बिना तुम्हारे साथ न देते

शब्द नहीं ढलते गीतों में स्वर ने भी विद्रोह किया है
बिना तुम्हारे साथ नयन का देते नहीं स्वप्न रातों में

मेंहदी महावर काजल कुंकुम सब की ही हैं क्वारी साधें
चूड़ी कंगन तगड़ी पायल बिछुवा रह रह अश्रु बहाते
कानों की लटकन रह रह कर प्रश्न पूछती है नथनी से
देखा कोई मेघदूत क्या टीके ने सन्देसा लाते

बाजूबन्द मौन बैठे हैं जैसे किसी बात के दोषी
करते रहते निमिष याद वे, जब सज रहते थे हाथों में

रंगत हुई तीज की पीली, सावन के झूले उदास हैं
गौरी मन्दिर की पगडंडी पग की ध्वनि सुनने की आतुर
रजनी गंधा नहीं महकती एकाकी होकर उपवन में
और बिलख कर रह जाता है कालिन्दी तट वंशी का सुर

पल पल पर उद्विग्न ह्रदय की बढ़ती जाती है अधीरता
अर्थ नहीं कुछ शेष बचा है आश्वासन वाली बातों में

देहरी याद करे अक्षत से जब की थी अभिषेक पगतली
अँगनाई है स्पर्श संजोये उंगलियों का रांगोली में
दीप दिवाली के नजरों में साध लिये हैं सिर्फ़ तुम्हारी
और विलग हो तुमसे सारे रंग हुए फ़ीके होली में

सम्बन्धों के वटवृक्षों पर उग आती हैं अमर लतायें
और तुम्हारे बिन मन जुड़ता नहीं तनिक रिश्तों नातों में

शून्य पार्श्व में देख स्वयं ही मुरझा मुरझा रह जाती है
यज्ञ वेदियों की लपटों की वामांगी आहुति की आशा
पृष्ठ खोलती नहीं ॠचायें, पूर्ण नहीं हो पाती स्वाहा
और बदलने लग जाती है मंत्रों की मानक परिभाषा

प्रश्न चिन्ह बन गैं तुम्हारे बिन अब वे सारी सौगंधें
बुनी गईं थीं एक साथ जो चले कदम अपने सातों में

आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा

बढ़ गई सहसा हवा के नूपुरों की झनझनाहट
और गहरी हो गई कुछ पत्तियों की सरसराहट
दूब के कालीन के बूटे जरा कुछ और निखरे
और कलियों में हुई अनजान सी कुछ सुगबुगाहट

बात यह मुंडेर पर आ एक पंछी ने कहा है
आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा

गंध भेजी है गुलाबों ने बिछे जाये डगर पर
इन्द्रधनुषी हो रहीं देहलीज पर आ अल्पनायें
केसरी परिधान वन्दनवार बन कर सज गये हैं
आरती का थाल ले द्वारे खड़ी हैं कल्पनायें

फ़ुनगियों ने रख हथेली छाँह को, पथ को निहारा
आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा

ले रहीं अँगड़ाइयां अनजान सी मन में उमंगें
आस में डूबी फ़ड़कने लग गईं दोनों भुजायें
दॄष्टि आतुर, अर्घ्य ले जैसे खड़ी कोई सुहागन
बाट जोहे चौथ चन्दा की उभर आयें विभायें

दिन ढले से पूर्व ही आया उतर पहला सितारा
आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा

लग गई जैसे अजन्ता कक्ष में आकर संवरने
खिड़कियों बुनने लगी हैं धूप के रंगीन धागे
सज रहीं अंगनाई में कचनार की कलियां सुकोमल
जो निमिष भर को गये थे सो, सभी वे भाव जागे

धार ने मंदाकिनी की, पंथ को आकर पखारा
आ रहा है डाकिया सन्देस इक लेकर तुम्हारा

ज़िन्दगी के राजपथ पर लिख चुका हूँ

शब्द मैं चुन ला रहा अनुभूतियों की क्यारियों से
तुम इन्हें दो कंठ अपना और धुन में गुनगुनाओ

