चांदनी में अमावस नहाने लगी

आज तेरे नयन में चमकती हुई
प्रीत कुछ इस कदर झिलमिलाने लगी
दीप दीपावली के हजारों जले
चांदनी में अमावस नहाने लगी

मन से उठती हुइ भावना की लहर
गन्ध लेकर अचानक उमड़ने लगी​
फ़ूटने लग पड़े सैंकड़ों कुमकुमे
फ़ुलझड़ी हर तरफ़ जगमगाने लगी
पग से बिखरा अलक्तक बनी अल्पना
मेंहदियों  ने सजाये नये सांतिये
रोशनी सूर्य की बन के जगने लगे
सांझ की झील में टिमटिमाते दिये

आरती की धुनें सरगमें ले नई
प्रीत की रागिनी गुनगुनाने लगी

​शब्द शहदीले होंठों से फ़िसले हुये
फूल पूजा के बनते हुये सज गये
चितवनों से चले पुष्प शर पंथ से
द्वार तक वंदनी हार में ढल गए
बन सितारे गगन ओढ़नी पर जड़ी
पैंजनी की खनक इक थिरकते हुए
मावसी रात में चन्द्रमा बन गई
नाक की लॉग जैसे दमकते हुए

कार्तिकी पूर्णिमा दूर से देखकर
दृश्य ये, मन ही मन मुस्कुराने लगी

​पग जहां पर पडें, धूल में उग गए
दर्ज़नों फूल खुशबू लुटाते हुए
और कटिबन्ध की लड़कनो से जगे
सरगमी राग कुछ मुस्कुराते हुए
घाघरे की किनारी के प्रतिबिम्ब से
इंद्रधनु आ संवरने लगे राह में
कंगनों की खनक घोलने लग गई
एक फगुनाई मल्हार ला बांह में

एक अनुभूति आ कल्पना से परे
अपनी अभिव्यक्ति को कसमसाने लगी

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