आवाज़ कोई द्वार आकर

हो गया विचलित अचानक सांझ में यह वावला मन
दे रहा है यूँ लगे,आवाज़ कोई द्वार आकर
 
देखता हूँ द्वार पर दहलीज पर है शून्य केवल
दूब को सहलायें ऐसे भी नहीं थिरकें हवायें
ओढ़ कर सूना अकेलापन बिछी पगडंडियाँ हैं
लौट आती हैं क्षितिज से रिक्त ही भटकी निगाहें
 
शान्त इस निस्तब्धता में किन्तु जाने क्यों निरन्तर
लग रहा सरगम सुनाती नाम कोई गुनगुनाकर.
 
शाख पर से झर बिखर कर रह गया है पर्ण अंतिम
शोषिता सिकता हुई है मौन अब होकर समर्पित
झाड़ियां तटबन्ध पर जैसे लिये बैठीं समाधी
छुप गईं जाकर क्षितिज के पार हर बदरी अचम्भित
 
रुद्ध तारों पर हुए हैं साज के गूँजे हुए स्वर
किन्तु लगता छुप रहा कोई मुझे रह रह बुलाकर
 

एक पल जो खींचता है डोरियां सुधि की सहज ही
शुष्क मरुथल में अचानक प्राण आकर सींचता है
हैं ललकती सिन्धु की उच्छल तरंगे बाँह भर लें
जो अचानक पीठ पीछे आ पलक को मींचता है
 

चाहता हूँ देख पाऊँ मैं उसे अपने नयन से
किन्तु रहता है घटा की ओट में छुप वह प्रभाकर

कोई भी आवाज़ न गूँजी

पायल तो आतुर थी थिरके
बजी नहीं वंशी पर ही धुन
सूना रहा तीर यमुना का
कोई भी आवाज़ न गूँजी
 
फूल, कदम के तले बिछाये
रहे गलीचा पंखुरियों का
सिकता अभ्रक के चूरे सी
कोमल हुई और चमकीली
लहरों ने थी उमड़ उमड़ कर
दीं तट को अनगिन आवाज़ें
हुई सांवरी डूब प्रतीक्षा में
अम्बर की चादर नीली
 
पलक बिछाये बाट जोहता
था बाँहे फ़ैलाये मधुवन
लालायित था चूम पगतली
सहज लुटा दे संचित पूँजी
 
गोकुल से बरसाने तक था
नजरें फ़ैलाये वॄन्दावन
दधि की मटकी बिछी डगर पर
कहीं एक भी बार न टूटी
छछिया में भर छाछ खड़ी थी
छोहरियां अहीर की पथ में
नाच नचाती जिसको जाने
कहाँ गई कामरिया रूठी
 
भटक गया असमंजस में फ़ँस
मन का जैसे हर इक निश्चय
एक पंथ पर रहा प्रतीक्षित
दूजी कोई राह न सूझी
 
घुँघरू ने भेजे वंशी को
रह रह कर अभिनव आमंत्रण
संबंधों की सौगंधों की
फिर से फिर से याद दिलाई
प्रथम दॄष्टि ने जिसे लिख दिया था
मन के कोरे कागज़ पर
लिपटी हुई प्रीत की धुन में
वह इक कविता फिर फिर गाई
 
लेकिन रहे अधूरे सारे, जितने
किये निरन्तर उपक्रम
गुंथी हुई अनबूझ पहेली
एक बार भी गई न बूझी

यों उधारी की हमको मिली ज़िंदगी

यों उधारी की हमको मिली ज़िंदगी

दिल्ली मेट्रो में दफ्तर को जाते हुए
धक्का मुक्की के नियमित हुए खेल सी
आफ सीजन में क्लीरेंस के वास्ते
हेवी डिस्काउंट पर लग रही सेल सी
बीस दिन बर्फ के बोझ से दब रही
लान की सूख कर मर गई घास सी
एक कोने में टेबुल के नीचे पडी
गड्डियों से जुदा हो गए ताश सी
ठण्ड में वस्त्र खोकर ठिठुरते हुए
एक गुमसुम अकेले खड़े पेड़ सी
हर किसी की छुंअन से अपरिचित रहे
टूट नीचे गिरे एक झरबेर सी

ज्यों फटी जेब हो अनासिली ,ज़िंदगी
थी उधारी की हमको मिली ज़िंदगी

शब्द के अर्थ की उँगलियों से विलग
पृष्ठ पर एक आधे लिखे गीत सी
पश्चिमी सभ्यता की चमक ओढ कर
भूली बिसरी पुरानी किसी रीत सी
दाग पहने हुए टोकरी से किसी
दूर फेंके हुए लाल इक सेव सी
रेडियो से बदल एक फ्रीक्वेंसी
हो प्रसारित नहीं जो सकी, वेव सी
बंद हो रह गई इक घड़ी से बजा
ही नहीं भोर के एक एलार्म सी
देखता ही नहीं कोई भी आ जिसे
बंद कमरे में बिखरे हुए चार्म सी
 
 
ठूंठ जैसी रही अनखिली ज़िंदगी
यों उधारी की हमको मिली ज़िंदगी
 
 
सीढि़याँ ले विरासत की चलता रहा
ब्याज दर ब्याज इक अनचुके कर्ज़ सी
दर्पणों को दिखाते हुए प्रश्न बन
सामने आ खड़े अननिभे फ़र्ज़ सी
इक स्वयंवर में टूटे धनुष की तरह
चौथ के चन्द्रमा के कलुष की तरह
कामनाओं के बोझों तले दब गिरे
स्वर्ग पाकर के राजा नहुष की तरह
एक पूजा के बासी हुए फूल सी
नित्य दुहराई जाती रही भूल सी
प्यास की आग में होंठ जलते लिये
एक नदिया के सूखे पड़े कूल सी
 
