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Showing posts from May, 2016

तीर लगता आज सूना

इस समय के सिन्धु का क्यों तीर लगता आज सूना
हर लहर परिचय समेटे साथ अपने बह गई है
दूर तक उच्छल तरंगो की छिड़ीआलोड़नायेंहर घड़ी पर कर रहीं झंझाओं का सर्जन निरन्तर
चक्रवातों से घिरे अनगिन भंवरचिंघाड़ते हैं
रोष का विस्तार बढ़ता जा रहा नीले गगन पर
पर यहां तट पर बिछी हैं शून्य की सिकतायें केवल
जो कि चर्चा क्षेत्र से अब हाशियों सी कट गई है.
फेनिली अंगडाइयो में थम गए जो पल सिमट कर
आइना बन कर दिखाते घिर गया एकांत दूना
सीपियों के साथ कितने शंखसौपे ला लहर ने
किन्तु सब का साथ पा भी तीर लगता आज सूना
अब करीलोंके सरीखीनग्न हैं सारी दिशाएँ ​
​रोशनी करती कभी जो पत्तियां  वे झरगई हैं ​
वर्ष बीते है अगिनती सिंधु के इस तीर पर से
धूल चुके है पर पगों के स्पर्श। के भी चिह्न सारे

अर्पित है गीतों का चन्दन

नतमस्तक हूँ मात शारदे
स्वीकारो मेरा कर वंदन
तुमसे पा आशीष ,तुम्हे ही
अर्पित है गीतों का चन्दन
उदित सूर्य की प्रखर रश्मियाँ
माँ, भर ​दो मानस में मेरे
जागे भाव ह्रदय में, उगते
गहन निशाको चीर सवेरे
ज्योतिकलश को छलका दे दो
नूतन शब्द मुझे आंजुरि भर
स्वर के दीपक बालो,छंट लें
अज्ञानों के घने अँधेरे


मनसा वाचा और कर्मणा
अंतस करता है अभिनन्दन
तुमसे पा आशीष तुम्हे ही
है अर्पित गीतों का चन्दन
आदि स्वरों की अधिष्ठात्री
अपनी वीणा को झनकारो
नए भाव दो नए शब्द दो
नवल ऊर्जा को संचारो
सौप कल्पना को परवाज़
उड़ने को नूतन  वितान दो
कहा अनकहा व्यक्त हो सके
अनुभूति कुछ और निखारो
हंसवाहिनी बिखराकर स्मित
दीपित कर दो जन गण का मन
तुमसे पा आशीष समर्पित
तुमको ही गीतों का चन्दन
शतदल कमल पाटलों पर जो
अंकित कविता की परिभाषा
करो प्रकाशित उसे, बुझ सके
आतुर मन की ज्ञान पिपासा
करमाला में हुई अनुस्युत
मंत्रसू्क्तियों को बिखरा दो
पुस्तकधारिणी पृष्ठ खोल कर
पूरी कर दो हर जिज्ञासा

भाषा स्वरा अक्षरा माते
स्वीकारो अनुग्रहिती अर्चन
तुमसे पा आशीष समर्पित
तुमको गीतों का ​व्रुन्दावन

ढूँढती मुस्कान मेरी

नींद में भी जाग में भी रात में या हो उजाला
 जानता हूँ एक तू थी  ढूँढती मुस्कान मेरी
उम्र के इस मोड़ पर मैं हो रहा खुद से अपरिचित
रह गया हूँ वृक्ष में उलझी पतंगों के सरीखा
‘कौंधती हैं दामिनी बन कर वही बातें पुन: अब
थी सिखातीं ज़िन्दगी में राह चुनने का सलीका
तू सखा थी, तू गुरू थी, तू रही आराध्य मेरी
दूर तुझसे खो गई इस मोड़ पर पहचान मेरी
जानता है कौन उसका मोल जो उपलब्ध हर पल
दूरियों से बोध होती कीमतें सान्निध्य पल की
आज पूरी भौतिकी है एक उस पल पर निछावर
जिस घड़ी में गोद तेरी सहज मेरे पास में थी 
आज उस मृदु छाँह से वंचित हुई सुधियाँ तरसती
दूर तक फ़ैली हुई हर राह है सुनसान मेरी
खींचती बीते पलों की उंगलियां वापिस ह्रदय को
फिर उन्ही खोई हुई अमराइयों में लौट जाये
और फ़िर ममता भरे आकाश की ओड़े दुशाला
लोरियों की सरगमों में जाये फिर डुबकी लगाये
ज़िन्दगी को फिर रदीफ़ो-काफ़िये का मिल सके क्रम    चाह  है  फिर  से  बने  तू  गज़ल का उन्वान मेरी


