भाव दरवेश बन आये चौपाल पर

नाम जिसपे लिखा हो मेरा, आज भी
डाकिया कोई सन्देश लाया नहीं
गीत रचता रहा मैं तुम्हारे लिए
एक भी तुमने पर गुनगुनाया नहीं

रोज ही धूप की रश्मियां, स्वर्ण से
कामना चित्र में रंग भरती रही
आस की कोंपले मन के उद्यान में
गंध में भीग कर थी संवरती रही
एक आकांक्षा की प्रतीक्षा घनी
काजरी कर रही थी निरंतर नयन
दृष्टि के फूल थे पंथ के मोड़ पर
गूंथते ही रहे गुच्छ अपना सघन



भग्न ही रह गया मन का मंदिर मगर
आरती स्वर किसी ने सुनाया नहीं

गीत के गाँव में सा्री पगडंडियां
नाम बस एक ही ओढ़ कर थी खड़ी
एक ही बिम्ब को​ मौसमों ने करी
ला समर्पित भरी पुष्प की आंजुरी
भाव दरवेश बन आये चौपाल पर
एक ही थी कहानी सजाये अधर
पनघटों पर छलकती हुई गागरें
बाट जोहें छुए एक ही बस कमर



रह गई शेष निष्ठाएं भागीरथी
जाह्नवी का पता चल न पाया कही

छोर पर थी खड़ी आके अंगनाई के
दीप बन कर प्रतीक्षाएँ जलती रही
पगताली की छुअन की अपेक्षा लिए
सूनी पगडंडियां हाथ मलती रही
भोर के पाखियों की न आवाज़ थी
आसमा की खुली खिड़कियाँ रह गई
मानचित्रों से अब है पर ये दिशा
एक बदली भटकती हुई कह गई

शब्द सारे प्रतीक्षा लिए रह गए
 गीत ने पंक्तियों में लगाया नहीं

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