एक मोड़ पर जाने कब से

कितने दिन हो गये भाव ने थामी नहीं शब्द की उंगली
कितने दिन हो गये भावना, मन से बाहर आ न मचली
कितने दिन हो गये कल्पना के पाखी ने नीड़ न छोड़ा
कितने दिन हो गये समय की कात न पाई धागे तकली
 
वैसे तो सब कुछ परिवर्तित होता रहा निरन्तर गति से
केवल मेरा अनुभव अटका एक मोड़ पर जाने कब से
 
संदेशों के उजियारे फ़ाहे आ कर बिखरे अम्बर पर
मसि को कर के परस घटायें बन कर आये नहीं संवर कर 
मेघदूत की वंशावलियां लगा कहीं अवरुद्ध हो गईं
कोई चिह्न नहीं दिखता है बिछे पत्र पर कहीं उभर कर
 
शब्दों की लड़ियाँ तो बुनती रही नीर की ढलती बूँदें
एक धार में बँध कर लेकिन ढुलकी नहीं व्याकरण घट से
 
बोला कहीं पपीहा कोई मोर पुकारा कहीं विजन में
कोई भी आकार न उभरा बिछे हुये जा पंथ-नयन में
रही खोलती बन्द क्षितिज की खिड़की दृष्टि अधीरा पगली
सूनापन देता आहुतियाँ रहा ह्रदय की जली अगन में
 
सूखी जमना, तट की रेती सोख रही है एक एक कर
जितने भी थे राग सिक्त हो उठते आये वंशीवट से
 
बांधे हुए न जाने कैसे कुछ अनदेखे अनचीन्हे पल
आकुलता को दे जाते हैं इक क्षणांश का कोई संबल
पल की करवट फिर भर देती अन्तहीन लाचारी मन में
ढली सांझ सा लगने लगता दोपहरी का मौसम उज्ज्वल
 
रीत चुके कोषों का सूनापन यादों के गलियारे में
आ जाता है कजरी चूनर के लहराते ही झटपट से
 

सुमनशोभिते ! शब्द एक वह

लिख देती है अनायास ही कलम शब्द कोई मुस्का कर
वाणी पुलकित्त हो जाती है उसको अपने सुर में गाकर
अक्षर अक्षर से होते हैं निसृत मृदु गंधों के झरने
छूने लगती गगन, उमंगें पंख कल्पना के फ़ैला कर
 
सुमनशोभिते ! शब्द एक वह इंगित करता नाम तुम्हारा
भाषा,सरगम और सोच सब उस पर ही रहते आधारित.
 
करती रही गगन पर अंकित, पहली पहली किरन भोर की
आतुर जिसके दरश के लिये रही सदा तृष्णा चकोर सी
रही जोड़ती अभिलाषायें जिसकी, पथ से पांव पथिक के
जिसकी स्मृतियों के पल पाकर होती हैं सुधियाँ विभोर ही
 
सुरपुर सलिले, एक नाम है तुम्हें विदित होगा यह शायद
जो कर देता उपज रहे हर संशय को पल में विस्थापित
 
बादल के टुकड़ों से जब जब होने लगती है प्रतिबिम्बित
धूप स्याहियाँ सात रंग की लेकर के अंकित करती है
बून्दों की लड़ियों को अपनी चूनर के फ़ुँदने में बाँधे
हवा सीटियाँ बजा बजा कर जिसका ज़िक्र किया करती है
 
सरगमवन्दे !प्रथमा पंचम आरोहों में अवरोहों में
एक नाम है हर इक सुर में सहज भाव से हुआ निनादित
 
भीगा हुअ ओस में चंचल एक हवा का नन्हा झों का
जड़ देता आरक्त कपोलों पर जिसको कर के रस चुम्बन
सिहरन की इक लहर बना कर भरने लगता है सांसों में
और बाँध कर रख देता है जिससे धड़की हर इक धड़कन
 
अरुणिम अधरे ! चेतन से ले अवचेतन के सारे गतिक्रम
और अचेतन मन की कृतियाँ एक उसी से है अनुशासित

तुम कहोगे प्रीत का अध्याय नूतन लिख रहा हूँ

भावविह्वल हो तुम्हें मैं बांह में अपनी भरूं  तो
अचकचाकर मैं कपोलों पर कोई चुम्बन जड तो
दृष्टि को अपनी भिगोकर गंध में कस्तूरियों की
मैं तुम्हारे रूप का शृंगार कुछ नूतन करूं तो
 
ये मेरी अनुभूति का उत्कर्ष ही कहलायेगा या
तुम कहोगे प्रीत का अध्याय नूतन लिख रहा हूँ  
 
मैं तुम्हारे पगनखों में ढाल कर अपनी कलम को
छन्द कुछ रच ्दूँसमय के सिन्धु तट की सीपियों पर
और चितवन को बनाकर तूलिकायें फिर सजादूँ
मैं अजन्तायें हजारों मलयजों की भीतियों पर
यह कलाओं का मेरी परिचय नया कहलायेगा या
या वही रह जाऊँगा लिखता हुआ जो नित रहा हूँ
 
बांसुरी की धुन,चमेली और बेला अब पुराने
बाग़ में गाते हुए फिर से मधुप के ही तराने
छोड़ कर देखूं तुम्हें उलझे हुए मैं मीटिंगों में
मुट्ठियों में भर  तुम्हारी याद के कुछ पल सुहाने 
 क्या इसे मन की कोई आवारगी का नाम देगा  
जो तुम्हारे नाम में हर एक पल को लिख रहा हूँ  
 
हर घड़ी महसूस तुमको मैं करूँ भुजपाश में ही 
दोपहर अलसाई हो जब पाँव को फैलाये अपने 
भोर गंगा तीर पर पहली किरण की आरती हो
आँजती  हो रात नयनों में मेरे रंगीन सपने 
 
तुम इसे मन के बहम का नाम दोगे या कहोगे 
मैं जुडी निष्ठाओं का प्रतिरूप बन कर दिख रहा हूँ 

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...