तपस्या एक भी अब तक सुहागन

आईने अपने लिए हर बार नव  आकार मांग 
और मन यह आईने से नित नया उपकार मांगे 
 
हो नहीं पाई तपस्या एक भी अब तक सुहागन
आस्था से कामना का हो नहीं पाया विभाजन
कल्पना की दूरियों का संकुचित विस्तार पाया
रह गई अभिशप्त होकर आस की दुल्हन अभागन
 
धड़कनें नित सांस से अपने लिये उपहार माँगे
चाह अपनी तोड़ कर सीमाओं को विस्तार मांगे
 
झर चुके हैं पात, बैठा शाख पर पाखी अकेला
ताकता धुंधले क्षितिज पर बिम्ब का बिखरा झमेला
 शुष्क आहत चिह्न  पर उगते विलापों के स्वरों में
ढूँढ़ता है सांत्वना  को दे सके वह एक हेला
 
मौसमों की बदलियों से पीर का उपचार माँगे
सांस अपनी मेहनतों का नित्य ही प्रतिकार मांगे
 
लौट आये उद्गमों पर वृत्त में चलते हुये पग
फडफडा कर पंख अपने रह गया मन का अथक खग
झाँक कर देखा क्षितिज के अनगिनत वातायनों में
घुल गईं सारी अपेक्षा ह दृश्य दीखे कोई जगमग
 
घुंघरुओं का मौन फिर अपने लिए झंकार मांगे
 कारणों से पीर अपने वास्ते निस्तार मांगे


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रह गए थे हम जबाब भोर सांझ बेचते

दीपकों से दीप की शिखायें मोड़ मुंह गईं
इस तरह से रश्मियां तिमिर की आन छू गईं
व्योम में रुकी रही थी खिलखिला के  चांदनी
तारकों की पंथ में हुई तमाम रहजनी
दिशाओं के भरे कलश सजे थे जितने रीत कर
झनझनाते रह गये थे पनघटोम की भीत पर
सीढ़ियों के ही तले से राह नित्य चल पडी
मुंह छुपाये रह गयी थी हाथ में बंधी घड़ी
 
 
बंद पुस्तकों के पृष्ठ खोल रोज देखते
अबूझे प्रश्न के जवाब शून्य में ही खोजते
उम्र बर्फ के डेल  सी घुल गई हवाओं में
रश्मियों को रह गए हैं  कांच में ही देखते
 
 
खिड़्कियों पे जा टिकी रही थी दृष्टि अनमनी
पाहुनों की पंथ से सुलझ न पाई अनबनी
जाल यूं बिछा रहा समय का था बहेलिया
रह गईं थी रिक्त फ़िर से फ़ैल कर हथेलियाँ
द्वार आगतों  के दीप थाल में रखे रहे
तीलियां विमुख हुईं थीं अनजले सभी रहे
कुमकुमों  ने कुंकुमों के रंग सारे पी लिये
ले गये विदाई दिन ये बोल के कि जी लिये
 
 
इक झुकी हुई कमर लिए थे प्रश्न चिह्न जो
उत्तरों में अर्थ उनका खोजते थे  भिन्न हो
मंडियां उजाड़ कोई कुछ नहीं खरीदता
रह गए थे हम जबाब भोर सांझ बेचते
 
 
यामिनी ने जो लिखे थे पत्र नाम भोर के
सांझ की उदासियों के चक्रव्यूह तोड़ के
तारकों के अंश को पिरो पिरो के शब्द में
नभ सरित की गंध घोल भावना के वक्ष में
पत्र वे सभी घिरी घटाएं ले गईं चुरा
और जो पता रहा हवाओं ने लिया उड़ा
जुड़ न पाई शब्द से अधर ने जो भी बात की 
धुंध में विलीन हो रही थी रेख हाथ की 
 
 
सामने वितान पर  न चित्र कोई बन सका
प्रकाश नभ के छिद्र से न अंश मात्र छन सका 
बोझ सांस का चढ़ाए लाठियों पे चल रहे 
कदम बढाते एक पर पचास बार टेकते 
 

तुमसे कितना प्यार मुझे है



 
कुछ प्रश्नों  का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है 
ऐसा ही यह प्रश्न तुम्हारा तुमसे कितना प्यार मुझे है 
 
