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Showing posts from 2017

वक्त की रेत पर जो इबारत लिखी

ज़िन्दगी के बिछे इस बियावान में
फूल इक आस का खिल सकेगा नहीं
वक्त की रेत पर जो इबारत लिखी
नाम उसमें मेरा मिल सकेगा नहीं
उम्र की राह को आके झुलसा गई
कंपकंपाती किरण आस्था दीप की
याद की पोटली साथ में थी रही
एक मोती लुटा रह गये सीप सी
जैसे पतझर हुआ  रात दिन का सफ़र
फूल अरमान के सारे मुरझा गए
और विश्रांति के नीड सब सामने
बन करीलों की परछाइयाँ आ गये
जो भी मैंने चुने पत्र या पुष्प थे
उनमें अंतर कोई मिल सकेगा नहीं
मन की अँगनाई में गहरे पसरा हुआ
शून्य था जोकि अंतर में पलता रहा
दम्भ के झूठ,छलनाओं के व्यूह में
फंस गया कारवाँ, किन्तु चलता रहा
मूल्य जर्जर हुए जो थे नैतिक कभी
पंथ में सिर्फ विध्वंस होते रहे
गम पिए मैंने भर आंजुरि में, किया
उनका आभार, जो दंश देते रहे
मुस्कुराहट की नौकाएं  डूबी कहाँ
दर्द फेनिल। पता दे सकेगा नहीं
हो तरल बह गई सब पिघलते हुये
पास की रात जो थी सितारों भरी
सोख कर ले गई नींद जलती हुई
नैन के गेह से स्वप्न की कांवरी
घूँट दो चांदनी के मिले व्योम से
उनको पीते हुए धैर्य रखता रहा
टूटे मस्तूल गलते हुए काठ की
नाव लहरों के विपरीत खेता  रहा
चक्रवाती हुई घिरती झंझाये अब
देर ज्यादा दिया जल सकेगा नहीं

वीथियों में उम्र की हूँ

मैं गिरा जब जब गिरा हूँ एक निर्झर की तरह
​मैं   बिखर कर हो गया हूँ एक सागर की व्ज़ह है मेरा विस्तार नभ की नीलिमा के पार भी  मैं किनारा हूँ समय का और हूँ मंझधार भी
मैं प्रणय की भावना के आदि का उद्गम रहा हूँ और मै ही वीथियों में उम्र की हूँ एक सहचर
मैं ही हूँ असमंजसों के चक्र काजो तोड़, निर्णय हर घिरे तम  ​को   रहा हूँ सूर्य का मै एक परिचय मैं अनुष्ठुत हो रहे संकल्प की आंजुर रहा हूँ और मै नि ​श्चय   सदा भागीरथी बन कर बहा हूँ
मै कलम जो उद्यमों की स्याहियों मे डूब कर के भाग्य की रेखाओं को लिखता रहा फिर से  ​बदल   कर 
भावनाओ को सहज अभिव्यक्तियाँ दे शब्द हूँ मैं और शब्दों के परे जो है निहित वह अर्थ हूँ मैं जो निरंतरता बनाये रख रहा सिद्धांत मैं ही मैं ही अनुशासित नियोजन और हूँ उद्भ्रांत मैं ही
मैं भ्रमित अवधारणाओं में दिशाओं  का समन्वय चीर कर सारे कुहासे लक्ष्य बन आता निखर कर
​जो कि गीतायन रहा है गीत में, बस मैं वही हूँ  पृष्ठ पर बीते संजय के जो हुई अंकित, सही हूँ  आदि से पहले,क्षितिज  के बाद तक बस एक मैं हूँ जो रहा निश्शेष फिरभी  रह गया जो शेष मैं हूँ  ​
मैं तुम्हारे और अपने वास्ते बस आइना हूँ  पारदर्शी, जो उजागर …

