ज़िंदगी की वाटिका में

ज़िंदगी की वाटिका में  चाह तो रोपे निरन्तर
तुलसियों को मंजरी पर उग रहीं हैं नागफ़नियाँ
 
नीर तट अभिमंत्रिता सौगन्ध से सींचा निशा दिन
बाड़ कर सम्बन्ध की बिलकुल अछूती डोरियों से
पल्लवन को छाँह में फ़ैलाईं पलकों की बरौनी
और सौंपा लाड़ प्रतिपल सरगमी कुछ लोरियों से
 
पर अपेक्षित पाहुनों के पांव अब तक उठ ना पाये
ताकते कितना रहे हम शून्य पथ पर टाँक अंखियाँ
 
नील नभ की वादियों में है विचरता मन पखेरू 
बादलों के पंख फैलाये हवा की झालरों पर 
बांह में भर कर धनक के रंग की आभाएँ अद्भुत 
ढूंढता विश्रांति के पल धूप वाली चादरों पर 
 
पर ठगी मौसम लुटेरा घात कर बैठा डगर पर 
हो गईं अपनी यहां के मोड़ पर हर राहजनियाँ 
 
रह गये बुनते घरौंदे याद के सैकता कणों से
नैन वाली जाह्नवी की धार में निशिदिन भिगोकर
दूर होकर के लगाई जो विगत ने, अड़चनों से
है सजाते मौक्त मणियों से जड़े सपने पिरोकर
 
पर ना जाने कौन अपनी उंगलियों के इंगितों से
काँच के टुकड़े बना देता,सजाईं हीर कनियाँ

गंध में भीगे हुए हैं

ज़िंदगी की वाटिका में जो हुए सुरभित निशा दिन 
वे सभी पल मित्रता की गंध में भीगे हुए हैं 


कर समन्वय नित्य  ही सौहार्द्र के स्वर्णिम क्षणों से 
जोड़ते है तार अपने मुस्कुराती वीथियों से 
बांधते हैं डोरियाँ नव सोच की बुन  कर निरंतर 
तोड  कर सम्बन्ध जर्जर रूढिवाली रीतियों से 

बन गए थाती संजोई जो नहीं अक्षुण्ण होती 
चाहे घट अनगिन निधी के शेष हो रीते हुए हैं 

जो जुड़े संदीपनी आकाश की परछाईयों में
सूर्या  अंशित से जुड़े कुरुराज के सम्बन्ध गहरे
पार्थ से जुड़ कर सहज वल्गायें थामी उंगलियों में
और किष्किन्धाओं पर जुड़ कर स्वत: ही पाँव ठहरे

इन सुगम अनुभूतियों की जब छलकतीं हैं सुधायें
याद के पुलकित हुयें पल अब उन्हें पीते हुये हैं

मोड़ पर आ ज़िन्दगी के दृष्टि मुड़ कर देखती है
सामने आते करीने से लगे घटनाओं के क्रम
सिर्फ़ कुछ दिखते निरन्तर स्वर्णमंडित मित्रता से
शेष पर केवल चढ़ा अपनत्व का  थोपा हुआ भ्रम


हाथ की रेखाओं में भी बन गये रेखायें गहरी
बस वही पल मित्रता के, शेष बस बीते हुये हैं.

आओ दीप वहाँ धर आयें

सूरज अस्त हो गया तो क्या, आओ सूरज नया उगायें
नई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयें
 
संध्या का दीपक आगे बढ़ फिर ललकारे स्वत्य तिमिर का
पाषाणों  में  सहज आस्था रख दे फिर से प्राण घोल कर 
गूँजे नाद व्योम में छाई निस्तब्धतायें घनी तोड़ कर
और गंध बिखराती जाये, अपना घूँघट  कली खोल कर
 
आओ हम-तुम कविताओं से एक नया अध्याय रचायें
नई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयें
 
आशाओं के मुरझाये फूलों में फिर से भरे चेतना
बुन लें टूटे हुये स्वप्न को कात कात कर नई दुशाला
और बूटियाँ टाँकें उसमें  सोनहरे सुरभित आगत की
बन कर पारस करें सुधामय, बहती हुई वज़्र सी हाला
 
आओ ऐसा जतन करें हम, फिर जमना तट रास रचायें
नई भोर का सृजन करें हम, आओ दीप वहाँ धर आयें

एक दृष्टि का भ्रम ही तो है लगता सूरज अस्त हो गया
आओ उठें नजर का अपनी हम विस्तार अनन्ती कर लें
जहाँ शीश पर टंक  जाने  को अनगिन सूरज लालायित हैं 
उन्हें सजा कर, हारे मन को हम अपना सहपंथी कर लें
 