 
धूप मे, पापड़ों सी बिली ज़िन्दगी
यों उधारी सी हमको मिली ज़िन्दगी
 
 
ज़िंदगी मुझसे नजरें चुराती रही
दूर बैठे हुए मुस्कुराती रही
आज सहसा मेरे सामने आ गई
मुझको बैठे बिठाए हंसी आ गयी
शब्द कोशों ने पूरा समर्पण किया
और भाषायें सब मौन होकर रहीं
तेरा उपमान बन आ सके सामने
पूर्ण ब्रह्मांड में कोई ऐसा नहीं
सॄष्टि की पूर्ण निधि से बड़ा है कहीं
तेरे आशीष का इक परस शीश पर
चिह्न तेरे चरण के जहां पर पड़े
स्वर्ग है देव-दुर्लभ वहीं पर कहीं


शब्द जितने रहे पास सब चुक गये, वन्दना के लिये कुछ नहीं कह सके
तूने जिनको रचा वे हो करबद्ध बस प्रर्थना में खड़े मौन हो रह गये
तूने पूरा दिया पर अधूरा रहा ज्ञान मेरा,रहीं झोलियां रिक्त ही
कंठ के स्वर मेरे आज फिर से तेरा पायें आशीष शत बार हैं कह गये

जितनी संचित हुईं मेरी अनुभूतियां,भावनायें रहीं या कि अभिव्यक्तियाँ
होंठ पर आके जितनी सजीं हैं सभी तेरा अनुदान बन ज़िन्दगी को मिलीं
सिद्धियाँ रिद्धिया जितनीं पाईं ,चढ़े जितने गिरि्श्रग मैने प्रगति पंथ पर
उनकी राहें सुगम कर रहीं रात दिन कलियां आशीष की क्यारियों में खिली
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कामधेनु की क्षमतायें कर सहसगुनी
कल्पवृक्ष की निधियों को कर कोटि गुणित
जितना होता संभव, उसका अंश नहीं
जो तेरे आँचल में रहता है संचित

युगों युगों तक करते हुए तपस्यायें
जितना ऋषि-मुनियों को प्राप्त हुआ करता
वह इक पल में तेरी ममता का अमृत
बन कर सहज शीश पर आ जाता झरता

तेरे इक इंगित से होता सृष्टि सृजन
तू ही ब्रह्मा विष्णु और शिव से वंदित
कलुषों की संहारक,ज्ञान-ज्योति दायक
तुझको है जीवन का हर इक क्षण अर्पित

जग ने जो कुछ पाया, तू ही है कारण
शब्द कहें कुछ तुझको,संभव हुआ नहीं
तू ही भाषा, भाव और संप्रेषण तू
तेरा कोई गुण गाये हो सका नहीं

तू तराश कच्ची मिट्टी के लौंदे को
एक सुघड़ और सुन्दर मूर्ति बनाती है
संस्कार,संस्कृतियाँ,सारी शिक्षायें
तेरे ही चरणों से बह कर आती हैं

एक बार फिर यही कामना है मेरी
तेरा हस्त छ्त्र बन सिर पर तना रहे
माँ ! जीवन की हर करवट में बसा हुआ
तेरा यह अनुराग साथ में बना रहे

कौन जिससे फूल ने सीखा महकना


कौन है जो चाहता है गीत में मेरे संवरना
भावना की उंगलियों को थाम छन्दों में विचरना
 
 
कौन है जो सुर मिलाये गुनगुनाहट से मधुप की
कौन तितली के परों पर आप अपना चित्र खींचे
कौन अलसाई दुपहरी की तरह अंगड़ाई लेता
स्वप्न बन आये नयन में,सांझ जब भी आँख मीचे
 
 
सोचत्ता हूँ, कौन जिससे फूल ने सीखा महकना
कौन है जो चाहता है गीत में मेरे सँवरना
 
 
कौन है जो शब्द को देता निरन्तर अर्थ नूतन
कौन जो गलबाँह डाले चेतना सँग मुस्कुराता
कौन भरता प्राण में माधुर्य सुधियों के परस का
कौन मेरी धमनियों में शिंजिनी सा झनझनाता
 
 
ढूँढ़ता हूँ कौन,जिससे सीखती कलियाँ चटखना
कौन है जो चहता है गीत में मेरे संवरना
 
 
कौन है मन में जगाये ताजमहली प्रेरणायें
कौन बन कर तूलिकायें,रंग खाकों में उकेरे
यामिनी की सेज सज्जित कौन करता आ निशा में
कौन बन कर दीप अभिनन्दित करे उगते सवेरे
 
 
कौन अंधियारे ह्रदय में सूर्य सा चाहे चमकना
कौन है जो चाहता है गीत में मेरे संवरना
 
 
हो रहीं सुधियाँ विलोड़ित कौन जिसकी एक स्मृति से
कौन है परछाईयों में भर रहा आभा सिँदूरी
कौन होकर के समाहित कालगति में चल रहा है
कौन जिसके नाम बिन हर साँस रह जाती अधूरी
 
 
कौन जिसका बिम्ब चाहे नैन में रह रह उतरना
कौन है जो चाहता है गीत में मेरे संवरना

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...