स्वर में रँग कर गाते तो हैं

सम्बन्धों की छार छार हो चुकी चूनरी में हम अपने
समझौतों के टूटे टुकड़ों के पैबन्द लगाते तो हैं
शब्द नहीं हैं, शिल्प नहीं हैं भावहीन हों चाहे लेकिन
मन की आवाज़ों को अपने स्वर में रँग कर गाते तो हैं

जुड़ा नहीं परिचय का धागा, गुरुकुल वाले संस्कार से
रही ज्योति की चाह हमेशा निकल न पाये अंधकार से
आकांक्षा थी दीपित हों हम, इसीलिये दिन रात जले हैं
एकलव्य की निष्ठायें भी भरीं अंक में हर प्रकार से

द्रोणाचार्य भले ही अपने पूर्वाग्रह से ग्रसित रहे हैं
लेकिन अपना एक अँगूठा हम फिर भी कटवाते तो हैं

रहीं पूर्णिमा, पंचम, द्वितीया या एकादशियां पक्षों की
रखी सजा पूजा की थाली, रँग लीं दीवारें कक्षों की
धूप अगरु लोबान जला कर बुना धुँए का सेतु गगन तक
श्रुति की नई व्याख्या सुन लीं, उसके तथाकथित दक्षों की

ज्ञात रहा पत्थर ही तो है, जो नदिया के तल से निकला
श्रद्धा में पर डुब आस्था, उस पर नीर चढ़ाते तो हैं

चला नहीं है साथ पंथ पर, थाम हाथ हाथों में कोई
अभिलाषाओं की संस्मॄतियां, एकाकी हो वन में खोई
अवरोधों के फ़न फ़ैलाये झंझाओं से लड़ते लड़ते
कॄत संकल्पों की सब घड़ियाँआखिर में थक कर के सोईं

थकी हुई आशाओं के बिखरे धागे एकत्रित कर के
बाती में बट, विश्वासों का फिर से दीप जलाते तो हैं

नहीं भीड़ में जगह पा सकीं जब पहचानों की रेखायें
जागी नहीं शीत परिवेशों में अपनेपन की उष्मायें
उमड़े हुए सिन्धु के तट पर सीपी शेष न कोई पाई
किये समर्पण झुकी धरा पर जब जीवन की सभी विधायें

संस्कॄतियों से मिली भेंट में , खंडित हुई आस्थाओं की
नये सिरे से अपने मन में प्रतिमा एक बनाते तो हैं

सोचता मै रहा पत्र तुमको लिखूँ

सोचता मै रहा पत्र तुमको लिखूँ
और लिख दूँ कि तुम हो बसे सांस में
हो चकोरी जिसे मन सजाता रहा
तुम बसे पूनमी उस मधुर आस में


गंध ने तितलियों के परों पर लिखी
बात मन की मेरे चित्र में खींचकर
एक बादल कली को बता कर गया
क्यारियों की गली में उसे सींच कर
दूब पर ओस की बून्द से लिख लिया
रश्मियों ने जिसे मुस्कुराते हुए
बात वह, मलयजी इक झकोरा हुआ
प्रीत के रंग में गुनगुनाते हुए


पत्र में फिर लिखूँ बात मैं इक वही
जो दिवस लिख रहा नित्य आकाश में


ये लिखूँ मैं, तुम्हारी है जादूगरी
जो मेरे तन पे, मन पे है छायी हुये
शब्द होठों पे मेरे संवरते वही
गीत में तुमने जो गुनगुनाये हुये
चित्र बन तुम दिवस साथ मेरे रहे
स्वप्न बन कर रहे तुम मेरी नींद के
नैन में तुम बसे चन्द्रमा की तरह
चौदहवीं रात के, दूज के, ईद के


सोचता हूँ लिखूँ दूर जो तुम वही
और तुम ही मेरे आस में पास में


जानता तुम कहोगे विदित है तुम्हें
एक तुम हो मेरी मंगला आरती
एक तुम भावनाओं की भागीरथी
हो प्रवाहित चरण जिसके प्रक्षालती
और तुम मेरे विश्वास का नीर हो
है भरी जिससे मेरी सदा आंजुरी
और तुम ही वही रंग की पूर्णता
जिससे है अल्पना ज़िन्दगी की पुरी


एक तुम हो मेरी बांसुरी की धुनें
और हो नॄत्य तुम मेरे हर रास में

बस इतना विश्वास बहुत है

तम की सत्ता से लड़ने को, हाथों में मशाल हो न हो
एक दीप है साथ हमारे बस इतना विश्वास बहुत है


अंधियारे ने किये हुए हैं घड़ियों से कितने गठबन्धन
आंखों की क्यारी में बोये हों ला लाकर कितने क्रन्दन
उलझ्हा दी हों गांठें रचकर सपनों के कोमल धागों में
सुलगा हुआ ह्रदय महका है, लेकिन फिर भी बन के चंदन


साथ हमारा दे या न दे, लम्बी एक उमर की डोरी
आशा के हिमगिरि रचने को एक अकेली सांस बहुत है


