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Showing posts from April, 2017

वक्त की रेत पर जो इबारत लिखी

ज़िन्दगी के बिछे इस बियावान में
फूल इक आस का खिल सकेगा नहीं
वक्त की रेत पर जो इबारत लिखी
नाम उसमें मेरा मिल सकेगा नहीं
उम्र की राह को आके झुलसा गई
कंपकंपाती किरण आस्था दीप की
याद की पोटली साथ में थी रही
एक मोती लुटा रह गये सीप सी
जैसे पतझर हुआ  रात दिन का सफ़र
फूल अरमान के सारे मुरझा गए
और विश्रांति के नीड सब सामने
बन करीलों की परछाइयाँ आ गये
जो भी मैंने चुने पत्र या पुष्प थे
उनमें अंतर कोई मिल सकेगा नहीं
मन की अँगनाई में गहरे पसरा हुआ
शून्य था जोकि अंतर में पलता रहा
दम्भ के झूठ,छलनाओं के व्यूह में
फंस गया कारवाँ, किन्तु चलता रहा
मूल्य जर्जर हुए जो थे नैतिक कभी
पंथ में सिर्फ विध्वंस होते रहे
गम पिए मैंने भर आंजुरि में, किया
उनका आभार, जो दंश देते रहे
मुस्कुराहट की नौकाएं  डूबी कहाँ
दर्द फेनिल। पता दे सकेगा नहीं
हो तरल बह गई सब पिघलते हुये
पास की रात जो थी सितारों भरी
सोख कर ले गई नींद जलती हुई
नैन के गेह से स्वप्न की कांवरी
घूँट दो चांदनी के मिले व्योम से
उनको पीते हुए धैर्य रखता रहा
टूटे मस्तूल गलते हुए काठ की
नाव लहरों के विपरीत खेता  रहा
चक्रवाती हुई घिरती झंझाये अब
देर ज्यादा दिया जल सकेगा नहीं

वीथियों में उम्र की हूँ

मैं गिरा जब जब गिरा हूँ एक निर्झर की तरह
​मैं   बिखर कर हो गया हूँ एक सागर की व्ज़ह है मेरा विस्तार नभ की नीलिमा के पार भी  मैं किनारा हूँ समय का और हूँ मंझधार भी
मैं प्रणय की भावना के आदि का उद्गम रहा हूँ और मै ही वीथियों में उम्र की हूँ एक सहचर
मैं ही हूँ असमंजसों के चक्र काजो तोड़, निर्णय हर घिरे तम  ​को   रहा हूँ सूर्य का मै एक परिचय मैं अनुष्ठुत हो रहे संकल्प की आंजुर रहा हूँ और मै नि ​श्चय   सदा भागीरथी बन कर बहा हूँ
मै कलम जो उद्यमों की स्याहियों मे डूब कर के भाग्य की रेखाओं को लिखता रहा फिर से  ​बदल   कर 
भावनाओ को सहज अभिव्यक्तियाँ दे शब्द हूँ मैं और शब्दों के परे जो है निहित वह अर्थ हूँ मैं जो निरंतरता बनाये रख रहा सिद्धांत मैं ही मैं ही अनुशासित नियोजन और हूँ उद्भ्रांत मैं ही
मैं भ्रमित अवधारणाओं में दिशाओं  का समन्वय चीर कर सारे कुहासे लक्ष्य बन आता निखर कर
​जो कि गीतायन रहा है गीत में, बस मैं वही हूँ  पृष्ठ पर बीते संजय के जो हुई अंकित, सही हूँ  आदि से पहले,क्षितिज  के बाद तक बस एक मैं हूँ जो रहा निश्शेष फिरभी  रह गया जो शेष मैं हूँ  ​
मैं तुम्हारे और अपने वास्ते बस आइना हूँ  पारदर्शी, जो उजागर …

गीत को जीवन ​दिया  मैंने

जड़ दिया अतुकांत को  
जब ​ ​ ​  छंद में  मैंने
तब मधूर ​इ​ क गीत ​ को  जीवन ​दिया   मैंने
मैं प्रणय की वीथियों में भावना बन कर बहा हर ​सुलगते   ज्वार को अनुभूत मैं करत रहा रूप तब इक अन्तरे ​को दे दिया ​ मैंने 
कर ​दिए   पर्याय ​ ​ के ​ ​ पर्याय ​ अन्वेषित  शांत मन के भाव को कर खूब उद्देलित ​शब्द को  सरगम पिरोकर रख ​  दिया मैंने
था तरंगित अश्रुओं की धार में खोकर पीर के सज्जल क्षणों में अर्थ कुछ बोकर दर्द का ​श्रृंगार   नूतन कर दिया.मैने

टूटते हर पल बिखरते

टूटते हर पल बिखरते स्वप्न  संवरे नयन मे जो
ये नियति ने तय किया है जिंदगी की इस डगर पर
हर संवरती भोर में अंगड़ाइयां ली चाहतो ने सांझ तक चलते हुए दिन ने उन्हें पल पल निखारा आस की महकी हहु पुरबाई की उंगली पकड़ कर रात ने काजल बना कर आँख में उनको संवारा  ईजिलों की पकड़ ढीली पर नजर के कैनवस पर चित्र जितने भी उकेरे रंग रह जाते बिखर कर
 टूटते हर पल बिखरते जो जुड़े सम्बन्ध अपने कर्जदारों के किये हर वायदे की उम्र जैसे याकि पतझड़ के कथानाक पर लिखी लंबी कहानी में किसी खिलती कली की पाँखुरी का ज़िक्र जैसे
मौसमों की संधिरेखा पर मिले जो मोड़ आकर वे खिंची परछाइयों को देखते लौटे पलट कर
टूटते हर पल बिखरते शाख से कैलेंडरों की पत्र जर्जर हो दिवस के रात की पगडंडियों पर   और पग ध्वनियाँ कहारों की उषा की पालकी के पात्र कर रखती रही विध्वंस की नौचंदियों पर
सीखदी ​ इतिहास ​  ​  ने फिर से संभल के ​ ​ अग्रसर हो हर कदम पर पाँव लेकिन रह गया पथ में ​ फ़िसल कर​