ज़िन्दगी के राजपथ पर तो लिखे हैं गीत अनगिन
आज मैं बिसरी हुई पगडंडियों पर लिख रहा हूं
जो धरोहर मान अपनी दर्पणों ने रख लिये थे
मैं उन्हीं धुंधले अधूरे बिम्ब जैसा दिख रहा हूँ
केतकी का रूप जो खिलता रहा वीरानियों में
आंजता हूँ मैं उसे लाकर नयन के आंगनों में
खींचता हूँ चित्र मैं अब वे क्षितिज के कैनवस पर
रात की स्याही निगल बैठी जिन्हें थी सावनों में

और ये छू लें अगर मन का कोई कोना तुम्हारा
तो मेरी आवाज़ में तुम आज अपना स्वर मिलाओ


दे रहा आवाज़ मैं उन स्वेद के खोये कणों को
स्याहियां बन कर हलों की खेत पर जो खत लिखे थे
शीश पर पगड़ी बना कर जेठ का सूरज रखा था
सावनी धारायें बन कर देह से फ़िसले गिरे थे
जो किये प्रतिमाओं को जीवन्त थे अपने परस से
बालियों को रंग दे धानी हरे पीले सुनहरे
और छूकर नीम की शीतल घनेरी छांह का जल
झिलमिलाते थे रजत कण बन सभी होकर रुपहरे

चिन्ह उनका कोई भी दिखता नहीं है इस नगर में
तुम बताना राह में चलते अगर पहचान पाऒ

बढ़ रही रफ़्तार, आपाधापियां, शंकायें मन में
छूटता विश्वास का हर छोर रह रह उंगलियों से
डर रहा परछाईं से भी आज हर अस्तित्व लगता
चोंकता है जो हवा की थाप पड़ती खिड़कियों पे
चाह तो है द्वार को आकर सजायें चन्द्रकिरणें
किन्तु आतीं तो तनिक विश्वास हो पाता नहीं है
मन मयूरा था प्रतीक्षित सावनी बादल घिरें आ
और घिरते तो कोई भी गीत गा पाता नहीं है

आऒ मेरे साथ मिल तुम चीर दो संशय घिरे जो
और बन क्र दीप उज्ज्वल रोशनी से जगमगाओ

और तुम्हारा एक तकाजा



बुझे बुझे सरगम के सुर हैं
थके थके सारे नूपुर हैं
शब्दों का पिट गया दिवाला
कलम वगावय को आतुर है
भावों की लुट हई पोटली अनुभूति के कोष रिक्त हैं
और तकाजा एक तुम्हारा मैं इक नया गीत लिख डालूँ

अक्षर अक्षर बिखर गई हैं गाथाय्रं कुछ याद नहीं हैं
शीरीं तो हैं बहुत एक भी लेकिन पर फ़रहाद नहीं है
बाजीराव नहीं मिल पाया थकी ढूँढते है मस्तानी
इतिहासों की प्रेम कथायें किसने समझी किसने जानी

राजमुकुट के प्रत्याशी तो खडे हुए हैं पंक्ति बनाकर
तुम्ही बताओ सिंहासन पर मैं इनमें से किसे बिठा लूँ

महके हुए फूल उपवन से रह रह कर आवाज़ लगाते
मल्हारों के रथ पनघट पर रूक जायेंगे आते जाते
फागुन के बासन्ती रंग में छुपी हुईं पतझडी हवायें
बार बार अपनी ही धुन में एक पुरानी कथा सुनायें

माना है अनजान डगरिया, लेकिन दिशाचिन्ह अनगिनती
असमंजस में पडा हुआ हूँ, किसको छोडूँ किसे उठा लूँ

अलगोजे तो नहीं छेड़ता गूँज रहा कोई बाऊल स्वर
रह जाता घुल कर सितार में सरगम के स्रोतों का निर्झर
लग जाते हैं अब शब्दों पर पहरे नये, व्याकरण वाले
छन्द संवरता तो होठों पर ढलता नहीं सुरों में ढाले

गज़ल नज़्म मुक्तक रुबाईयां, सब ही मुझसे संबोधित हैं
तुम बोलो इनमें से किसको अभिव्यक्ति का सिला बना लूँ
और तुम्हारा एक तकाजा, मैं इक और गीत रच डालूँ

