

एक पृष्ठ कुछ मुड़ा हुआ है

तुम्हें भेंट में दी जो पुस्तक उसे खोल कर जब देखोगे
पाओगे तब कहीं मध्य में एक पृष्ठ कुछ मुड़ा  हुआ है

उस पुस्तक के पन्नों में हैं अंकित युग की प्रेम कथाएं
जगन्नाथ के सAथ लवंगी, बाजीराव और मस्तानी
रांझा हीर कैसे लैला के साथ साथ नल औ दमयंती
और उर्वशी से पुरुरवा के रिश्ते की प्रीति कहानी

शायद तुम लिखना चाहोगे इक परिशिष्ट उसी पुस्तज में
उस रिश्ते का हम दोनों के मध्य कहीं जो जुड़ा हुआ है

मुड़ा हुआ वह एक पृष्ठ है बन कर तीर जहां संधानित
वहां हमारे संबंधो की तकली कात रही है धागे
जन्म जन्म के एक सूत्र की मिल कर जोड़ रहे वो डोरी
अभिमंत्रित हों लेख भाग्य के वही कहीं नींदों सेजागे 

शिलालवख बन जुड़ा  हुआ हर एक कथानक उस पुस्तक में
जो की व्यस्तता के गतिक्रम में सुधियों में गुड़मुड़ा हुआ है 

कोरे पन्नों में उभरेगा कल इतिहास बना सोन हरा
जहाँ आज के पल पर होंगे हस्ताक्षर ओ मीट तुम्हारे
दिशाबोध बन जाएंगे वे आगत में हर असमंजस को
कभी अगर रसमय सुधियों पर घिरे संशयों के अंधियारे

हो लेगा विश्वास प्रीत का एक बार फिर से चट्टानी
कृत्रिमता में उलझ उलझ जो अभ्रक सा भुडभुडा  हुआ है 

कैनवास था टँगा फ़्रेम में

एक किसी रससिक्त छन्द की अनबूझी तलाश में निशिदिन
रहे खोलते द्वार जालघर पर जाकर सँकरी गलियों के

चारों ओर झाड़ झंखाड़ोंसे भरपूर मिले बीहड़ वन
नभ से थल तक बिछी हुई थी  बस विष  की उच्छृंखल बेलें
अन्तहीन आमंत्रण आकर देते थे आवाज़ बिन रुके
उन्हें सराहें और सहेजने को अपनी सुधियों में ले लें

जितनी बार ढूँढने चाहे मार्ग दूर इनके व्यूहों से
उतनी बार बढ़े हैं घेरे कुछ कलुषित सी प्रवृत्तियों के

बढ़ता कोलाहल पी लेता भावुकता के जल तरंग स्वर
मन की रीती गागर रीती, हर पनघट ने लौटा दी है
दूर क्षितिज तक कैनवास तो तना हुआ है टँगा फ़्रेम में
लेकिन प्रिज़्मों ने किरणों की आवेदनता ठुकरा दी है

आड़ी तिरछी रेखाओं को मानचित्र कह कर तलाशते
वे रस्ते जो गुम हो बैठे, साहित्यिक बारादरियों के

होती थीं जब अनायास ही गीतों में निमग्न संध्याएं
पोटोमक के तट पर गाया करती कोई सजल रागिनी
उसकी कोमल छुअन आज भी आ सुधियों को सिहराती हैं
मन होता आतुर है भर ले खुली बांह में झरी चांदनी

पर अब कृत्रिमता में ढूँढ़ें वैरागी आवारा नजरें

कभी फेसबुक पर मिल जाएँ, छंद नई गीतांजलियों के 

किसकी प्यास बुझाए बादल

तुमने मुझे बताया था कल, सारी धरा यहां है प्यासी
फिर दो बूँद नीर की लेकर, किसकी प्यास बुझाए बादल 
 
चारों ओर अबुझ प्यासों के सीमाहीन मरुस्थल फ़ैले
एक नई तृष्णा बोता है उगता हुआ दिवस आ आ कर
उलझे हुये नये व्यूहों में नित नित बढ़ती है अकुलाहट
फ़ैला करते पांव, सिमटती जाती हैं पल पल पर चादर

बढ़ती हुई शुष्कताओं से घिर कर रक्तिम ही रहता है
वो प्राची हो या कि प्रतीची तक फैला नभ का नीलांचल 

उदयाचल के पनघट पर भी उगती रही प्यास निशि वासर
अस्ताचल के सूने तट  पर आस लगाए आतुर नैना 
घाटी की सूनी  पगडण्डी ढूंढे  मरू ओढ़े नदिया को 
सब मरीचिकाओं में उलझे , खोते रहे हृपास का चैना  


तपती हुई जेठ की गर्मी या सावन का श्यामल अम्बर
इस नगरी में हर कोई प्यासा, किसकी प्यास बुझाए बादल 

प्यादे की हर घड़ी प्यास है, वो वज़ीर के पद तक पहुंचे
मंत्रा की है प्यास निरंतर कैसे वह राजा बन जाए
प्यासी बतखें मोती  चुगना चाहें राजहंस के जैसे
कव्वे की तृष्णा है कैसे कोयल का सुर लेकर गाये

है बबूल को प्यास पुज  सके किसी तरह बरगद के जैसा
तालाबों का नीर चाहता, भरे आंजुरी हो गंगाजल
ये नया  वर्ष आकर हमें कह रहा आज हम कुछ नई कामनाएं करें
प्रीत अभिमंत्रिता हम सुधाएं लिए आज हर इक खुली आंजुरि को भरें
हर बरस जो बिखर खंडहर हो गई आस के सारे अवशेष चुनते हुए
अपने संकल्प नूतन सजाते हुए कोई निर्माण नूतन सभी मिल करें

कामना इस वरस धर्म के नाम पर
कोई भी और अब ना नृशंसी बने
सोच संदूकची में सिमट न रहे
हर बशर वासुधैकं कुटुम्बी बने
अपने घर से जड़ों से न उजड़े कोई
हर शर देश हर एक परिवार हो
कोई दीवार खिंच ना सके अब कहीं
हर गली गाँव पूरा खुला द्वार हो

सीरिया में अमन के कबूतर उड़ें
कोई अब और शरणार्थी न बने

हो वो पेरिस या हो सेन बरनारडिनो
या कि माली न दुहराये जायें कभी
एक अम्बर की चादर की छाया तले
एक मंज़िल के पथ पर चलें मिल सभी
गिरजे मंदिर में मस्जिद सिनेगॉग में
लेश भर भी नहीं मन मुटावा बढे
एक ही पाठ हो एक सन्देश हो
चाहे भाषा कोई भी लिखें या पढ़े

धर्म की आड़ ले और खुद्गर्जियां
इस बरस अपने उल्लू न सीधे करें

इस नए वर्ष में कुछ नई सोच हो
कामनाएं मेरी नव हों, हों आप की
पूर्ण जगती में बढ़ जाए सद्भावना
संतुलन में रहे विश्व का ताप भी
हर दिवस ले के आये नई रौशनी
हर घिरी रात नूतन सपन आंज ले
दिन की तख्ती लिखे नित कथानक नए
और होकर मुदित मन उन्हें बांच ले

कामना है यही इस नए वर्ष में
नव सुधा बिंदु ही बादलों से झरें

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...