जैसे ही घूंघट खोला था



पुरबाई का चुम्बन पाकर जैसे ही घूंघट खोला था 
एक कली ने उपवन में, आ मधुपों की लग गईं  कतारें 


इससे पहले बूँद ओस की पाटळ चूमे कोई आकर 
इससे पहले मन बहलाये कोयल कोई गीत सुनाकर 
इसके पहले दर्पण में आ बादल कोई बिम्ब बनाये 
इसके पहले शाखा पुलकित हो उसको कुछ पल दुलराकर 

झंझा के झोंकों की लोलुप नज़रों ने बस  शर बरसाए 
उनसे बच कर गंधे आकर कैसे उसका रूप संवारें 

जैसे ही घूंघट खोला था, उसे विषमताओं ने घेरा 
लगा जन्म का वैरी जैसे, हर दिन आकर उगा सवेरा 
क्यारी जिसने सींच सहेजा था नज़रों की नजर बचाकर 
उसका भी व्यवहार विषमयी करने लगा समय का फेरा 

उपवन के सारे गलियारे ढले स्वत: ही चक्रव्यूह में
उत्सुक नजरें आतुरता से अभिमन्यु का पंथ निहारें

यद्यपि संस्कृति ने सिखलाईं रीति वृत्ति की सब सीमायें
कहा, देव बसते उस स्थल पर जहाँ नारियाँ होती पूजित
कलियों का खिलना नदियों का बहना है अध्याय सृजन का
सर्जनकारी शक्ति सदा ही सर्वोपरि ,हर युग में वर्णित

रहे   छद्मवेशी  सारे ही  यहाँ मंत्रण    के   प्रतिपालक
किस अगत्स्य के आश्रम के  जा सागर  में अब हाथ पखारें

दिनमानों के झरते विद्रुम

निगल चुकीं हैं गूंजे स्वर को भीड़ भरी वीरान वादियाँ 
परछाईं से टकरा टकरा लौटी खाली हाथ नजरिया 
 
जीवन की पतझरी हवा में संचित कोष हृदय के बिखरे 
दूर क्षितिज पर ही रुक जाते सावन के जो बादल उमड़े 
अंतरिक्ष का सूनापन रिस रिस भर देता है अँगनाई
 बंद हुए निशि की गठरी में आँखों के सब स्वप्न सुनहरे 
 
दृष्टि  चक्र के वातायन में कोई भी आकार न उभरे 
विधवा साँसों की तड़पन को चुप भोगे सुनसान डगरिया 
 
आभासों के आभासों से भी अब  परिचय निकले झूठे 
चिह्न दर्पणी स्मृतियों में जो अपने थे सारे ही रूठे 
किंवदंती की अनुयायी ह आस तोड  देती अपना दम 
इन हाथों में रेख नहीं वह जिससे बांध कर छेंके टूटे 
 
पैबन्दों की  बहुतायत ने रंगहीन    कर सौंपा हमको 
जब भी  हमने चाही  पल में फिर से हो शफ्फाक चदरिया 
 
अधरों पर आने से पहले शब्द हुए सारे स्वर में गम 
खामोशी की बंदी सरगम बैठी रह जाती है गुमसुम 
निशि वासर के प्रश्न अधूरे रह रह प्रश्न उठा लेते हैं
 उत्तर दे पाने में अक्षम दिनमानों के झरते विद्रुम 
 
मन ने लिखना चाहा कोरे पृष्ठों पर जब मंत्र वेद के 
खाण्डव वन तब बन जाती है जीवन की अशमनी नगरिया 

नव संवर में आज नए कुछ रंग

सोच रहा हूँ  नव संवर में आज नए कुछ रंग संवारूँ
एक  बार जो लगें कभी भी जीवन भर वे उतर  ना पाएं 
 
मांग रहा हूँ आज उषा से अरुण पीत रंगों की आभा 
कहा साँझ से मुझे सौंप से थोड़ा सा ला रंग सिंदूरी 
करी याचना नीले रंग की सिंधु  आसमानी की नभ से      
कहा निशा से मेरी झोली में भर दे अपनी कस्तूरी 
 
पाये इनका स्पर्श ज़िंदगी का कोई पल बच ना पाये 
एक बार लग जाए ये फिर रंग दूसरा चढ़ ना पाये 
 
हरित दूब से हरा रंग ले, लाल रंग गुड़हल से लेकर 
मैं चुनता हूँ रंग सुनहरा पकी धान की इक बाली से 
श्वेत कमल से लिया सावनी मेघॊं से ले रंग सलेटी
आंजुर में ेभर लिए रंग फिर हँसते होठों की लाली से 
 
चाहा रंग मेंहदिया सबके हाथों में आ रच बस जाएँ 
एक बार यों लगे कभी भी फिर दोबारा  उतर  ना पाएं .
 
चुनी अजन्ता भित्तिचित्र से अक्षय रंगों की आभायें
खिलते फूलों के लाया मैं चुनकर सारे वृन्दावन से
अभिलाषा ले सारे जग को इन के रंगों में रँग डालूँ
राग द्वेष ईर्ष्या घृणा सब मिट जायें वसुधा आँगन से
 
रंग प्रीत के नये प्रफ़ुल्लित हर फुलवारी आज सजायें
तन को चूमें मन को चूमें,जीवन खुशियों से रँग जायें

अपने अपने शून्य

जीवन की लम्बी राहों पर अपने अपने शून्य संभाले 
चलता है हर एक पथिक संग लेकर खींचे हुए दायरे 

अन्तर में है शून्य कभी तो कभी शून्य सम्मुख आ जाता
और कभी तो अथक परिश्रम, केवल शून्य अन्त में देता
आदि जहां  से हुआ अन्त भी सम्भाहित हो रहा शून्य पर
बाकी गुणा जोड़ सब कुछ  बस रहा शून्य का जोखा लेखा

यद्यपि अधोचेतनाओं में दृश्य हुआ पर रहा अगोचर
सत्य आवरण की छाया में बन कर रहता यज्ञ दाह रे

वर्तमान जब ढले शून्य में, पलक पारदर्शी खुलती हैं
 दृश्य सामने आ जाते हैं लम्बे घने उजालों वाले 
चांदी के प्यालों से छलके तब अबीर बन सपने कोमल
फिर अतीत के स्वर्णकलश से भरते हैं सुधियों के प्याले 

लेकिन ऐसा शून्य गहरता अक्सर गया नकारा ही तो 
जो ले शून्य किनारे बैठे, लगा सके हैं कहाँ थाह रे 

जीवन के इस अंकगणित में क्या परिचित है और  अपरिचित 
एक शून्य के खिंचे  वृत्त की परिधि पर सब कुछ है अंकित
अर्धव्यास पर रहते रहते कौन व्यास में ढल जाता है 
कौन हथेली की रेखा से गिरता, कौन रहा हो संचित 

समीकरण के चिह्न कहीं भी लगे  शून्य तो रहा शून्य ही 
बनती रही शून्य ही केवल हृदयांचल से उठी चाह रे  

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...