तुम कहो तो


तुम कहो तो  होठ पर जड़ दूं तुम्हारे एक चुम्बन
दृष्टि में भर कर सुधाये प्रीत की तुमको पिला दूं
मनचली पुरबाईयों
​ ​
 की चुनरी पर नाम लिख कर
इक
​ ​
तुम्हारा, तुम कहो तो गंध की सरगम बजा दूं
तुम कहो तो
 
सोचता हूँ मैं क्षितिज पर ले हथैली की हिनाएँ
तुम कहो तो खींच दूं कुछ आज नूतन अल्पनायें
और लेकर तारकों की गोद में पलते सपन को
कूचियों से मैं उकेरूं कुछ अकल्पित कल्पनाये
तुम कहो तो 

पाँव में रंग दूं अलक्तक भोर की अरुणाईयों
​ ​
 का
राग भर दूं श्वास में ला, गूंजती शहनाइयों का
धार की मंथर गति को जोड़ दूं पगचाप से मैं
और फिर उल्लास भर दूं बौरती अमराइयों का
तुम कहो तो

मांग में कचनार की कुछ अधखिली कलियाँ सजाऊँ
मोतिया बन कर तुम्हारी वेंणियो में झूल जाऊं
 चूम लूँ कोमल हथेली बन हिना का एक बूटा
और फिर भुजपाश में लेकर तुम्हें कविता सुनाऊं
तुम कहो तो 

Comments

Udan Tashtari said…
रंगीन ....मौसम का तकाजा है भाइ जी ..

.

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