मन का कब ईतिहास पढोगे

अनुत्तरित यह प्रश्न अभी तक कब बोलो तुम उत्तर दोगे
तन का तो भूगोल पढ़ लिया, मन का कब ईतिहास पढोगे 

युग बीते पर पाठ्यक्रमों में किया नही परिवर्तन 
​तू
मने
बने हुए हो बस अतीत के पृष्ठों में होकर के बन्दी
मौसम बदले, ऋतुयें बदली, देशकाल की सीमाएं भी
किन्तु तुम्हारी अंगनाई 
​की बदली नहीं घिरी 
 नौचंदी

बिख्री
​ हुइ मान्यताओ के अन्धकूप मे डूबे  हो तुम 
बोलो नई  सुबह की अपने मन मे कब उजियास भरोगे ​

सिमटा रहा तुम्हारा दर्शन सिर्फ मेनका उर्वशियो में
लोपी, गार्गी, मैत्रेयी को कितना तुमने समझा जाना
दुष्यंती स्मृतियां सहेज कर, कच से रहे अर्थसाधक तुम
यशोधरा का और उर्मिला का क्या त्याग कभी पहचाना

अनदेख करते आये हो बिम्ब समय के दर्पण वाला
कटु यथार्थ की सच्चाई पर, बोलो कब विश्वास करोगे
 
एकाकी जीवन की राहें होती है अतुकांत काव्य सी
मन से मन के संबंधों की लय सरगम बन  कर सजती है 
सहचर बनने को कर देता जब कोई जीवन को अर्पित
पल पल पर सारंगी तब ही साँसों की धुन में बजती है 

जीवन का अध्याय तुम्हारा अर्थ, विषय से रहित गद्य सा
इसको करके छंदबद्ध कब अलंकार अनुप्रास जड़ोगे 

 

Comments

Praveen Pandey said…
नित नया सृजन,
जीवन और मन।

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