कितना उसे ओस ने धोया

पता नहीं क्यों आज रोशनी छुप कर रही गगन के पीछे
पता नहीं क्यों चन्दा सूरज बैठे रहे पलक को मींचे
पता नहीं क्यों आज नीर की गगरी छलकी नहीं घटा की
पता नहीं क्यों रश्मि भोर की, उषा रही मुट्ठी में भींचे

सोच रहा था जब मैं ये सब, बता गया यह एक झकोरा
क्योंकि न तुमने पलकें खोलीं अपनी, रहा जगत भी सोया

ढका रहे जब ज्योतिपुंज तो कैसे छिटक सकेंगी किरणें
हो न प्रवाहित निर्झर, कैसे उमड़ेंगी नदिया में लहरें
कली न आंखें खोले अपनी तो कैसे सुगन्ध बिखरेगी
झरे नहीं नयनों से पूनम , कैसे चन्द्र विभा संवरेगी

ढांप लिया जब जगमग आनन, मावस की सी चिकुर राशि ने
तब ही तो नभ की पगडंडी पर चलता सूरज रथ खोया

उमड़ी नहीं घटा पश्चिम की क्योंकि न तुमने ली अंगड़ाई
बिखरा नहीं अलक्तक पग से, संध्या हो न सकी अरुणाई
बन्द रही काजल की कोरों में हो कैद रात की रानी
बंधी रही आंचल से पुरबा कर न सकी अपनी मनमानी

पा न सका था स्पर्श स्वरों का , तो गुलाब अधरों का कोमल
रहा तनिक मुरझाया सा ही, कितना उसे ओस ने धोया

छनकी नहीं पांव की पायल,सुर सितार के संवर न पाये
खनका कंगन नहीं, कोयलें चुप ही रहीं गीत न गाये
हिना न झांकी मुट्ठी में से, तो अमराई नहीं बौराई
शब्दों का विन्यास चला घुटनों पर, आई नहीं तरुणाई

हुआ अंकुरित नहीं एक भी गीत ह्रदय की फुलवारी में
बिना तुमहारे दॄष्टिपात के,अक्षर अक्षर कितना बोया

गीत भी हँस पड़े

भाव अभिव्यक्त हों इसलिये शब्द की उंगलियां थाम कर देखिये चल पड़े
सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े

प्रार्थना में जुड़े हाथ की उंगलियां पोर पर आरती को सजाती रहीं
वर्तिका की थिरकती हुई ज्योति पर पांव अनुभूतियां थीं टिकाये रहीं
शंख फिर गूँज कर पात्र में ढल गये और प्रक्षाल करने लगे मूर्त्ति का
घंटियों का निमंत्रन बुलाता रहा, मंत्र उठता हुआ वारिधि क्षीर का

शिल्प ने थाम लीं हाथ में छैनियाँ, ताकि वह शिल्प अपना स्वयं ही गढ़े
सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े

प्रीत के शब्द को पांखुरी पर लिखे मुस्कुराती रही अधखिली इक कली
गंध की डोर पकड़े हुए वावरा एक भंवरा भटकता रहा था गली
क्यारियों में उगीं चाहतों की नई कोंपलें, पर जरा कुनमुनाती हुई
बाड़ बन कर छिपी झाड़ियों में हिना आप ही हाथ अपने रचाती हुई

कर रही थी भ्रमण वाटिका में हवा, भाल उसके अचानक कई सल पड़े
सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े

दॄष्टि के पाटलों पर लगी छेड़ने एक झंकार को स्वप्न की पैंजनी
याद के नूपुरों से लिपटती रही छाँह पीपल की हो कर जरा गुनगुनी
स्नेह की बून्द से सिक्त हो भावना नाम अपने नय रख संवरने लगी
और शैथिल्य के आवरण की जकड़ बन्धनों को स्वयं मुक्त करने लगी

कुमकुमे फूट कर श्याम सी चादरेऒं पर नये रंग होकर अचानक चढ़े
सरगमों की कलाई पकड़ कंठ ने ली जो अँगड़ाई तो गीत भी हँस पड़े

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...