साधना संकल्प श्रद्धा और निष्ठा के सुमन पल
उग गए जो क्यारियों में उम्र की रंग आस्था से
प्रेम और सौहार्द में डूबा हुआ आदर परस्पर
और सीमाये जुडी संतुष्टि की हर कामना से
संस्कृतियों की प्रणेता और …

माँ ! अशेष है वन्दन तेरा

शब्द जितने रहे पास सब चुक गये, वन्दना के लिये कुछ नहीं कह सकेतूने जिनको रचा वे हो करबद्ध बस प्रार्थना  में खड़े मौन हो रह गयेतूने पूरा दिया पर अधूरा रहा ज्ञान मेरा,रहीं झोलियां रिक्त हीकंठ के स्वर मेरे आज फिर से तेरा पायें आशीष शत बार हैं कह गयेजितनी संचित हुईं मेरी अनुभूतियां,भावनायें रहीं या कि अभिव्यक्तियाँहोंठ पर आके जितनी सजीं हैं सभी तेरा अनुदान बन ज़िन्दगी को मिलींसिद्धियाँ रिद्धिया जितनीं पाईं ,चढ़े जितने गिरि्श्रग मैने प्रगति पंथ परउनकी राहें सुगम कर रहीं रात दिन कलियां आशीष की क्यारियों में खिली------------------------------ ------------------------------ ----------------------कामधेनु की क्षमतायें कर सहसगुनीकल्पवृक्ष की निधियों को कर कोटि गुणितजितना होता संभव, उसका अंश नहींजो तेरे आँचल में रहता है संचितयुगों युगों तक करते हुए तपस्यायेंजितना ऋषि-मुनियों को प्राप्त हुआ करतावह इक पल में तेरी ममता का अमृतबन कर सहज शीश पर आ जाता झरतातेरे इक इंगित से होता सृष्टि सृजनतू ही ब्रह्मा विष्णु और शिव से वंदितकलुषों की संहारक,ज्ञान-ज्योति दायकतुझको है जीवन का हर इक क्षण अर्पितजग ने जो कुछ  प…

अनुमति मिले तुम्हारी तो मैं

अनुमति मिले तुम्हारी तो मैं शब्दों को सीमा के आगेसन्दर्भों में ले कर जाऊं,तुम पर नया गीत लिख डालूं
जुड़ा चेतना का हर इक क्षण रक्त-पीत वर्णी आभा सेज्वालामुखियों के लावे सी तन की कांति बिखेरे जिसकोअनुबन्धों की जड़ें अंकुरित हो जाती जब अकस्मात हीमैं अन्वेषित करूं आज उन भावों की कुछ व्याख्याओं को
सौगन्धें जोड़ा करती हैं मानस के जो कच्चे धागेउनको मैं जंजीर बना कर एक नई ही रीत बना लूँ
पुष्प,ओस,पुरबाई मधुबन या बहती नदिया का धारेइन सबकेआगे भी तो हैं उपमायें जो रहीं अनछुईसोच रहा विस्तार बढ़ा दूं आज लेखनी की थिरकन काऔर शिल्प दूं उसको कह ना पाई जो कुछ घड़ी संशयी
चलते हुये वक्त की सुईयों की टिक टिक की पदचापों कोगतिमय हुआ निरन्तर अपने जीवन का संगीत बना लूं
दोपहरी हो या कि रात का ढलता हुआ आखिरी हो पलएकाकीपन को परिभाषित करूं मिलन की कुछ घड़ियों मेंसूनेपन के सन्नाटे को दर्पण कर के कभी निहारूँअनगिन चित्र नजर आते हैं बिखराई इन वल्लरियों में
अर्थ शब्द के बदला करते करवट लेते हुये समय मे
इसीलिये मं आज अपरिचय को ही मन की प्रीत बना लूं