उजाले के दरीचे खुल रहे--दीपावली

शरद ऋतु रख रही​ पग षोडसी में
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

उतारा ताक से स्वेटर हवा ने
लगे खुलने रजाई के पुलंदे
सजी  छत आंगनों में अल्पनाएं
जहां  कल बैठते थे आ परिंदे
किया दीवार ने श्रृंगार अपने
नए से हो गए हैं द्वार, परदे
नए परिधान में सब आसमय है
श्री आ कोई वांछित आज वर दे

दिए सजने लगे बन कर कतारें
उजाले के दरीचे खुल रहे है

लगी सजने मिठाई थालियों में
बनी गुझिया पकौड़ी पापड़ी भी
प्लेटों में है चमचम, खीरमोहन
इमरती और संग में मनभरी भी
इकठ्र आज रिश्तेदार होकर
मनाने दीप का उत्सव मिले है
हुआ हर्षित मयूरा नाचता मन
अगिनती फूल आँगन में खिले है

श्री के साथ गणपति सामने है
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

पटाखे फुलझड़ी चलने लगे हैं
गगन में खींचती रेखा हवाई
गली घर द्वार आँगन बाखरें सब
दिए की ज्योति से हैं जगमगाई
मधुर शुभकामना सबके अधर पर
ग़ज़ल में ढल रही है गुनगुनाकर
प्रखरता सौंपता रवि आज अपनी
दिये की वर्तिका को मुस्कुराकर

धरा झूमी हुई मंगल मनाती
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

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