गीत को जीवन ​दिया  मैंने

जड़ दिया अतुकांत को  
जब ​ ​ ​  छंद में  मैंने
तब मधूर ​इ​ क गीत ​ को  जीवन ​दिया   मैंने
मैं प्रणय की वीथियों में भावना बन कर बहा हर ​सुलगते   ज्वार को अनुभूत मैं करत रहा रूप तब इक अन्तरे ​को दे दिया ​ मैंने 
कर ​दिए   पर्याय ​ ​ के ​ ​ पर्याय ​ अन्वेषित  शांत मन के भाव को कर खूब उद्देलित ​शब्द को  सरगम पिरोकर रख ​  दिया मैंने
था तरंगित अश्रुओं की धार में खोकर पीर के सज्जल क्षणों में अर्थ कुछ बोकर दर्द का ​श्रृंगार   नूतन कर दिया.मैने

टूटते हर पल बिखरते

टूटते हर पल बिखरते स्वप्न  संवरे नयन मे जो
ये नियति ने तय किया है जिंदगी की इस डगर पर
हर संवरती भोर में अंगड़ाइयां ली चाहतो ने सांझ तक चलते हुए दिन ने उन्हें पल पल निखारा आस की महकी हहु पुरबाई की उंगली पकड़ कर रात ने काजल बना कर आँख में उनको संवारा  ईजिलों की पकड़ ढीली पर नजर के कैनवस पर चित्र जितने भी उकेरे रंग रह जाते बिखर कर
 टूटते हर पल बिखरते जो जुड़े सम्बन्ध अपने कर्जदारों के किये हर वायदे की उम्र जैसे याकि पतझड़ के कथानाक पर लिखी लंबी कहानी में किसी खिलती कली की पाँखुरी का ज़िक्र जैसे
मौसमों की संधिरेखा पर मिले जो मोड़ आकर वे खिंची परछाइयों को देखते लौटे पलट कर
टूटते हर पल बिखरते शाख से कैलेंडरों की पत्र जर्जर हो दिवस के रात की पगडंडियों पर   और पग ध्वनियाँ कहारों की उषा की पालकी के पात्र कर रखती रही विध्वंस की नौचंदियों पर
सीखदी ​ इतिहास ​  ​  ने फिर से संभल के ​ ​ अग्रसर हो हर कदम पर पाँव लेकिन रह गया पथ में ​ फ़िसल कर​

और समय संजीवित होकर

आज हवा की पाती पढ़ कर लगी सुनाने है वे ही पल जिनमें सम्बोधन करने में होंठ लगे अपने कँपने थे शब्द उमड़ कर चले ह्रदय से किन्तु कंठ तक पहुँच न पाये और नयन की झीलों में तिरते रह गये सभी सपने थे अनायास ही वर्तमान पर गिरीं अवनिकायें अतीत की और समय संजीवित होकर फ़िर आया आँखों के आगे बिछे क्षितिज तक अँगनाई की राँगोली के रँग में डूबे अलगनियों पर लटकी चूनर में से जैसे चित्र बिखर कर छाप तर्जनी की जो उनमें कितनी बार हुई थी अंकित उठ कर गिरती हुई दृष्टि की डोरी का इक सिरा पकड़ कर खींच गये सतरंगी चादर निकल तूलिका के कोने से जोड़े थे सायास साथ ने सम्बन्धों के कच्चे धागे पाखुर का पीलापन पूछा करता पुस्तक के पन्नों से बासन्ती स्पर्शों की सीमा कितनी दूर अभी ​ है ​  बाकी    कितनी देर तृषा की बाकी, और माँग में पुरबाई के कब तक टीस भरेगी रह रह बेचारी सुधियों की साकी
दुहराने ​ लग गये स्वयं को शब्द उन्हीं कोरी कसमों के​ करने जिन्हें प्रस्फ़ुटित रह रह स्वर अपने अधरों ने मांगे ‘संगे मरमर की जाली पर बँध कर रंगबिरंगे डोरे सपने कोरे रखे हुये हैं कितने ही गुत्थी में बाँधे चुनते चुनते थकी उंगलियों के पोरों पर टिकी हिनायें आधी तो हो गई अपरिचित,…