करने भ्रमित बनाये हो पथ, पग पग पर अनगिन चौराहे
पत्थर सभी मील के पी लें, पथचिन्हों के अक्षर चाहे
व्यूहों में घिर कर रुकते हैं लेकिन कहाँ हवा के झोंके
सब अवरोध छिन्न हो जाते पल में बने रुई के फ़ाहे


धाराओं के हर प्रवाह पर बाँध बने हों चाहे जितने
सावन नया बुला लाने को बस अधरों की प्यास बहुत है


बिखरे हों ठोकर खा खा कर कितने ही अक्षत हाथों के
पंखुड़ियों से बिखराये हों, सपने पूनम की रातों के
फिर भी बीज सॄजन के बोने का निश्चय तो अटल रहा है
जुड़ते आये विश्वासों से नित नूतन बंधन नातों के


छंद भेद के नियम भले ही कितने भी प्रपंच रच डालें
नई व्याकरण रच देने को केवल इक अनुप्रास बहुत है

अंकुरित कोई अब मुस्कान कभी हो पाये

परिणति, जलते हुए तवे पर गिरी हुई पानी की बूँदे
मन की आशा जब यथार्थ की धरती से आकर टकराये


अपने टूटे सपनों की अर्थी अपने कांधे पर ढोते
एकाकीपन के श्मशानों तक रोजाना ले जाते हैं
चुनते रहते हैं पंखुरियां मुरझा गिरे हुए फूलों की
जो डाली पर अंगड़ाई लेने से पहले झर जाते हैं

पथ की धूल निगल जाती है पदचिह्नों के अवशेषों को
सशोपंज में यायावर है, दिशाज्ञान अब कैसे पाये

सजी नहीं है पाथेयों की गठरी कब्से उगी भोर में
संध्या ने दर्वाजा खोला नहीं नीड़ जो कोई बनता
संकल्पों को लगीं ठोकरें देती नहीं दिलासा कोई
उमड़े हुए सिन्धु में बाकी नहीं कहीं पर कोई तिनका

बिखर गये मस्तूल, लहर ने हथिया लीं पतवारें सारी
टूटी हुई नाव सागर में, कब तक और थपेड़े खाये

शूल बीनते छिली हथेली में कोई भी रेख न बाकी
किस्मत के चौघड़िये मे से धुल बह गये लिखे सब अक्षर
बदल गई नक्षत्रों की गति, तारे सभी धुंध में लिपटे
सूरज निकला नहीं दुबारा गया सांझ जो अपने घर पर

अधरों के स्वर सोख लिये हैं विद्रोही शब्दों ने सारे
सन्नाटे की सरगम लेकर गीत कोई कैसे गा पाये

सपने अभ्यागत बनकर अब आते नहीं नयन के द्वारे
खामोशी का पर्वत बनकर बाधा खड़ा हुआ आंगन में
अभिलाषा का पथ बुहारते क्षत विक्षत होती हैं साधें
मन मरुथल है, बादल कोई उमड़ नहीं पाता सावन में

पतझर बन कर राज कुंवर, सता ले बैठा सिंहासन पर
संभव नहीं अंकुरित कोई अब मुस्कान कभी हो पाये

हो मीत तुम्हारा ही चौबारा

जब जब भी बहार का झोंका गुजरा उपवन की गलियों से
चूम कपोलों को कलियों के लिख कर जाता नाम तुम्हारा


शाखों पर कोमल पत्तों ने लेकर बासन्ती अँगड़ाई
जब जब अपनी पलकें खोलीं, तब तब स्वप्न हवा में बिखरे
और उमड़ती हुई गंध की एक टोकरी जब छितराई
तब तब धारे बही हवा के, डूब रंग में हुए सुनहरे


अलसाये पल भी उस पल में ऐसे ही प्रतीत होते हैं
जैसे ढली दुपहरी में हो मीत तुम्हारा ही चौबारा


नदिया की धारा से बतियाती हैं जब बरखा की बूंदें
या पनघट पर कलसी बोले कुछ चूड़ी वाले हाथों से
सप्त-स्रोत से संचित होकर अभिमंत्रित होता कहता है
अभिषेकों के पल में जो, जल चढ़ता प्रतिमा के माथों पे


उनके सब शब्दों में सुर में जो कुछ मिला समाहित होकर
उसे प्रीत डूबे अधरों ने ही तो है हर बार उचारा


पवन पालकी में बिठला कर विदा गंध को करता है जब
फूल नहीं कुछ भी कह पाता अधर थरथरा रह जाते हैं
विचलित हो पराग के कण भी जब चल देते पीछे पीछे
उस पल तितली भंवरे आकर जो कुछ उनको समझाते हैं


वे सब कही अनकही बातें और अवर्णित पल हैं जितने
इतिहासों की गाथाओं की उन पर छाप लगी दोबारा


यादों की बारिश में भीगे या सुधियों की धूप सेंकते
मन के आवारा पल आंखों में कुछ चित्र खींच देते हैं
एक विभोरित अनुभूति की चंचल सी अंगड़ाई के पल
दिवास्वप्न की उगती प्यासों को दे नीर सींच देते हैं


अपने हुए एक मुट्ठी भर उन निमिषों की संचित थाती
रहती है अंगनाई में बन, निर्देशन का एक सितारा

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...