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Showing posts from January, 2017

शिवम् सुन्द​रम ​ गाती है

कभी एक चिंगारी बन कर विद्रोहों की अगन जगातीबन कर कभी मशाल समूचे वन उपवन केओ धधकाती है सोये  ​चेतन ​  को शब्दो  ​की  दस्तक देकर रही उठाती कलम हाथ में जब भी आती शिवम् सुन्द ​रम  ​ गाती है 
विलग उँगलियों के  ​स्पर्शों   ने विलग नए आयाम निखारे हल्दीघाटी और उर्वशी, प्रिय प्रवास ​ ​ गीतम गोविन्दम रामचरितमानस  ​सु खसागर, ऋतु संहार से ​ मेघदूत तक ​ चरित सुदामा ओ  ​साकेतम  वेदव्यास का अभिन ​ विवेचन 
एक और यह कलम सुनाती गाथा पूर्ण महाभारत की  और दूसरी और संदेसे गीता बन कर लाती है
बन जाती है कभी तमन्ना सरफ़रोश की  आ अधरों पर करती ​ है आव्हान कभी यह  रंग ​ दे कोई बसंती चोला कभी  ​मांगती है आहुतियां जीवन के  के अनवर ​त ​  होम में कभी  अनछुए आयामों को सन्मुख लाकर इसने खोला
मासि की अंगड़ाई ज्वालायें भर देती है रोम रोम में बलिदानों के दीप मंगली,  संध्या भोर जलाती है
व्विद्यापति के छू भावो को करती है श्रृंगार रूप का कालिदास के संदेशे को ले जाती है मेघदूत बन अधर छुए जयदेव के तनिक और गीत गोविन्द कर दिए निशा निमंत्रण मधुशाला बन इठलाई जब छूते बच्चन
दिनकर के आ निकट सिखाई रूप प्रेम की परिभाषाये और दूसरी करवट लेकर यह हुंकार जगाती…

और इक बरस बीता

और इक बरस बीता

करते हुए प्रतीक्षा अब की बार जतन कर बोये जितने वे अंकुर फूटेंगे अंधियारे जो मारे हुए कुंडली बन मेहमान रुके है संभवतः रूठेंगे आश्वासन की कटी पतंगों की डोरी में उलझे  अच्छे दिन आ जाएंगे नऐ भोर के नए उजाले नव सूरज की किरणें लेकर तन मन चमकाएंगे अँधियारा पर जीता
नयनो की अंगनाई सूनी रही क्षितिज की देहरी पर ही अटके सारे सपने लगे योजनाओ के विस्तृत मीलो तक बिखरे पैमाने बालिश्तों से नपने  ​ति​ हासो के पृष्ठ झाड़ कर जमी धूल की परते फिर से आगे आये और नए की अगवानी में घिसे पिटे से​ ​ ​चंद गीत फिर से दुहराये
 रही प्रतीक्षित सीता

आशाओ के इंद्रधनुष की रही प्रतीक्षा, कोई आकार प्रत्यंचा को ताने आवाहन के मंत्रो का उच्चार करे फिर तीर कोई संधाने सहज साध्य में हर असाध्य को एक परस से निज परिवर्तित कर दे ​पर्वत सी हर इक बाधा को बिन प्रयास ही धराशायी जो कर दे
रही अनकही गीता

वर्ष नया मंगलमय कहने

जाते हुए वर्ष की संध्या
भेज रही है स्नेह निमंत्रण
आओ अंगनाई में सूरज
वर्ष नया मंगलमय कहने

कितनी रिसी तिमिर की गठरी
बारह मासों के गतिक्रम में
कितनी थी उपलब्ध हताशा
जीवन के अनथक उद्यम में
आँखों की देहरी से कितने
सपने टूट टूट कर बिखरे
और अपेक्षा के कितने पल
घिरे उपेक्षाओं में गुजरे

विदित तुम्हे है सब कुछ ही तो
छुपी नहीं है स्थिति कोई भी
किरणों की कैंची ले आओ
लगें कुहासे सारे छंटने

बीते बरस अभी तक इतने
एक कामना को दुहराते
और बिखरती आशाओं की
छितरी किरचें बीन उठाते
पृष्ठभूमि में छिपे घटा की
जितने भी है रंग धनक के
पतन अवनिकाओ का कर दो
उभरे कल के चित्र चमक के

सपने निकल आँख के बाहर
मिले वास्तविकता से आकर
और सामने आये सवेरे
इतिहासों में वर्णित जितने

बुला रही है ​ स्नेह   अल्पना
दहलीजों पर से अकुलाकर
नव उदियाती हुई किरण की
अगवानी में दीप जलाकर
रथ वल्गा को बना कूचियां
रंग नए दो बरस गगन को
ज्योति सुधा की वर्षा करके
शांत करो अब तिमिर तपन को

नए पृष्ठ पर नया कथानक
लिख दो, चुन लो पात्र नए ही
निर्देशक बन कर आओ तुम
नया बरस यह मंचित करने