ये मेरी आकांक्षायें तय करेंगी

केंद्र पर मैं टिक रहूँ या वृत्त का विस्तार पाऊं
जानता हूँ ये मेरी आकांक्षायें तय करेंगी
ऐतिहासिक परिधियों में सोच की सीमाये बंदी और सपने जो विरासत आँख में आंजे हुये है  दृष्टि केवल संकुचित है देहरी की अल्पना तक साथ है प्रतिमान जो बस एक सुर  साजे हुये है
मैं इसी  ​इ​ क दायरे मेँ बंध रहूँ या तोड़ डालूं ​जा​ नता हूँ कल्पना की स ​म्प​ दाये तय करें ​गी ​ ​आदिवासी रीतियों का अनुसरण करता हुआ मन कूप के मंडूक सी समवेत दुनिया को किये है सांस के धागे पिरोकर एक मुट्ठी धड़कनों को रोज सूरज के सफर के साथ चलता बस जिए है
आसमानों से पर हैं और कितने वृहद अम्बर ये मेरी ही सोच की परिमार्जनाएं तय करेंगी ​
तलघरों में छुप गया झंझाओं से भयभीत हो जो क्या करेगा सामना जब द्वार पर आये प्रभंजन चल नहीं पाये समय के चक्र की गति से कदम तो एक परिणति सामने रहती सदा होता विखंडन
मै समर्पण ओढ़  लूँ, स्वीकार कर लूँ या चुनौती ये मेरी मानी हुई संभावनाये तय करेंगी

इश्क़ के रंग में

मौसमों ने तकाजा किया द्वार आ उठ ये मनहूसियत को रखो ताक पर घुल रही है हवा में अजब सी खुनक तुम भी चढ़ लो चने के जरा झाड़ पर गाओ पंचम में चौताल को घोलकर थाप मारो  जरा जोर से  चंग  में लाल नीला गुलाबी हरा क्या करे आओ रंग दें तुम्हें इश्क  के रंग में
आओ पिचकारियों में उमंगें भरे मस्तियाँ घोल ले हम भरी नांद में द्वेष की होलिका को रखे फूंक कर ताकि अपनत्व आकार छने भांग में वैर की झाड़ियां रख दे चौरास्ते एक डुबकी लगा प्रेम की गैंग में  कत्थई बैंगनी को भुला कर तनिक आओ रंग दें तुम्हे इश्क़ के रंग में
बड़कुले कुछ बनायें नये आज फ़िर, जिनमें सीमायें सारी समाहित रहें धर्म की,जाति की या कि श्रेणी की हों  वे सभी अग्नि की ज्वाल में जा दहें कोई छोटा रहे ना बड़ा हो कोई आज मिल कर चलें साथ सब संग में छोड़ ं पीत, फ़ीरोजिया, सुरमई आओ रंग दें तुम्हें इश्क  के रंग में 
आओ सौहार्द्र के हम बनायें पुये और गुझियों में ला भाईचारा भरें कृत्रिमी  सब कलेवर उठा फ़ेंक दें अपने वातावरण से समन्वय करें जितना उल्लास हो जागे मन से सदा हों मुखौटे घिरे हैरतो दंग में रंग के इन्द्रधनु भी अचंभा करें आओ रंग दें तुम्हें इश्क के रंग में