संभव कहाँ शब्द में बांधू  गहराई मैं मीत प्यार की 
प्याले में कर सकूं कैद मैं गति गंगा की तीव्र धार की 
आदि अंत से परे रहा जो अविरल है अविराम निरंतर 
मुट्ठी में क्या सिमटेगी  विस्तृतता तुमसे मेरे प्यार  की 
 
असफल सभी चेष्टा मेरी कितना भी चाहा हो वर्णित 
लेकिन हुआ नहीं परिभाषित तुमसे कितना प्यार मुझे है 
 
अर्थ प्यार का शब्द तुम्हें भी ज्ञात नहीं बतला सकते हैं
मन के बंधन जो गहरे हैं, होंठ कभी क्या गा सकते हैं
ढाई  अक्षर कहाँ कबीरा, बतलासकी दीवानी मीरा 
यह अंतस की बोल प्रकाशन पूरा कैसे पा सकते हैं 
 
श्रमिक-स्वेद कण के नाते को  रेख सिंदूरी से सुहाग का 
जितना होता प्यार जान लो तुमसे उतना प्यार मुझे है 
 
ग्रंथों ने अनगिनत कथाएं रचीं और हर बार बखानी 
नल दमयंती, लैला मजनू, बाजीराव और मस्तानी 
लेकिन अक्षम रहा बताये प्यार पैठता कितना गहरे
जितना भी डूबे उतना ही गहरा हो जाता है पानी
 
शायद एक तुम्हों हो जो यह सत्य मुझे बतला सकता है
तुम ही तो अनुभूत कर रहे तुमसे कितना प्यार मुझे है।

प्रतीक्षा कर रहा हूँ

फिर तुम्हारे पांव चूमें पनघटों के पंथ को जा
मैं कलश के रिक्त होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ
 
चाहती है दृष्टि जाकर के रुके उस ईंडुरी पर
जो तुम्हारे शीश पर की ओढ़नी को चूमती है
और वेणी जो लपेटे पुष्पहारों की कतारें
पंथ पर चलते हुये कटि पर निरंतर झूमती है
 
पायलों की रुनझुनों में कंगनों की खनखनाहट
सरगमी सम्मिश्रणों की मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ 
 
चाहना है गर्व जितना गागरी को शीष चढ़कर
हो जरा उतना तुम्हारा स्पर्श पा भुजपाश को भी
गंधसिक्ता कलसियों की रसभरी अनुभूतियों का
अंश थोड़ा सा मिले जो आतुरा है सांस को भी
 
फिर तुम्हारी कनखियों के कोण दर्पण से विमुख हों
पूर्ण मैं श्रंगार होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ 
 
देह की गोदावरी में उठ रहीं चंचल तरंगें
उंगलियों के पोर को कर तीर जिस पल छेड़ती हैं
तब हवा की धारियों में हो रही आलोड़ना में
सावनी मल्हार सरगम के नये स्वर टेरती हैं 
 
चंग की इक थाप पर फ़गुनाहटों को मैं सजाकर
अब चिकुर के मेघ बनने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ

खबरें वही पुरानी

खबरें वही पुरानी लेकर आया है अखबार
सभी जानते किन्तु न करता कोई भी स्वीकार
 
वोही किस्सा भारत में सब करें चापलूसी
झूठी करें प्रशंसा बरतें तनिक न कंजूसी
लेकर एक कटोरा माँगें द्वारे द्वारे"वाह"
देख दूसरों की करते हैं अपने मेन में डाह
 
खुद ही अपनी पीठ ठोकते आये हैं हर बार
 वही पुरानी लेकर आया है अखबार
 
चार बटोरे अक्षर कहते हैं खुद को ज्ञानी
कहते वेद रचयिता हैं वो इतने अभिमानी
खुद का लिखा खुदा न समझे,पथ के अनुयायी
बिखराते हर एक क्षेत्र में ये केवल स्याही
 
देख दुराग्रह इनका सारे तर्क गये हैं हार
खबरें वही पुरानी लेकर आया है अखबार
 
अपना खेमा अपना भौंपू ये लेकर चलते
कोई आगे बढ़े तनिक तो तन मन हैं जलते
सारे ग्रन्थ होंठ पर इनके आकर हैं रुकते
ये खजूर के पेड़ सरीखे नहीं जरा झुकते
 
दंभ सदा ही रहता आया सिर पर हुआ सवार
 खबरें वही पुरानी लेकर आया है अखबार

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...