सूरज अस्त हो गया ? अपनी आँजुरि से छिटकायें प्रभायें
ठोकर खाये नहीं दूसरा कोई, चलो दीप धर आयें
 
हम वसुधा के रहे कुटुम्बी, संस्कृतियों ने सिखलाया है
हमको सह पाना मुश्किल है किसी आँख में छलका पानी
आओ हर संध्या में हम तुम, एक नहीं शत सूर्य उगायें
सिरते हुये दिये लहरों पर लिखें ज्योति की नई कहानी
 
करें याद फिर, भुला गया है समय हमें अपनी क्षमतायें
हर इक डगर ज्योत्सना बिखरे, आओ दीप वहाँ धर आयें

एक यह विश्वास पलता भी ढहा


जानते परिणति बुझेंगे अंतत:
दीप फिर भी सांझ में जलते रहे 
 
झोलियाँ खाली थीं खाली ही रहीं
औ हथेली एक फ़ैली रह गई 
हाथ की रेखाओं में है रिक्तता
एक चिट्ठी चुन के चिड़िया कह गई  
चाल नक्षत्रों की   बदलेगी नहीं 
ज्योतिषी ने खोल कर पत्रा कहा
दिन बदलते वर्ष बारह बाद हैं
एक  यह विश्वास पलता भी ढहा
 
पर कलाई थाम कर निष्ठाओं की
पाँव पथ में रात दिन चलते रहे

भोर खाली हाथ लौटी सांझ को
चाह ले पाए बसेरा रात से
दोपहर ने लूट थे पथ में लिए
वे सभी पाथेय  जो भी साथ थे 
धूप का बचपन लुटा यौवन ढला
एक भी गाथा न लेकिन बन सकी
रिस रही थी उम्र दर्पण देखते
अंततोगत्वा विवश हारी थकी

एक लेकर आस लौटेंगे सुबह
इसलिए हर सांझ को सूरज ढले

रंग दिये पत्थर कई सिन्दूर से
व्रत किये परिपूर्ण सोलह, सोम के
देवताओं के ह्रदय पिघले नहीं
जो बताया था गया है  मोम के
पूर्णिमा की सत्यनारायाण  कथा
और हर इक शुक्र बाँटे गुड़ चने
पर न जाने क्या हुआ, छँटते नहीं
छाये विधि के लेख पर कोहरे घने

आस्थायें ले अपेक्षायें खड़ीं
एक दिन उपलब्धि   मिल ले गले

आज दीपक राग गा लूँ

मिट रहे हैं पावसी काली घटाओं के अँधेरे 
आज प्राची में उषाकी  ओढनी  लहरा रही है 
आज फिर चढने लगी है धूप दिन की सीढ़ियों पर 
ऑज अधरों पर तुहिन को इक कली मुस्का रही है 
 
आज मैं  अपने हृदय के संशयों के भ्रम मिट लूँ 
दूर हों अवशेष तम के, सूर्य आँगन में उगा  लूँ 
आज दीपक राग गा  लूँ 
 
अस्मिताएं जो गईं  थी खो, नया अब अर्थ पाएं 
दीप  की लडियां उदित हों और फिर से झिलमिलाएँ 
ओढ़ शरदीली शरद की धुप का कम्बल सुकोमल 
नाचने लग जाएँ आँगन में उतर   कर के विभाएँ 
 
छेड़ कर कुछ थिरकनें मैं रश्मियों के साज पर अब 
सोचता हूँ प्रीत की मादक धुनें फिर से बजा लूँ 
आज दीपक राग गा लूँ 
 
उठ रहे संकल्प गंगा के तटों पर डुबकियाँ ले
भोर सोते से उठाती आरती की मंत्रध्वनियाँ
अब नई निष्ठायें ले विश्वास की पूँजी मुदित हैं
खोल कर बाँहें खड़े हैं स्वागतों को द्वार गलियाँ
 
आ रही पुरबाई लेकर पत्र जो वृन्दावनों के
सोचता हू आंजुरि में किस तरह सारे संभालूँ
आज दीपक राग गा लूँ
 
झर रहे हैं कल्पतरुओं से सुमन सब अदबदा कर
अल्पनायें खींचती हैं नव अजन्तायें क्षितिज पर
गन्ध पीकर कुंज वन की लड़खड़ाते कुछ झकोरे
धूम्र सा लहरा रहा है बांसुरी का गूँजता स्वर
 
जो निराशा के कुहासे ओढ़ पर बैठी हुई है 
शाम पर मैं आस की सतरंगिया चादर बिछा लूँ
और दीपक राग गा लूँ

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...