आओ रंग दें तुम्हरे प्रीत के रंग में

सोच की खिड़कियां हो गई फ़ाल्गुनी सिर्फ़ दिखते गुलालों के बादल उड़े फूल टेसू के कुछ मुस्कुराते हुये पीली सरसों के आकर चिकुर में जड़े गैल बरसाने से नंद के गांव की गा रही है उमंगें पिरो छन्द में पूर्णिमा की किरन प्रिज़्म से छन कहे आओ रँग दें तुम्हें इश्क के रंग में
स्वर्णमय यौवनी ओढ़नी ओढ़ कर धान की ये छरहरी खड़ी बालियाँ पा निमंत्रण नए चेतिया प्रीत के स्नेह बोकर सजाती हुई क्यारियां साग पर जो चने के है बूटे लगे गुनगुनाते  मचलते से सारंग है और सम्बोधनो की डगर से कहे आओ रंग दें तुम्हरे प्रीत के रंग में
 चौक में सिल से बतियाते लोढ़े खनक पिस  रही पोस्त गिरियों की ठंडाइयाँ आंगनों में घिरे स्वर चुहल से भरे देवरों, नन्द भाभी की चिट्कारियान मौसमी इस छुअन से न कोई बचा जम्मू, केरल में, गुजरात में, बंग में कह रही ब्रज में गुंजित हुई बांसुरी आओ रँग दें तुम्हें इश्क के रंग में 
पनघटों पे खनकती हुई पैंजनी उड़्ती खेतों में चूनर बनी है धनक ओढ़ सिन्दूर संध्या लजाती हुई सुरमई रात में भर रही है चमक   मौसमी करवटें, मन के उल्लास अब एक चलता है दूजे के पासंग में भोर से रात तक के प्रहर सब कहें आओ रँग दें तुम्हें इश्क के रंग में

भाव दरवेश बन आये चौपाल पर

नाम जिसपे लिखा हो मेरा, आज भी
डाकिया कोई सन्देश लाया नहीं
गीत रचता रहा मैं तुम्हारे लिए
एक भी तुमने पर गुनगुनाया नहीं
रोज ही धूप की रश्मियां, स्वर्ण से कामना चित्र में रंग भरती रही
आस की कोंपले मन के उद्यान में
गंध में भीग कर थी संवरती रही
एक आकांक्षा की प्रतीक्षा घनी
काजरी कर रही थी निरंतर नयन
दृष्टि के फूल थे पंथ के मोड़ पर
गूंथते ही रहे गुच्छ अपना सघन


भग्न ही रह गया मन का मंदिर मगर
आरती स्वर किसी ने सुनाया नहीं
गीत के गाँव में सा्री पगडंडियां
नाम बस एक ही ओढ़ कर थी खड़ी
एक ही बिम्ब को​ मौसमों ने करी ला समर्पित भरी पुष्प की आंजुरी
भाव दरवेश बन आये चौपाल पर
एक ही थी कहानी सजाये अधर
पनघटों पर छलकती हुई गागरें
बाट जोहें छुए एक ही बस कमर


रह गई शेष निष्ठाएं भागीरथी
जाह्नवी का पता चल न पाया कही
छोर पर थी खड़ी आके अंगनाई के
दीप बन कर प्रतीक्षाएँ जलती रही
पगताली की छुअन की अपेक्षा लिए
सूनी पगडंडियां हाथ मलती रही
भोर के पाखियों की न आवाज़ थी
आसमा की खुली खिड़कियाँ रह गई
मानचित्रों से अब है पर ये दिशा
एक बदली भटकती हुई कह गई
शब्द सारे प्रतीक्षा लिए रह गए  गीत ने पंक्तियों में लगाया नहीं

जीवन के पतझड़ में

जीवन के पतझड़ में जर्जर सूखी दिन की शाखाओं पर
किसने आ मल्हार छेड़ दी औ अलगोजा बजा दिया है
मुड़ी बहारो की काँवरिया मीलो पहले ही  ​इ स पथ से एक एक कर पाँखुर पाँखुर बिखर चुके है फूल समूचे बंजर क्यारी में आ लेता अंकुर कोई नहीं अंगड़ाई और न आता कोई झोंका गंधों का साया भी छू ​ ​ के
​फिर   भी इक अनजान छुअन से धीरे से दस्तक दे कर के  इस  मन के मरुथल को जैसे रस वृंदावन बना दिया है 
सूखी शाखाओं की उंगली छोड़ चुकी है यहां लताएं बस करील की परछाई ही शेष रही है इस उपवन में उग आये हर एक दिशा में  मरुथल के आभास घनेरे एकाकीपन गहराता है पतझड़ आच्छादित जीवन में
फिर भी सुघर मोतियों जैसी उभरी कोमल पदचापों ने गुंजित हो ज्यो कालिंदी तट को आँगन में बुला दिया है
 ढलती हुई सांझ की देहरी पर अब दीप नहीं जलते है  भग्न  हो चुके मंदिर में आ करता नहीं आरती कोई अर्घ्य चढ़ाता कौन जा रहे अस्ताचल की और, सूर्य को  खर्च हो चुका कैलेण्डर कमरे में नहीं टांगता कोई
फिर भी आस कोंपलों ने मुस्काकर जीवन के पतझड़ में जलती हुई दुपहरी को मदमाता सावन बना दिया ​ है

और एक दिन बीता

और एक दिन बीता  कर्मक्षेत्र से नीड तलक बिखरे चिन्हों को चुनते हुए राह में  बिखर रहे सपनों का हर अवशेष उठाते हुए बांह में  संध्या के  तट  पर आ पाया हर घट था रीता  और एक दिन बीता 
एक अधुरी परछाई में सुबह शाम आकार तलाश  करते छिद्रित आशा के प्याले मे दोपहरी के शेष ओसकण भरते  और कोशिशें करते समझाती रहती क्या   गीता  और एक दिन बीता 
थकी हुई परवाजों की गठरी को अपनी जोड़े हुए सुधी से  रहे ताकते पंथ अपेक्षा का जो  लौट होकर पूर्ण  विधी से  और बने उपलब्धि संजोई आशा की परिणीता  और एक दिन बीता

बस उड़ान में विघ्न न डालो

तुमने मुझे पंख सौंपे है और कहा विस्तृत वितान है पंख पसारे मैं आतुर हूँ बस उड़ानमें विघ्न न डालो
पुरबाई जब सहलाती है पंखों की फड़फड़ाहटों को नई चेतना उस पल आकर सहज प्राण में है भर जाती   आतुर होने लगता है मन,नवउड़ान लेने को नभ में सूरज को बन एक चुनौती पर फैलाता है स्म्पाती
मैं तत्पर हूँ फैला अपनेडैनेनापूँ सभी दिशाएँ अगर खिंचीलक्ष्मण रेखाएं एक बार तुम तनिकमिटालो नन्ही गौरेया की क्षमता कब उकाब से कम है होती संकल्पों की ही उड़ान तो नापा करती है वितान को उपक्रम ही तो अनुपातित है परिणामों की संगतियों से

स्वप्न मांगे है नयन ने

चुन सभी अवशेष दिन के
अलगनी पर टांक के स्वप्न मांगे है नयन ने चंद घिरती रात से 
धुप दोपहरी चुरा कर ले गई थी साथ में सांझ  ​थी  प्यासी रही  ​ले   छागला  ​को  हाथ में भोर ने दी रिक्त झोली ​ ​ ​ही   सजा पाथेय की मिल न पाया अर्थ कोई भी सफर  ​की   बात में
चाल हम चलते रहे ले साथ पासे मात के
आंजुरी में स्वाद वाली बूँद न आकर गिरी बादलो के गाँव से ना आस कोई भी झरी बूटियों ने रंग सारे मेंहदियों के पी लिए  रह गई जैसे ठिठक कर हाथ की घड़ियाँ डरी
ओर दिन को तकलियो पर रह गए हम कातते

शिवम् सुन्द​रम ​ गाती है

कभी एक चिंगारी बन कर विद्रोहों की अगन जगातीबन कर कभी मशाल समूचे वन उपवन केओ धधकाती है सोये  ​चेतन ​  को शब्दो  ​की  दस्तक देकर रही उठाती कलम हाथ में जब भी आती शिवम् सुन्द ​रम  ​ गाती है 
विलग उँगलियों के  ​स्पर्शों   ने विलग नए आयाम निखारे हल्दीघाटी और उर्वशी, प्रिय प्रवास ​ ​ गीतम गोविन्दम रामचरितमानस  ​सु खसागर, ऋतु संहार से ​ मेघदूत तक ​ चरित सुदामा ओ  ​साकेतम  वेदव्यास का अभिन ​ विवेचन 
एक और यह कलम सुनाती गाथा पूर्ण महाभारत की  और दूसरी और संदेसे गीता बन कर लाती है
बन जाती है कभी तमन्ना सरफ़रोश की  आ अधरों पर करती ​ है आव्हान कभी यह  रंग ​ दे कोई बसंती चोला कभी  ​मांगती है आहुतियां जीवन के  के अनवर ​त ​  होम में कभी  अनछुए आयामों को सन्मुख लाकर इसने खोला
मासि की अंगड़ाई ज्वालायें भर देती है रोम रोम में बलिदानों के दीप मंगली,  संध्या भोर जलाती है
व्विद्यापति के छू भावो को करती है श्रृंगार रूप का कालिदास के संदेशे को ले जाती है मेघदूत बन अधर छुए जयदेव के तनिक और गीत गोविन्द कर दिए निशा निमंत्रण मधुशाला बन इठलाई जब छूते बच्चन
दिनकर के आ निकट सिखाई रूप प्रेम की परिभाषाये और दूसरी करवट लेकर यह हुंकार जगाती…

और इक बरस बीता

और इक बरस बीता

करते हुए प्रतीक्षा अब की बार जतन कर बोये जितने वे अंकुर फूटेंगे अंधियारे जो मारे हुए कुंडली बन मेहमान रुके है संभवतः रूठेंगे आश्वासन की कटी पतंगों की डोरी में उलझे  अच्छे दिन आ जाएंगे नऐ भोर के नए उजाले नव सूरज की किरणें लेकर तन मन चमकाएंगे अँधियारा पर जीता
नयनो की अंगनाई सूनी रही क्षितिज की देहरी पर ही अटके सारे सपने लगे योजनाओ के विस्तृत मीलो तक बिखरे पैमाने बालिश्तों से नपने  ई​ति​ हासो के पृष्ठ झाड़ कर जमी धूल की परते फिर से आगे आये और नए की अगवानी में घिसे पिटे से​ ​ ​चंद गीत फिर से दुहराये
 रही प्रतीक्षित सीता

आशाओ के इंद्रधनुष की रही प्रतीक्षा, कोई आकार प्रत्यंचा को ताने आवाहन के मंत्रो का उच्चार करे फिर तीर कोई संधाने सहज साध्य में हर असाध्य को एक परस से निज परिवर्तित कर दे ​पर्वत सी हर इक बाधा को बिन प्रयास ही धराशायी जो कर दे
रही अनकही गीता

वर्ष नया मंगलमय कहने

जाते हुए वर्ष की संध्या
भेज रही है स्नेह निमंत्रण
आओ अंगनाई में सूरज
वर्ष नया मंगलमय कहने
कितनी रिसी तिमिर की गठरी
बारह मासों के गतिक्रम में
कितनी थी उपलब्ध हताशा
जीवन के अनथक उद्यम में
आँखों की देहरी से कितने
सपने टूट टूट कर बिखरे
और अपेक्षा के कितने पल
घिरे उपेक्षाओं में गुजरे
विदित तुम्हे है सब कुछ ही तो
छुपी नहीं है स्थिति कोई भी
किरणों की कैंची ले आओ
लगें कुहासे सारे छंटने
बीते बरस अभी तक इतने
एक कामना को दुहराते
और बिखरती आशाओं की
छितरी किरचें बीन उठाते
पृष्ठभूमि में छिपे घटा की
जितने भी है रंग धनक के
पतन अवनिकाओ का कर दो
उभरे कल के चित्र चमक के
सपने निकल आँख के बाहर
मिले वास्तविकता से आकर
और सामने आये सवेरे
इतिहासों में वर्णित जितने
बुला रही है ​ स्नेह   अल्पना
दहलीजों पर से अकुलाकर
नव उदियाती हुई किरण की
अगवानी में दीप जलाकर
रथ वल्गा को बना कूचियां
रंग नए दो बरस गगन को
ज्योति सुधा की वर्षा करके
शांत करो अब तिमिर तपन को

नए पृष्ठ पर नया कथानक
लिख दो, चुन लो पात्र नए ही
निर्देशक बन कर आओ तुम
नया बरस यह मंचित करने